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हाथरस : अजोला से दूर होगी हरे चारे की समस्या

Mon, 25 Jul 2022 12:12 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Mon, 25 Jul 2022 12:12 AM IST
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Hathras: The problem of green fodder will be removed from Ajola
हाथरस : कृषि विज्ञान केंद्र में तैयार होती अजोला घास को देखते कृषि वैज्ञानिक व किसान। संवाद - फोटो : HATHRAS
घनश्याम सिंह
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हाथरस। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक पशुओं को पौष्टिक हरा चारा दिए जाने के लिए अजोला घास पर रिसर्च कर रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र पर अजोला को तैयार किया जा रहा है। इसे किसानों को भी तैयार करने की सीख कृषि वैज्ञानिक दे रहे हैं। अजोला घास धान की फसल के लिए भी फायदेमंद होता है।
अजोला का उपयोग पशुओं के चारे के लिए काफी अच्छा होता है। इसमें सुपाच्य पौष्टिक आधार होता है, जिसे खिलाने से सामान्य आहार खाने वाले पशुओं में भी दूध की मात्रा अधिक पाई जाती है। यह पशुओं में बांझपन का निवारण भी करता है। यह पशुओं के पेशाब में होने वाली खून की समस्या को दूर करने भी फायदेमंद है। अजोला का चारा पशुओं में फॉस्फोरस, आयरन और कैल्शियम की पूर्ति करता है। जिससे पशुओं का शारीरिक विकास भी तेजी से होता है। इसके अजोला को सीमेंट की कुंडी टाइप की नाद में भी उगाया जा सकता है। संवाद
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होते हैं पौष्टिक आहार
वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. एसआर सिंह ने बताया कि अजोला में अत्यंत पौष्टिक एवं असरकारक आदर्श गुण होते हैं, जिस के कारण यह भेड़, गाय, भैंस, बकरियों और मुर्गियों के लिए एक आदर्श चारा होता है। कुक्कुट पालन, मुर्गी पालन और भेड़, बकरी, खरगोश पालने वाले व्यवसायी अपने पक्षी और जानवरों के लिए अजोला को आहार के रूप में विशेष रूप से उपयोग कर सकते हैं। इसमें एमिनो एसिड, प्रोटीन, विटामिन ए, विटामिन बी-12, बीटा कैरोटीन तथा फॉस्फोरस, कैल्शियम, आयरन, पोटैशियम, मैगनीशियम, कॉपर जैसे खनिज पदार्थों की भी पर्याप्त मात्रा होती है। शुष्क अजोला में 10-15 प्रतिशत खनिज पदार्थ, 40-60 प्रतिशत प्रोटीन और 7-10 प्रतिशत एमिनो अम्ल और जैव सक्रिय पदार्थ के अलावा पोलीमर्स भी पाया जाता है। इसमें वसा व कार्बोहाईड्रेट की मात्रा बहुत ही कम पाई जाती है।
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अजोला है एक जलीय फर्न
अजोला एक तरह का जलीय फर्न है, जो पानी की सतह पर तेजी से बढ़ता है। इसकी खेती हरी खाद के रूप में की जाती है। कभी-कभी यह प्राकृतिक रूप से खेत में अपने आप ही उग आता है। यह हरी खाद भूमि की उर्वरक क्षमता को बढ़ाने में मदद करती है और उत्पादन में अप्रत्याशित वृद्धि करती है। नील हरित शैवाल सहजैविक के रूप में एजोला की सतह पर जीवित रहता है, जिसे एनाबिना एजोली के नाम से जानते है। कार्बन स्त्रोत एवं वातावरण एजोला शैवाल को वृद्धि प्रदान करता है, जिस वजह से अजोला एक विशेष पौधे के रूप में विकसित होता है।
धान की फसल के लिए भी फायदेमंद है अजोला
अजोला को खरीफ और रबी दोनों ही जलवायु में हरी खाद के रूप में बड़े पैमाने पर उगा सकते हैं। यह वायुमंडल में नाइट्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड को अमोनिया और कार्बोहाईड्रेट में बदल सकते है। यह भूमि में फसल की जड़ों और मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवों को श्वसन क्रिया में मदद करता है। अजोला धान के खेत में छोटे मोटे खरपतवार को निकलने नहीं देता है। अजोला खेत में विटामिन और ग्रोथ रेगुलेटर उत्पन्न करता है, जिस वजह से धान के पौधों का विकास काफी अच्छे से होता है। अजोला रासायनिक उर्वरक की क्षमता को भी बढ़ाता है। यह धान के खेत में सिंचाई के दौरान वाष्पीकरण की दर को भी नियंत्रित करता है।

ऐसे करें अजोला तैयार
कृषि विज्ञान केंद्र के अध्यक्ष व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ एके सिंह ने बताया कि किसी छायादार जगह पर 60ङ्ग10ङ्ग2 आकार वाली क्यारियों को खोदकर तैयार कर लें। इसके बाद क्यारी में 120 गेज की सिलपुटिन शीट को किनारों पर मिट्टी का लेप लगाकर तैयार करते है। यदि किसान भाई चाहें तो पशुपालक का पक्का निर्माण कर क्यारियों को भी तैयार कर सकते हैं। इसके बाद क्यारी में 80-100 किलोग्राम साफ उपजाऊ मिट्टी की परत को बिछाना होता है। 10-15 लीटर पानी में 5-7 किलोग्राम पुराने गोबर को मिलाकर घोल तैयार कर लेते हैं। इसके बाद क्यारी में 400-500 लीटर पानी को भरना होता है, पानी की गहराई लगभग 10 से 15 सेमी तक हो। उपजाऊ मिट्टी और गोबर की खाद को पानी में अच्छे से मिला लें। इसके बाद दो किलोग्राम ताजे अजोला को मिश्रण के ऊपर फैला दें और 10 लीटर पानी का छिड़काव उसके ऊपर कर दें। इससे अजोला अपनी सामान्य स्थिति में आ जाता है। इसके बाद क्यारियों को नायलॉन की जाली से ढककर 15 से 20 दिन के लिए छोड़ दिया जाता है। 21वें दिन 15 से 20 किलोग्राम अजोला का उत्पादन रोजाना प्राप्त किया जा सकता है। अजोला का उत्पादन प्राप्त करने के लिए 50 किलो गोबर और 20 किलो सुपरफास्फेट के घोल का छिड़काव क्यारियों में प्रतिमाह करना होगा। अजोला की 30 से 50 ग्राम की मात्रा मुर्गियों को देने से उसका शारीरिक आकार और अंडो में 15 प्रतिशत तक वृद्धि होती है। 150 -200 ग्राम की अजोला की मात्रा को भेड़ व बकरी को खिलाने से शारीरिक वृद्धि होती है और दुग्ध उत्पादन भी बढ़ता है।
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