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हाथरस: 30 वर्ष पहले मायावती ने गर्माया था दलित उत्पीड़न का मुद्दा

Tue, 06 Oct 2020 12:09 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Tue, 06 Oct 2020 12:09 AM IST
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Hathras: 30 years ago Mayawati raised the issue of Dalit oppression
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
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30 साल पहले हुई एक घटना से जिले में जातीय तनाव इतना बढ़ा था कि उसने देश और प्रदेश की सियासतों को हिला दिया था। यह घटना सासनी के गांव रूदायन में हुई थी। गांव के कुछ दबंगों ने एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति को होली के दिन जिंदा जला दिया था और अनुसूचित जाति के लोगों के 42 घर फूंक दिए थे। चंदपा क्षेत्र में जिस तरह बिटिया के प्रकरण को भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर ने अलीगढ़, दिल्ली और बिटिया के गांव आकर हवा दी है, उस समय इसी तरह सासनी के गांव रूदायन में मायावती आई थीं और कई दिनों तक लगातार धरना चला था।
चंदपा क्षेत्र में अनुसूचित जाति की बिटिया के साथ हुई घटना ने जिस तरह जिले में जातीय तनाव पैदा किया है और पूरा माहौल गरमाया है, वैसी ही एक घटना 30 वर्ष पहले सासनी के गांव रूदायन में हो चुकी है। गांव रूदायन में 11 मार्च 1990 को जो घटना हुई थी, वह दिल दहलाने वाली थी। इस घटना के कुछ निशां वहां आज भी मौजूद हैं। गांव में होलिका दहन की जमीन को लेकर उस समय विवाद हुआ था। यह विवाद इतना बढ़ गया था कि एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति के घर के निकट ही दबंगों ने होलिका रख दी थी। विरोध करने पर गांव के दबंग वहां आ गए थे। गांव के अनुसूचित जाति के दाताराम को कई गोलियां मारीं और फिर दाताराम को जिंदा जला दिया था। इतना ही नहीं, 42 घरों को भी आग के हवाले कर दिया गया था। तब पूरे इलाके में बेहद जातीय तनाव बढ़ गया था। उस समय भी विपक्षियों ने प्रदेश सरकार को जमकर घेरा था।
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खुद, बसपा सुप्रीमो मायावती यहां आई थीं और सभा की थी। कई दिनों तक धरना चला था और प्रदर्शन हुआ था। हालांकि, इस मामले में कई आरोपियों को सजा भी सुनाई जा चुकी है। स्थिति यह है कि रूदायन के करीब 100 परिवार इस खूनी होली के चलते आज भी होली का त्योहार नहीं मनाते। वैसा ही जातीय तनाव अब चंदपा क्षेत्र में देखा जा सकता है। 30 साल पहले सासनी के गांव रूदायन और अब चंदपा क्षेत्र में बिटिया के गांव में अंतर यह है कि तब वहां चल रहे आंदोलन की कमान मायावती ने संभाली थी और वह इस मामले को तूल देकर गई थीं, लेकिन इस बार बिटिया के मामले में भीम आर्मी के प्रमुख अलीगढ़ आए और फिर दिल्ली पहुंचे। बाद में बिटिया के गांव भी आए। ऐसे में इस क्षेत्र में जातिगत तनाव की बड़ी घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं।
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