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हाथरस : हाथरस में भी मौजूद हैं अंग्रेजों से हुई जंग के निशां
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हाथरस : दाऊजी मंदिर के गुंबद में तोप के गोले के निशान। संवाद
- फोटो : HATHRAS
गोविंद उपाध्याय
हाथरस। पूरा देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। यहां के कई क्रांतिकारियों ने आजादी की जंग में अपना बलिदान दिया। जब अंग्रेज पूरे देश में अपना आधिपत्य जमा रहे थे तो वर्ष 1817 में राजा दयाराम ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी। तीन दिन तक यहां भीषण युद्ध चला था। मंदिर के गुंबद पर तोप के गोलों के निशान और मंदिर में मौजूद एक गोला आज भी इस जंग का गवाह है।
वर्ष 1857 को स्वाधीनता संग्राम को देश का पहला स्वाधीनता संग्राम कहा जाता है, लेकिन हाथरस में इससे 40 साल पहले अंग्रेजों से जंग लड़ी गई। जानकारों का कहना है कि 17वीं शताब्दी में यहां राजा भूरी सिंह का शासन था। उन्होंने यहां अपने किला परिसर में मंदिर श्रीदाऊजी की स्थापना कराई थी। उनके बाद उनके बेटे राजा दयाराम ने सत्ता संभाली। अंग्रेज उस समय अपना साम्राज्य फैला रहे थे। उनकी नजर हाथरस पर भी पड़ी। अंग्रेजों ने राजा दयाराम से आत्मसमर्पण करने के लिए कहा, लेकिन राजा दयाराम ने ऐसा नहीं किया और अंग्रेजों का मुकाबला किया।
राजा दयाराम और अंग्रेजी फौज में मार्च 1817 में भीषण जंग हुई। तीन दिन तक चले इस युद्ध में राजा दयाराम के तोपखाने में आग लग गई। पूरा किला तहस-नहस हो गया। उसके बाद एक गुप्त रास्ते से राजा दयाराम यहां से चले गए और यहां अंग्रेजों का शासन हो गया। जानकार बताते हैं कि राजा दयाराम एक सुंरग के रास्ते से निकले तो किला परिसर के निकट इस गांव का नाम इसी वजह से सुंरगपुरा पड़ गया। अंग्रेजों द्वारा दागे गए गोले में से एक गोला अभी भी मंदिर में मौजूद है। वहीं मंदिर के गुंबद पर तोप के गोलों के निशां आज भी देखे जा सकते हैं। संवाद
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अवैध कब्जों से नहीं मिल रही किला क्षेत्र को आजादी
हाथरस। देश को आजाद हुए 75 साल हो गए, लेकिन यहां अंग्रेजों से हुई जंग के साक्षी इस स्थल को अवैध कब्जों से आजादी नहीं मिल रही। इस स्थल पर मंदिर श्रीदाऊजी महाराज है और राजा दयाराम के किले के भग्नावशेष मौजूद हैं। यह पुरातन महत्व का स्थल है। पुरातत्व विभाग और पर्यटन विभाग के नक्शे पर भी इसका नाम है। दाऊजी मंदिर परिसर में पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक दाऊजी मंदिर किला राजा दयाराम का बोर्ड लगा है। मंदिर के सौंदर्यीकरण को लेकर भी काम चल रहा है, लेकिन इसकी खाई में लगातार हो रहे अतिक्रमण और अवैध कब्जों पर रोक नहीं लग रही। यहां टीलों का लगातार क्षरण हो रहा है। तीन साल पहले यहां 394 अतिक्रमण चिन्हित किए गए थे, लेकिन अब इनकी संख्या 700 हो गई है। अवैध कब्जों को हटाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए जा रहे। संवाद
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हाथरस। पूरा देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। यहां के कई क्रांतिकारियों ने आजादी की जंग में अपना बलिदान दिया। जब अंग्रेज पूरे देश में अपना आधिपत्य जमा रहे थे तो वर्ष 1817 में राजा दयाराम ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी। तीन दिन तक यहां भीषण युद्ध चला था। मंदिर के गुंबद पर तोप के गोलों के निशान और मंदिर में मौजूद एक गोला आज भी इस जंग का गवाह है।
वर्ष 1857 को स्वाधीनता संग्राम को देश का पहला स्वाधीनता संग्राम कहा जाता है, लेकिन हाथरस में इससे 40 साल पहले अंग्रेजों से जंग लड़ी गई। जानकारों का कहना है कि 17वीं शताब्दी में यहां राजा भूरी सिंह का शासन था। उन्होंने यहां अपने किला परिसर में मंदिर श्रीदाऊजी की स्थापना कराई थी। उनके बाद उनके बेटे राजा दयाराम ने सत्ता संभाली। अंग्रेज उस समय अपना साम्राज्य फैला रहे थे। उनकी नजर हाथरस पर भी पड़ी। अंग्रेजों ने राजा दयाराम से आत्मसमर्पण करने के लिए कहा, लेकिन राजा दयाराम ने ऐसा नहीं किया और अंग्रेजों का मुकाबला किया।
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राजा दयाराम और अंग्रेजी फौज में मार्च 1817 में भीषण जंग हुई। तीन दिन तक चले इस युद्ध में राजा दयाराम के तोपखाने में आग लग गई। पूरा किला तहस-नहस हो गया। उसके बाद एक गुप्त रास्ते से राजा दयाराम यहां से चले गए और यहां अंग्रेजों का शासन हो गया। जानकार बताते हैं कि राजा दयाराम एक सुंरग के रास्ते से निकले तो किला परिसर के निकट इस गांव का नाम इसी वजह से सुंरगपुरा पड़ गया। अंग्रेजों द्वारा दागे गए गोले में से एक गोला अभी भी मंदिर में मौजूद है। वहीं मंदिर के गुंबद पर तोप के गोलों के निशां आज भी देखे जा सकते हैं। संवाद
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अवैध कब्जों से नहीं मिल रही किला क्षेत्र को आजादी
हाथरस। देश को आजाद हुए 75 साल हो गए, लेकिन यहां अंग्रेजों से हुई जंग के साक्षी इस स्थल को अवैध कब्जों से आजादी नहीं मिल रही। इस स्थल पर मंदिर श्रीदाऊजी महाराज है और राजा दयाराम के किले के भग्नावशेष मौजूद हैं। यह पुरातन महत्व का स्थल है। पुरातत्व विभाग और पर्यटन विभाग के नक्शे पर भी इसका नाम है। दाऊजी मंदिर परिसर में पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक दाऊजी मंदिर किला राजा दयाराम का बोर्ड लगा है। मंदिर के सौंदर्यीकरण को लेकर भी काम चल रहा है, लेकिन इसकी खाई में लगातार हो रहे अतिक्रमण और अवैध कब्जों पर रोक नहीं लग रही। यहां टीलों का लगातार क्षरण हो रहा है। तीन साल पहले यहां 394 अतिक्रमण चिन्हित किए गए थे, लेकिन अब इनकी संख्या 700 हो गई है। अवैध कब्जों को हटाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए जा रहे। संवाद