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हाथरस : नामांकन फीस के अलावा एक पैसा खर्च नहीं हुआ मेरे चुनाव में

Thu, 08 Apr 2021 11:38 PM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 08 Apr 2021 11:38 PM IST
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Hathras: My election did not cost a single penny apart from the nomination fee.
हाथरस : पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष डालचंद्र माहौर। - फोटो : HATHRAS
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
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हमारे समय में जिला पंचायत में ज्यादा बजट नहीं आता था। अब करोड़ों रुपये का बजट आता है, इसलिए उम्मीदवार भी पानी की तरह पैसा बहाते हैं। राजनीति में भ्रष्टाचार भी बहुत बढ़ गया है। यह कहना है जिले के पहले जिला पंचायत अध्यक्ष डालचंद माहौर का। डालचंद माहौर की मानें तो उन्होंने जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में प्रचार-प्रसार में केवल पांच हजार रुपये खर्च किए थे, जबकि अध्यक्ष के चुनाव में तो उन्हें केवल नामांकन की फीस की जमा करनी पड़ी। इसके अलावा एक पैसा खर्च नहीं हुआ और अध्यक्ष बन गए।
हाथरस के पहले जिला पंचायत अध्यक्ष डालचंद माहौर हाथरस जंक्शन क्षेत्र के गांव नगला केशो के रहने वाले हैं। वर्ष 1995 में डालचंद जिला पंचायत सदस्य बने। उस समय हाथरस जिला नहीं बना था। तब हाथरस जिला अलीगढ़ का हिस्सा था। तब उमेश कुमारी अलीगढ़ की जिला पंचायत अध्यक्ष थीं। वर्ष 1997 में जब हाथरस जिला बना तो यहां भी जिला पंचायत का सृजन हो गया। ऐसे में यहां जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव हुआ। हाथरस जिले के हिस्से में 18 जिला पंचायत सदस्य आए।
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प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और भाजपा हर सूरत में यह चाहती थी कि जिला पंचायत अध्यक्ष उसका हो। यह पद अनुसूचित जाति के व्यक्ति के लिए आरक्षित था। ऐसे में आनन-फानन भाजपा ने प्रत्याशी तय कर दिया। भाजपा ने तब डालचंद को प्रत्याशी बनाया। पूरी भाजपा डालचंद को विजयी बनाने में जुट गई। खुद मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह राजू भैया ने यहां डेरा जमा दिया था। उनके साथ तत्कालीन एमएलसी कृपाल सिंह, पूर्व विधायक राजवीर सिंह पहलवान सहित कई स्थानीय नेता भी जुट गए।
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डालचंद पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताते हैं कि जिला पंचायत सदस्य बनने के लिए प्रचार-प्रसार में उन्हें केवल पांच हजार रुपये खर्च करने पड़े, जबकि अध्यक्ष बनने में तो उन्हें केवल नामांकन की फीस ही देनी पड़ी। उनका कहना है कि उस समय सीट आरक्षित थी। भाजपा के सामने भी यह मजबूरी थी कि उस पर उनके अलावा कोई ऐसा प्रत्याशी नहीं था, पार्टी से जुड़ा एससी वर्ग का हो और शिक्षित हो। वह ग्रेजुएट थे। ऐसे में उनके नाम पर मुहर लग गई और वह अध्यक्ष चुन लिए गए। डालचंद बताते हैं कि उन्हें चुनाव में 11 वोट मिले और उनके सामने खड़े हुए विपक्षी उम्मीदवार को सात वोट मिले।

डालचंद का कहना है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में नाली, खड़ंजा, सड़कों के काफी काम कराए। वह माह जून 2000 तक अध्यक्ष रहे। उसके बाद अध्यक्ष पद अनारक्षित हो गया तो फिर डालचंद का कार्यकाल समाप्त हो गया। डालचंद कहते हैं कि जब वह अध्यक्ष थे तो जिला पंचायतों में बेहद कम बजट मिलता था। अब तो कई सौ करोड़ रुपये का बजट आता है तो इस पद को पाने के लिए उम्मीदवार करोड़ों रुपये फूंक देते हैं। डालचंद कहते हैं कि वह सक्रिय राजनीति से दूर हैं। उनके परिजन भी राजनीति में नहीं हैं।
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