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काका हाथरसी ने हास्य को साहित्य में दिलाई अलग पहचान
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काका हाथरसी का फाइल फोटो।
- फोटो : HATHRAS
बृज की देहरी कहे जाने वाले हाथरस नगर की मिट्टी साहित्य, संगीत तथा कला के क्षेत्र में काफी उर्वरा रही है। इस नगरी के अनेक सपूतों ने इन सभी क्षेत्रों में अपना नाम रोशन किया है। देश ही नहीं, अपितु विदेशों तक हिंदी हास्य व्यंग काव्य का परचम फहराने वाले श्रेष्ठ व्यंगकार व हास्य सम्राट ‘काका हाथरसी’ भी इनमें प्रमुख थे। हाथरस नगर के जैन गली मोहल्ले में एक अग्रवाल परिवार में 18 सितंबर 1906 को जन्मे काका हाथरसी ने हिंदी हास्य कवि के रूप तो अपनी ख्याति अर्जित की ही, साथ ही अपनी प्रतिभा से विश्व में हिंदी की पताका फहराई और अपने हाथरस का नाम भी विश्व में रोशन किया।
काका हाथरसी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर नजर डालें तो उनका बचपन कांटों की सेज थी, लेकिन अपनी प्रतिभा के दम पर उन्होंने इतना कुछ हासिल किया कि उनकी जीवनी ‘मेरा जीवन -ए -वन बनी’ काका कवि, संगीतकार, चित्रकार, फिल्मकार, समाज सुधारक, युग द्रष्टा, योग शास्त्री होने के साथ साहित्य, संगीत तथा कला की अनेक विधाओं से परिपूर्ण थे। काका की कविताओं की 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुईं। सन 1962 में उन्होंने संगीत की उन्नति के लिए गर्ग एंड कंपनी बनाई, जो संगीत कार्यालय के नाम से आज भी स्थापित है। काका ने 150 तैल चित्रों की चित्रकारी की और बृज की संस्कृति तथा सभ्यता को दर्शाने वाली फिल्म ‘जमुना किनारे’ का निर्माण किया। काका हाथरसी का मूल नाम प्रभुलाल गर्ग था। उन्होंने अग्रसेन जयंती के अवसर पर हाथरस के नवयुवक अग्रवाल मंडल की ओर से आयोजित एक नाटक में काका नाम से एक चौधरी की खलनायक की भूमिका का सफल मंचन किया। इसके बाद से लोग उन्हें काका नाम से पुकारने लगे। मित्रों की सलाह पर उन्होंने इस नाम के आगे हाथरसी शब्द जोड़ा और काका हाथरसी नाम से कविता लिखने लगे।
देश में हिंदी हास्य व्यंग कविताओं के सफर में अनेकानेक उपलब्धियां हासिल करते हुए काका वर्ष 1974 में थाईलैंड तथा सिंगापुर में काव्य पाठ करने गए। वर्ष 1984 में काका ने दूसरी काव्य यात्रा विदेशों में की। इस बार उन्होंने अमेरिका और कनाडा में 40 काव्य गोष्ठियां कीं। 23 सितंबर 1984 को बाल्टीमोर (अमेरिका) के मेयर ने काका को ‘ऑनरेरी सिटीजनशिप’ सम्मान से सम्मानित किया। हिंदी हास्य व्यंग काव्य और संगीत की इन विशिष्ट उपलब्धियों से प्रभावित होकर भारत सरकार ने वर्ष 1985 में उन्हें ‘पदमश्री’ से अलंकृत किया। वर्ष 1986 में काका ने इंग्लैंड, अमेरिका तथा कनाडा की तीसरी काव्य यात्रा की। काका हाथरसी का हिंदी हास्य व्यंग की कविताओं का यह सफर 89 वर्ष की आयु में 18 सितंबर 1995 को पूर्ण हुआ और वे प्रभु में विलीन हो गए। विरला संयोग ही है कि काका का जन्म दिवस ही उनका अवसान दिवस बना। वर्ष 1975 में काका हाथरसी ने हिंदी हास्य कविताओं के प्रोत्साहन के लिए ‘काका हाथरसी पुरस्कार ट्रस्ट’ की स्थापना की। ट्रस्ट प्रतिवर्ष एक हिंदी हास्य कवि को यह पुरस्कार देता है।
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काका ने यह प्रसिद्धियां तब के दौर में हासिल कीं, जब इंटरनेट तथा निजी चैनल का युग नहीं था। खरे सोने की तरह उनकी प्रासंगिकता इतनी है कि वे आज भी यश रूप में हमारे बीच है। सात फरवरी 2017 की बात है, जब संसद में एक बहस के जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काका की कविता को उद्धृत किया। फिल्म पीके में अभिनेत्री अनुष्का शर्मा ने काका की एक रचना का पाठ किया है।
मेरा जीवन ए वन के बावजूद काका के जीवन में एक टीस दिखाई पड़ती है, जो शेष है। काका हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे। नेहरू जी के जमाने में राजभाषा विधेयक पारित हुआ था। इस प्रस्ताव में यह बात थी कि जब तक भारत में सभी प्रांत हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करने को तैयार न हों, तब तक हिंदी उन पर थोपी नहीं जा सकती। बजाय राष्ट्रभाषा के राजभाषा के रूप में चाहे जो राज्य इसे स्वीकार करके प्रतिष्ठित कर सकता है। इन्हीं दिनों दिल्ली में दिल्ली प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मेलन के तत्वावधान कवि सम्मेलन पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की अध्यक्षता में आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में काका ने एक व्यंगात्मक रचना सुनाई, जिसका कुछ अंश इस प्रकार है। कविता का शीर्षक ‘राष्ट्रीय अजगर’ था। ‘राजभाषा विधेयक पास हो गया तो क्या प्रलय हो गयी, यार शोर मचाते हो बेकार यह तो होना ही था, हिंदी को दासी बनकर रोना ही था’।
विद्यासागर विकल, सदस्य, काका हाथरसी स्मारक समिति, हाथरस।
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काका हाथरसी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर नजर डालें तो उनका बचपन कांटों की सेज थी, लेकिन अपनी प्रतिभा के दम पर उन्होंने इतना कुछ हासिल किया कि उनकी जीवनी ‘मेरा जीवन -ए -वन बनी’ काका कवि, संगीतकार, चित्रकार, फिल्मकार, समाज सुधारक, युग द्रष्टा, योग शास्त्री होने के साथ साहित्य, संगीत तथा कला की अनेक विधाओं से परिपूर्ण थे। काका की कविताओं की 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुईं। सन 1962 में उन्होंने संगीत की उन्नति के लिए गर्ग एंड कंपनी बनाई, जो संगीत कार्यालय के नाम से आज भी स्थापित है। काका ने 150 तैल चित्रों की चित्रकारी की और बृज की संस्कृति तथा सभ्यता को दर्शाने वाली फिल्म ‘जमुना किनारे’ का निर्माण किया। काका हाथरसी का मूल नाम प्रभुलाल गर्ग था। उन्होंने अग्रसेन जयंती के अवसर पर हाथरस के नवयुवक अग्रवाल मंडल की ओर से आयोजित एक नाटक में काका नाम से एक चौधरी की खलनायक की भूमिका का सफल मंचन किया। इसके बाद से लोग उन्हें काका नाम से पुकारने लगे। मित्रों की सलाह पर उन्होंने इस नाम के आगे हाथरसी शब्द जोड़ा और काका हाथरसी नाम से कविता लिखने लगे।
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देश में हिंदी हास्य व्यंग कविताओं के सफर में अनेकानेक उपलब्धियां हासिल करते हुए काका वर्ष 1974 में थाईलैंड तथा सिंगापुर में काव्य पाठ करने गए। वर्ष 1984 में काका ने दूसरी काव्य यात्रा विदेशों में की। इस बार उन्होंने अमेरिका और कनाडा में 40 काव्य गोष्ठियां कीं। 23 सितंबर 1984 को बाल्टीमोर (अमेरिका) के मेयर ने काका को ‘ऑनरेरी सिटीजनशिप’ सम्मान से सम्मानित किया। हिंदी हास्य व्यंग काव्य और संगीत की इन विशिष्ट उपलब्धियों से प्रभावित होकर भारत सरकार ने वर्ष 1985 में उन्हें ‘पदमश्री’ से अलंकृत किया। वर्ष 1986 में काका ने इंग्लैंड, अमेरिका तथा कनाडा की तीसरी काव्य यात्रा की। काका हाथरसी का हिंदी हास्य व्यंग की कविताओं का यह सफर 89 वर्ष की आयु में 18 सितंबर 1995 को पूर्ण हुआ और वे प्रभु में विलीन हो गए। विरला संयोग ही है कि काका का जन्म दिवस ही उनका अवसान दिवस बना। वर्ष 1975 में काका हाथरसी ने हिंदी हास्य कविताओं के प्रोत्साहन के लिए ‘काका हाथरसी पुरस्कार ट्रस्ट’ की स्थापना की। ट्रस्ट प्रतिवर्ष एक हिंदी हास्य कवि को यह पुरस्कार देता है।
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काका ने यह प्रसिद्धियां तब के दौर में हासिल कीं, जब इंटरनेट तथा निजी चैनल का युग नहीं था। खरे सोने की तरह उनकी प्रासंगिकता इतनी है कि वे आज भी यश रूप में हमारे बीच है। सात फरवरी 2017 की बात है, जब संसद में एक बहस के जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काका की कविता को उद्धृत किया। फिल्म पीके में अभिनेत्री अनुष्का शर्मा ने काका की एक रचना का पाठ किया है।
मेरा जीवन ए वन के बावजूद काका के जीवन में एक टीस दिखाई पड़ती है, जो शेष है। काका हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे। नेहरू जी के जमाने में राजभाषा विधेयक पारित हुआ था। इस प्रस्ताव में यह बात थी कि जब तक भारत में सभी प्रांत हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करने को तैयार न हों, तब तक हिंदी उन पर थोपी नहीं जा सकती। बजाय राष्ट्रभाषा के राजभाषा के रूप में चाहे जो राज्य इसे स्वीकार करके प्रतिष्ठित कर सकता है। इन्हीं दिनों दिल्ली में दिल्ली प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मेलन के तत्वावधान कवि सम्मेलन पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की अध्यक्षता में आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में काका ने एक व्यंगात्मक रचना सुनाई, जिसका कुछ अंश इस प्रकार है। कविता का शीर्षक ‘राष्ट्रीय अजगर’ था। ‘राजभाषा विधेयक पास हो गया तो क्या प्रलय हो गयी, यार शोर मचाते हो बेकार यह तो होना ही था, हिंदी को दासी बनकर रोना ही था’।
विद्यासागर विकल, सदस्य, काका हाथरसी स्मारक समिति, हाथरस।

विद्यासागर विकल।- फोटो : HATHRAS