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हाथरस : कड़क मिजाज के चलते अंग्रेजों की नजर में खटकते रहे सूफी

Tue, 09 Aug 2022 11:18 PM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Tue, 09 Aug 2022 11:18 PM IST
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Hathras: Sufis kept knocking in the eyes of the British due to their strong mood
हाथरस : स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामस्वरूप माहेश्वरी उर्फ सूफी जी। संवाद - फोटो : SIKANDHRA RAHU
राकेश वार्ष्णेय
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सिकंदराराऊ। नगर की पुरानी तहसील निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामस्वरूप माहेश्वरी उर्फ सूफी जी अपने कड़क व्यवहार और स्वाभिमान के चलते अंग्रेजी हुकूमत की नजर में हमेशा खटकते रहे। उन्होंने विदेशी सामान की होली भी नगर में पहली बार जलाई थी। तभी से अंग्रेज उन्हें लगातार गिरफ्तार करते रहे और कई बार छह-छह माह के लिए जेल भी भेजा।
जेल में अपने सूफियाना अंदाज के चलते उनके नाम के आगे सूफी जी जुड़ा। मृत्यु पर्यंत तक वह सूफी जी के नाम से जाने जाते रहे। आजादी के बाद जीवन-यापन करने के लिए उन्होंने सूफी बैंड की स्थापना की। वर्तमान में उनका परिवार तंगहाली से गुजर रहा है। पहली बार सूफी जी 1941 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित नेकराम शर्मा के साथ जेल गए। सूफी जी का जन्म वर्ष 1904 में नगर में हुआ और 1984 में उनका निधन हो गया।
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अल्पायु में भगवान देवी का साथ उनका विवाह हुआ। युवावस्था से ही उनमें अंग्रेजी राज के प्रति घृणा थी। शुरू से ही वह कांग्रेस के सक्रिय सदस्य रहे। एक बार स्कूल में अंग्रेज अफसर आया। सब छात्रों ने उसके पांव छुए, लेकिन रामस्वरूप माहेश्वरी नहीं छूये। इस पर उन्हें नौ बैंत की सजा सुनाई गई। 1941 में जब आजादी का आंदोलन अपने चरम पर था, तब सूफी जी ने थाने पर जाकर अंग्रेज अफसर को गालियां सुनाईं। तब से पुलिस उनके पीछे पड़ गई, लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं आए और भूमिगत हो गए।
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इन्ही दिनों क्षेत्र के बड़े लड़ाका पंडित नेकराम शर्मा के सानिध्य में वह आए और उन्हीं के साथ स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने लगे। वह कई बार कानपुर और लखनऊ गए और गुप्त रूप से चंद्रशेखर आजाद व अन्य नेताओं से मिले। वर्ष 1941 में नगर की मंडी गांधीगंज में सभा के दौरान अंग्रेज सरकार ने लाठीचार्ज के बाद जेल में डाल दिए।
अपने सूफियाना अंदाज के चलते जेल में उनका नाम सूफी जी पड़ गया। छह माह जेल की सजा काटने के बाद वह रिहा हुए। उन्हें प्रतिदिन थाने पर हाजिरी लगाने की सजा दी गई, लेकिन वह एक भी दिन हाजिरी लगाने थाने नहीं गए। आजादी मिलने तक वे अंग्रेज सरकार के हाथ नहीं आए। आजादी के बाद उन्हें जीवन-यापन के लिए राशन की दुकान आवंटित की गई, लेकिन एक बार आरोप लगने के बाद उन्होंने दुकान छोड़ दी।

बाद में उन्होंने सूफी बैंड और कई वर्षों तक इसका संचालन किया। वर्तमान में उनके पुत्र राजेंद्र माहेश्वरी तंगहाली में दिन गुजार रहे हैं। सरकार ने इस परिवार की बेहतरी के लिए कुछ नहीं किया। संवाद
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