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हाथरस : आपका एक-एक वोट कीमती, इसलिए जरूर करें मतदान
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पोलिंग पार्टियों की रवानी को लेकर एमजी पॉलीटेक्निक में लगी भीड़। संवाद
- फोटो : HATHRAS
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संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस।
आज लोकतंत्र का महापर्व है। इसमें आपका एक-एक वोट कीमती है। इसलिए मतदान जरूर करें। जिले की राजनीति में कई बार ऐसा हुआ है कि चंद वोटों से ही बड़ा उलटफेर हो गया है। कई राजनेताओं को जीवन भर इसका मलाल भी रहा कि यदि उनके समर्थन में कुछ और वोट पड़ जाते तो उनकी किस्मत बदल जाती।
जिले में कई बार ऐसा हुआ है कि जीत-हार का अंतर एक या दो प्रतिशत रहा है और चंद वोटों से जीत-हार हुई है। इसमें अब तक सबसे कम जीत का अंतर 76 वोट रहा है। सादाबाद में 2002 के चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल के प्रताप चौधरी ने महज 76 वोटों से डॉ. अनिल चौधरी को परास्त कर दिया था।
इसी सीट पर 1993 में जनता दल से विशंभर सिंह और सपा से भूप सिंह आमने-सामने लड़े तो विशंभर सिंह महज 427 वोटों से जीते थे। हाथरस विधानसभा चुनाव में आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की लहर चल रही थी।
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हाथरस सदर सीट पर जनता पार्टी से कुं. रामसरन सिंह और कांग्रेस से प्रेमचंद शर्मा के बीच कड़ा मुकाबला था। रामसरन सिंह महज 556 वोटों से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गए।
1993 के चुनाव में हाथरस सदर सीट से भाजपा के राजवीर सिंह व बसपा के हिलाल कुरैशी के मध्य कांटे का मुकाबला हुआ। राजवीर सिंह महज 748 वोटों से चुनाव जीते थे। सिकंदराराऊ सीट पर 2012 में बड़ा दिलचस्प मुकाबला हुआ था।
पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय हाथरस सीट सुरक्षित हो जाने की वजह से सिकंदराराऊ से चुनावी मैदान में थे। बसपा से रामवीर उपाध्याय और सपा से यशपाल सिंह चौहान के मध्य कांटे की टक्कर हुई। रामवीर उपाध्याय 1063 वोटों से चुनाव जीत गए। ऐसे में थोड़े से वोटों से कई राजनेता चुनाव हार गए और उन्हें इसका अफसोस भी रहा।
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आज लोकतंत्र का महापर्व है। इसमें आपका एक-एक वोट कीमती है। इसलिए मतदान जरूर करें। जिले की राजनीति में कई बार ऐसा हुआ है कि चंद वोटों से ही बड़ा उलटफेर हो गया है। कई राजनेताओं को जीवन भर इसका मलाल भी रहा कि यदि उनके समर्थन में कुछ और वोट पड़ जाते तो उनकी किस्मत बदल जाती।
जिले में कई बार ऐसा हुआ है कि जीत-हार का अंतर एक या दो प्रतिशत रहा है और चंद वोटों से जीत-हार हुई है। इसमें अब तक सबसे कम जीत का अंतर 76 वोट रहा है। सादाबाद में 2002 के चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल के प्रताप चौधरी ने महज 76 वोटों से डॉ. अनिल चौधरी को परास्त कर दिया था।
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इसी सीट पर 1993 में जनता दल से विशंभर सिंह और सपा से भूप सिंह आमने-सामने लड़े तो विशंभर सिंह महज 427 वोटों से जीते थे। हाथरस विधानसभा चुनाव में आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की लहर चल रही थी।
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हाथरस सदर सीट पर जनता पार्टी से कुं. रामसरन सिंह और कांग्रेस से प्रेमचंद शर्मा के बीच कड़ा मुकाबला था। रामसरन सिंह महज 556 वोटों से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गए।
1993 के चुनाव में हाथरस सदर सीट से भाजपा के राजवीर सिंह व बसपा के हिलाल कुरैशी के मध्य कांटे का मुकाबला हुआ। राजवीर सिंह महज 748 वोटों से चुनाव जीते थे। सिकंदराराऊ सीट पर 2012 में बड़ा दिलचस्प मुकाबला हुआ था।
पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय हाथरस सीट सुरक्षित हो जाने की वजह से सिकंदराराऊ से चुनावी मैदान में थे। बसपा से रामवीर उपाध्याय और सपा से यशपाल सिंह चौहान के मध्य कांटे की टक्कर हुई। रामवीर उपाध्याय 1063 वोटों से चुनाव जीत गए। ऐसे में थोड़े से वोटों से कई राजनेता चुनाव हार गए और उन्हें इसका अफसोस भी रहा।