एक अप्रैल : काका हाथरसी ने कल्पनाओं में बसाया था मूर्खिस्तान, ये थे उसके राष्ट्रपति, राष्ट्रीय पशु-पक्षी
मूर्खिस्तान के राष्ट्रपति होंगे- तानाशाह ढपोलशंख, उनके मंत्री (यानी चमचे) होंगे खट्टा सिंह, लट्ठा सिंह, खाऊ लाल, झपट्टा सिंह। रक्षामंत्री-मेजर जनरल मच्छर सिंह। उनकी राष्ट्रभाषा हिंदी ही रहेगी लेकिन बोलेंगे अंग्रेजी। अक्षरों की टांगें ऊपर होंगी, सिर होगा नीचे, तमाम भाषाएं दौड़ेंगी हमारे पीछे-पीछे।
विस्तार
एक अप्रैल को मूर्ख दिवस यानी अप्रैल फूल डे मनाया जाता है। हास्य व्यंग्य के आका कवि काका हाथरसी ने एक मूर्खिस्तान की भी कल्पना की थी जिसमें उन्होंने बताया था कि मूर्खों का शासन कैसा होगा।
उनकी कविता ''मिटा देंगे सबका नामो-निशान, बना रहे नया राष्ट्र मूर्खिस्तान'' में उन्होंने इस बात का जिक्र किया है कि मूर्खिस्तान का राष्ट्रपति कौन होगा, इसकी क्या भाषा होगी। मूर्खिस्तान का झंडा कैसा होगा और मूर्खिस्तान का राष्ट्रीय पशु और पक्षी कौन होगा। वर्तमान में देश की राजनीति की जो दशा है, उस पर काका ने इस कविता के माध्यम से सटीक व्यंग्य कसे हैं। लोकतंत्र के खतरे से भी काका ने सभी को इस कविता के माध्यम से चेताया है। काका हाथरसी की कविता आज के दौर में बेहद प्रासंगिक दिखती है।
काका ने अपनी कविता में लिखा है- ''मिटा देंगे सबका नामो-निशान, बना रहे नया राष्ट्र मूर्खिस्तान।'' आज के बुद्धिजीवी राष्ट्रीय मगरमच्छों से पीड़ित है प्रजातंत्र, भयभीत है गणतंत्र। इनसे सत्ता छीनने के लिए कामयाब होंगे मूर्खमंत्र, मूर्खयंत्र, कायम करेंगे मूर्खतंत्र।
काका हाथरसी लिखते हैं कि हमारे मूर्खिस्तान के राष्ट्रपति होंगे- तानाशाह ढपोलशंख, उनके मंत्री (यानी चमचे) होंगे खट्टा सिंह, लट्ठा सिंह, खाऊ लाल, झपट्टा सिंह। रक्षामंत्री-मेजर जनरल मच्छर सिंह। उनकी राष्ट्रभाषा हिंदी ही रहेगी लेकिन बोलेंगे अंग्रेजी। अक्षरों की टांगें ऊपर होंगी, सिर होगा नीचे, तमाम भाषाएं दौड़ेंगी हमारे पीछे-पीछे।
काका ने इस कविता में आगे लिखा है कि- ''हमारे होंगे पांच चकार-चाकू, चप्पल, चाबुक, चिमटा और चिलम।'' इनको देखकर भाग जाएंगी सब व्याधियां। मूर्खतंत्र दिवस पर दिलखोलकर लुटाएंगी उपाधियां। मूर्खरत्न, मूर्ख भूषण, मूर्खश्री और मूर्खानंद।
काका ने अपनी इस रचना में यह भी लिखा है कि आखिर इस राष्ट्र का पशु कौन होगा- मूर्खिस्तान का राष्ट्रपशु गधा होगा और राष्ट्रीय पक्षी उल्लू या कौआ, राष्ट्रीय खेल कबड्डी या कनकौआ। राष्ट्रीय गान मूर्ख चालीसा, राजधानी के लिए शिकारपुर, वंडरफुल। राष्ट्रीय दिवस, होगी की आग लगी पडवा। काका इस कविता में लिखते हैं कि- ''नष्ट कर देंगे धड़ेबंदी, गुटंबदी, ईर्ष्यावाद और निंदावाद। मूर्खास्तान जिंदाबाद।''
महामूर्ख सम्मेलन में गधे की होती थी पूजा
एक अप्रैल को मूर्ख दिवस पर काका हाथरसी महामूर्ख सम्मेलन भी कराते थे। पुराने लोगों की मानें तो उन्होंने इसकी शुरूआत एक अप्रैल 1959 से की थी। इस महामूर्ख सम्मेलन में वह अक्सर गधे यानि सेडूलाला को मंच पर लाते थे। उसकी पूजा कराई जाती है और उसे जूते की माला पहनाई जाती है। वहां मौजूद लोगों को मूर्ख रत्न, मूर्खश्री, मूर्खभूषण जैसी उपाधियों से सम्मानित किया जाता था। जमकर ठहाके लगते थे और सभी हंसी से लोट-पोट हो जाते थे।
आज होगा महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन
एक अप्रैल को लक्ष्मीनगर स्थित सेंट आरएच कांवेंट स्कूल में महामूर्ख सम्मेलन होगा। ब्रज कला केंद्र के बैनर तले इस सम्मेलन का आयोजन होगा। इसमें उपाधियां भी दी जाएंगी।इस बार इसका संयोजक प्रमिला गौड़, अजय गौड़ को बनाया गया है। यह कवि अनिल बौहरे व चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के निर्देशन में होगा। कवि अनिल बौहरे ने बताया कि इसमें प्रतिभाग लेने वाले अपनी-अपनी मूर्खता प्रदर्शित करेंगे।
काका हाथरसी एक अप्रैल को महामूर्ख सम्मेलन कराते थे। इसकी शुरूआत उन्होंने एक अप्रैल कई बार वह मंचों पर गधे को भी लेकर आए और उसकी पूजा भी कराई। वह तब वहां अपने प्रहसन प्रस्तुत करते थे। इसे देखकर सभी लोग हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाते थे। वहां मौजूद कुछ लोगों को तरह-तरह की उपाधियां भी दी जाती थी। - अशोक गर्ग, काका हाथरसी के पौत्र
काका हंसी को एक टॉनिक बताते थे। ऐसे में वह एक अप्रैल के दिन महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन करते थे। हम भी उसे देखने जाते थे। सब जी भरकर हंसते थे। काका के अवसान के बाद भी महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन कराया जाता है। कोरोना काल में इसका आयोजन नहीं हो सका था। एक अप्रैल को फिर इसका आयोजन होगा। - अनिल बौहरे, कवि व राष्ट्रीय संयुक्त मंत्री ब्रज कला केंद्र
काका हाथरसी ने जो परंपरा शुरू की। उसे निभाने का हर प्रयास किया जा रहा है। चाहे वह किसी भी रूप में हो। वर्तमान में लोगों पर समय ही नहीं है। अप्रैल फूल का इतना क्रेज भी नहीं है। फिर भी हाथरस हंसाने-हसांने वालों की नगरी है। काका द्वारा शुरू किए गए महामूर्ख सम्मेलन क इस बार भी आयोजन किया जा रहा है। - चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, जिलाध्यक्ष ब्रज कला केंद्र