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पढ़ाई छोड़ पानी के लिए भटकते हैं बच्चे
ब्यूूूराे, अमर उजाला, हाथ्ारस
Updated Thu, 05 May 2016 11:15 PM IST
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पानी की बाेतल लेकर बैठे बच्चेे
- फोटो : अमर उजाला
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बेसिक स्कूलों के बच्चों को कुपोषण से मुक्ति के लिए एमडीएम के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन जिले के 173 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं, जिनमें विद्यार्थियों को पीने का पानी भी नसीब नहीं हो रहा है।
नगला भूरा प्राथमिक विद्यालय में तो हालात यह हैं कि पानी पीने के लिए दो हैंडपंप लगे हुए हैं, लेकिन दोनों ही खराब हैं। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को घरों से पानी की बोतल लानी पड़ती हैं, लेकिन इनमें भरा पानी स्कूल आते-आते गर्म हो जाता है।
इसके बाद बच्चों को पीने के पानी के लिए ईंट-भट्टा पर पानी लेने जाना पड़ता है, जिससे कभी भी कोई हादसा हो सकता है। कई बार तो इन बच्चों को वहां से भी बिना पानी पिए ही भगा दिया जाता है। मारे डर के यह बच्चे घर पहुंचने तक प्यासे ही रह जाते हैं।
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तपती गर्मी में बिना पानी के घंटों स्कूल में रहने से इन बच्चों पर क्या बीतती होगी, इसका अंदाजा शायद सरकारी तंत्र को नहीं है। यही वजह है कि स्कूलों के खराब हैंडपंपों को चालू कराने पर अभी तक प्रशासन, जल निगम और बेसिक शिक्षा विभाग ने कोई गंभीरता नहीं दिखाई है।
205 स्कूलों में वाटर प्यूरीफायर खराब
जिले में 205 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में विभाग की ओर से वॉटर प्यूरीफायर मशीन भी लगवाई गईं थीं, जोकि लंबे समय से स्कूलों में शोपीस बनकर रह गई हैं। इनकी मरम्मत और देखभाल पर आज तक ध्यान नहीं दिया गया। मजबूर बच्चे अशुद्ध और खारा पानी पीने को मजबूर हैं।
173 स्कूलों में पानी को तरसते हैं बच्चे
नगला भूरा तो एक बानगी है। विभागीय रिकॉर्ड की मानें तो जिले के 173 प्राइमरी और उच्च प्राइमरी स्कूलों के हैंडपंप खराब हैं। जानकारों की मानें तो ऐसे स्कूलों की तादाद इससे कहीं ज्यादा है, जिनके हैंडपंप खराब पड़े हैं या फिर पानी छोड़ गए हैं। यहां के बच्चे रोज सुबह-शाम पीने के पानी के लिए पढ़ाई के समय में गांव के नलों पर भटकते हैं या फिर प्यासे ही रहना पड़ता है। बेसिक शिक्षा विभाग बजट का रोना रोकर इन हैंडपंपों को चालू नहीं करा सका है। विभाग ने इनके लिए बजट की मांग भी शासन से की है।
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नगला भूरा प्राथमिक विद्यालय में तो हालात यह हैं कि पानी पीने के लिए दो हैंडपंप लगे हुए हैं, लेकिन दोनों ही खराब हैं। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को घरों से पानी की बोतल लानी पड़ती हैं, लेकिन इनमें भरा पानी स्कूल आते-आते गर्म हो जाता है।
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इसके बाद बच्चों को पीने के पानी के लिए ईंट-भट्टा पर पानी लेने जाना पड़ता है, जिससे कभी भी कोई हादसा हो सकता है। कई बार तो इन बच्चों को वहां से भी बिना पानी पिए ही भगा दिया जाता है। मारे डर के यह बच्चे घर पहुंचने तक प्यासे ही रह जाते हैं।
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तपती गर्मी में बिना पानी के घंटों स्कूल में रहने से इन बच्चों पर क्या बीतती होगी, इसका अंदाजा शायद सरकारी तंत्र को नहीं है। यही वजह है कि स्कूलों के खराब हैंडपंपों को चालू कराने पर अभी तक प्रशासन, जल निगम और बेसिक शिक्षा विभाग ने कोई गंभीरता नहीं दिखाई है।
205 स्कूलों में वाटर प्यूरीफायर खराब
जिले में 205 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में विभाग की ओर से वॉटर प्यूरीफायर मशीन भी लगवाई गईं थीं, जोकि लंबे समय से स्कूलों में शोपीस बनकर रह गई हैं। इनकी मरम्मत और देखभाल पर आज तक ध्यान नहीं दिया गया। मजबूर बच्चे अशुद्ध और खारा पानी पीने को मजबूर हैं।
173 स्कूलों में पानी को तरसते हैं बच्चे
नगला भूरा तो एक बानगी है। विभागीय रिकॉर्ड की मानें तो जिले के 173 प्राइमरी और उच्च प्राइमरी स्कूलों के हैंडपंप खराब हैं। जानकारों की मानें तो ऐसे स्कूलों की तादाद इससे कहीं ज्यादा है, जिनके हैंडपंप खराब पड़े हैं या फिर पानी छोड़ गए हैं। यहां के बच्चे रोज सुबह-शाम पीने के पानी के लिए पढ़ाई के समय में गांव के नलों पर भटकते हैं या फिर प्यासे ही रहना पड़ता है। बेसिक शिक्षा विभाग बजट का रोना रोकर इन हैंडपंपों को चालू नहीं करा सका है। विभाग ने इनके लिए बजट की मांग भी शासन से की है।