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हाथरस : विजय दिवस पर छलका शहीदों के परिजनों का दर्द, कह दी ये बड़ी बात
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शहीद सत्यवीर का फाइल फोटो।
- फोटो : SADABAD
कन्हैया लाल, सादाबाद।
कारगिल की चोटी पर पाकिस्तानी घुसपैठियों को धूल चटाकर भारत का तिरंगा लहराकर फतह करने वाले रणबांकुरों में सादाबाद के भी जवान शामिल थे। यहां की माटी ने अपने तीन बहादुर जवानों को न्यौछावर कर दिया था। इसे विडंबना ही कहेंगे कि देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों की यहां उपेक्षा हो रही है। शहीदों के स्मारक पर कोई दो फूल तक चढ़ाने नहीं आता है, न ही परिजनों को कोई सुविधाएं मिलीं हैं।
कारगिल विजय दिवस की पूर्व संध्या पर शहीदों के परिजनों ने बताया कि शहादत के बाद आज तक न कोई राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी, सरकारी नुमाइंदा या सैन्य कर्मी उनके स्मारक पर मेला लगाना तो दूर, दो फूल चढ़ाने तक नहीं पहुंचा।
जवानों के शहीद होने पर सरकार स्थानीय प्रशासन बड़ी-बड़ी घोषणाएं तो कर देता है लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए भी शहीद परिवार के सदस्यों को सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कई बार तो चक्कर लगाने के बाद भी काम नहीं होता। क्षेत्र से तीन जवान कारगिल विजय में शहीद हुए थे। अमर उजाला से बातचीत में शहीद परिवार के सदस्यों ने अपनी पीड़ा व्यक्त की।
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दफ्तरों में काम के लिए जाने पर कोई पूछता तक नहीं
नौगांव क्षेत्र के गांव नगला चौधरी के रहने वाले रिटायर्ड सूबेदार रामकिशन के बेटे चौधरी गजपाल सिंह ने भी कारगिल युद्ध में जमकर संघर्ष किया। अचानक प्राकृतिक रूप से बर्फीले तूफान में गजपाल सिंह सहित आधा दर्जन सैनिक फंस गएं, जिसमें गजपाल का शव 45 दिन बाद मिला।
रामकिशन सेना से सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने 1995 में जाट रेजीमेंट में अपने पुत्र गजपाल को देश की सेवा के लिए भर्ती कराया था। सूबेदार रामकिशन ने बताया कि कोतवाली, तहसील या अन्य सरकारी दफ्तरों में किसी कार्य के लिए जाया जाए तो कोई पूछता तक नहीं। शहीद गजपाल स्मारक तक का रास्ता सालों से खराब पड़ा है लेकिन आज तक किसी ने सुध नहीं ली है।
शहीद गेट के लिए कई बार आवेदन देने पर भी नहीं हुई सुनवाई
नगला कलू कंजौली निवासी हसन अली की पत्नी रीना बेगम ने बताया कि उनके पति देश सेवा के लिए शहीद हो गए लेकिन आज तक प्रशासन ने शहीद गेट का निर्माण नहीं कराया है। स्मारक पर पानी पीने की कोई भी सुविधा नहीं है। मकान के आगे पानी निकासी की सुविधा भी नहीं है। शहीद गेट के लिए कई बार अधिकारियों को आवेदन भी दिए लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई।
सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा लगाकर थक गई हूं। रीना बेगम ने बताया कि देश सेवा उनके लिए सर्वोपरि है। पति के शहीद होने के बाद उन्होंने बेटे अबू हसन को भी सेना में भर्ती कराया है। रीना बेगम बताती हैं कि सरकार को शहीद परिवारों का ध्यान रखना चाहिए। देश के लिए जान कुर्बान करने वाले शहीदों के परिवार का हाल-चाल तक कोई पूछने नहीं आता।
आज भी आती है जांबाज बेटे की याद
गांव भूतिया के रहने वाली बसंती देवी (70) बताती हैं कि कारगिल युद्ध के दौरान जिस समय उन्हें अपने युवा पुत्र सत्यवीर सिंह के शहीद होने की सूचना मिली थी तभी से उनकी आंखें सूख गई और तब से लेकर आज तक आँखे बेटे को देखने को तरसती है।
बेटे के शहीद होने के बाद तो प्रशासन और सरकार ने गांव के विकास और प्रतिमा स्थल को लेकर कई वादे किए थे लेकिन उन्हें खुद ही अपने बेटे का शहीद स्मारक बनवाना पड़ा। सरकार से उन्हें कभी कोई राहत नहीं मिली। ना ही कोई अधिकारी सुनता है।
वह कहते हैं कि बेटा देश की रक्षा के लिए शहीद हो गया लेकिन आज उसका ही परिवार सुविधाओं के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। हर साल शहीद दिवस पर मां की आंखें भर आती हैं। इतने साल बीत जाने के बाद भी सत्यवीर सिंह की मां को बेटे के चले जाने का दर्द झकझोर देता है।
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कारगिल की चोटी पर पाकिस्तानी घुसपैठियों को धूल चटाकर भारत का तिरंगा लहराकर फतह करने वाले रणबांकुरों में सादाबाद के भी जवान शामिल थे। यहां की माटी ने अपने तीन बहादुर जवानों को न्यौछावर कर दिया था। इसे विडंबना ही कहेंगे कि देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों की यहां उपेक्षा हो रही है। शहीदों के स्मारक पर कोई दो फूल तक चढ़ाने नहीं आता है, न ही परिजनों को कोई सुविधाएं मिलीं हैं।
कारगिल विजय दिवस की पूर्व संध्या पर शहीदों के परिजनों ने बताया कि शहादत के बाद आज तक न कोई राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी, सरकारी नुमाइंदा या सैन्य कर्मी उनके स्मारक पर मेला लगाना तो दूर, दो फूल चढ़ाने तक नहीं पहुंचा।
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जवानों के शहीद होने पर सरकार स्थानीय प्रशासन बड़ी-बड़ी घोषणाएं तो कर देता है लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए भी शहीद परिवार के सदस्यों को सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कई बार तो चक्कर लगाने के बाद भी काम नहीं होता। क्षेत्र से तीन जवान कारगिल विजय में शहीद हुए थे। अमर उजाला से बातचीत में शहीद परिवार के सदस्यों ने अपनी पीड़ा व्यक्त की।
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दफ्तरों में काम के लिए जाने पर कोई पूछता तक नहीं
नौगांव क्षेत्र के गांव नगला चौधरी के रहने वाले रिटायर्ड सूबेदार रामकिशन के बेटे चौधरी गजपाल सिंह ने भी कारगिल युद्ध में जमकर संघर्ष किया। अचानक प्राकृतिक रूप से बर्फीले तूफान में गजपाल सिंह सहित आधा दर्जन सैनिक फंस गएं, जिसमें गजपाल का शव 45 दिन बाद मिला।
रामकिशन सेना से सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने 1995 में जाट रेजीमेंट में अपने पुत्र गजपाल को देश की सेवा के लिए भर्ती कराया था। सूबेदार रामकिशन ने बताया कि कोतवाली, तहसील या अन्य सरकारी दफ्तरों में किसी कार्य के लिए जाया जाए तो कोई पूछता तक नहीं। शहीद गजपाल स्मारक तक का रास्ता सालों से खराब पड़ा है लेकिन आज तक किसी ने सुध नहीं ली है।
शहीद गेट के लिए कई बार आवेदन देने पर भी नहीं हुई सुनवाई
नगला कलू कंजौली निवासी हसन अली की पत्नी रीना बेगम ने बताया कि उनके पति देश सेवा के लिए शहीद हो गए लेकिन आज तक प्रशासन ने शहीद गेट का निर्माण नहीं कराया है। स्मारक पर पानी पीने की कोई भी सुविधा नहीं है। मकान के आगे पानी निकासी की सुविधा भी नहीं है। शहीद गेट के लिए कई बार अधिकारियों को आवेदन भी दिए लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई।
सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा लगाकर थक गई हूं। रीना बेगम ने बताया कि देश सेवा उनके लिए सर्वोपरि है। पति के शहीद होने के बाद उन्होंने बेटे अबू हसन को भी सेना में भर्ती कराया है। रीना बेगम बताती हैं कि सरकार को शहीद परिवारों का ध्यान रखना चाहिए। देश के लिए जान कुर्बान करने वाले शहीदों के परिवार का हाल-चाल तक कोई पूछने नहीं आता।
आज भी आती है जांबाज बेटे की याद
गांव भूतिया के रहने वाली बसंती देवी (70) बताती हैं कि कारगिल युद्ध के दौरान जिस समय उन्हें अपने युवा पुत्र सत्यवीर सिंह के शहीद होने की सूचना मिली थी तभी से उनकी आंखें सूख गई और तब से लेकर आज तक आँखे बेटे को देखने को तरसती है।
बेटे के शहीद होने के बाद तो प्रशासन और सरकार ने गांव के विकास और प्रतिमा स्थल को लेकर कई वादे किए थे लेकिन उन्हें खुद ही अपने बेटे का शहीद स्मारक बनवाना पड़ा। सरकार से उन्हें कभी कोई राहत नहीं मिली। ना ही कोई अधिकारी सुनता है।
वह कहते हैं कि बेटा देश की रक्षा के लिए शहीद हो गया लेकिन आज उसका ही परिवार सुविधाओं के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। हर साल शहीद दिवस पर मां की आंखें भर आती हैं। इतने साल बीत जाने के बाद भी सत्यवीर सिंह की मां को बेटे के चले जाने का दर्द झकझोर देता है।

शहीद हसन अली का कब्र। संवाद- फोटो : SADABAD