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Hathras News: खुशबू वही, बाजार बदल गया... हाथरस के घी की खोती पहचान

Sat, 18 Jul 2026 02:29 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस Updated Sat, 18 Jul 2026 02:29 AM IST
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The aroma remains the same, but the market has changed, Hathras ghee is losing its identity.
शहर में एक दुकान पर बिक्री के लिए रखा कई ब्रांड का घी। संवाद - फोटो : Samvad
कभी हाथरस का घी अपनी गुणवत्ता और शुद्धता के लिए देशभर में प्रसिद्ध था। गांवों से आने वाले कच्चे घी को शहर की इकाइयों में तैयार कर देश के कई हिस्सों तक पहुंचाया जाता था, लेकिन स्थानीय इकाइयों के बंद होने और बड़े ब्रांडों की बढ़ती पकड़ ने इस पुराने कारोबार की चमक छीन ली है।
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करीब चार दशक पहले हाथरस के आसपास के गांवों से बड़ी मात्रा में कच्चा घी शहर लाया जाता था। यहां की घी प्रसंस्करण इकाइयां इसकी पिराई, शुद्धिकरण और पैकिंग करती थीं। हाथरस की कॉटन मिल तक पहुंचने वाली मालगाड़ियों से घी की खेप देश के विभिन्न राज्यों में भेजी जाती थी। यह कारोबार हजारों परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन था।
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वर्तमान में स्थिति बदल चुकी है। हाथरस के बाजार में बिकने वाला अधिकांश घी अब दूसरे जिलों और राज्यों से आ रहा है। स्थानीय स्तर पर गिनी-चुनी डेयरियां ही घी तैयार कर रही हैं। हालांकि आज भी कई जिलों में हाथरस का घी नाम से उत्पाद बिकते हैं, लेकिन उनका उत्पादन अधिकांशत: यहां नहीं होता।
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बाजार में घी की कीमत गुणवत्ता और उपयोग के आधार पर अलग-अलग है। पूजा-पाठ के लिए घी 300 से 400 रुपये प्रति किलो, जबकि भोज और सामान्य उपयोग का घी 500 से 600 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। छोटी डेयरियों का शुद्ध घी 800 से 1000 रुपये और प्रीमियम ब्रांडों का घी 1400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। वहीं गांवों में पारंपरिक तरीके से तैयार शुद्ध देशी घी 2000 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है।

ऐसे बना था हाथरस घी का हब
-आसपास के गांवों से रोजाना बड़ी मात्रा में कच्चा घी आता था।
-शहर की फैक्टरियों में घी की पेराई और शुद्धिकरण होता था।
-टिन में पैकिंग के बाद रेलमार्ग से देशभर में भेजा जाता था।
-हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता था।

आज का बाजार,
-300 से 2000 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा देसी घी।
-स्थानीय की तुलना में बाहरी ब्रांडों की अधिक हिस्सेदारी।
-पूजा और खाने के लिए अलग-अलग श्रेणी का घी उपलब्ध।
-उपभोक्ताओं के लिए शुद्धता की पहचान आसान नहीं।

करीब 40-45 साल पहले हाथरस का घी पूरे उत्तर भारत में मशहूर था। गांवों से कच्चा घी आता था और यहां उसकी सफाई, पेराई व पैकिंग होती थी। व्यापारी दूर-दूर से घी खरीदने आते थे। मेरे पास आज भी इसके साक्ष्य मौजूद हैं। मेरा मानना है कि बड़े ब्रांड बाजार में आ गए हैं और स्थानीय घी बनाने वाली अधिकांश इकाइयां बंद हो गईं।

-शैलेंद्र सराफ, शहर के इतिहास के जानकार।

यहां से रेलवे के जरिये देश के कई राज्यों में घी भेजा जाता था। इस व्यापार से हजारों लोगों को रोजगार मिलता था और शहर की अर्थव्यवस्था मजबूत रहती थी। आज बाजार में कई तरह के घी उपलब्ध हैं, लेकिन पहले जैसी शुद्धता और हाथरस की पहचान नहीं रही। कई जिलों के लोग विश्वास के साथ घी ले जाया करते थे।
-रामगोपाल, बुजुर्ग कारोबारी।
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