हाथरस में हथकरघा कारोबार: खत्म होने की कगार पर, नहीं मिल रहा प्रोत्साहन, पहले थीं 250 यूनिटें, अब हैं 20
हथकरघा उद्योग में हाथरस की अपनी अलग पहचान थी। 1970 के दशक में जनपद में कई कॉटन मिल थीं, जिसमें हजारों श्रमिक कार्यरत थे, लेकिन धीरे-धीरे सभी मिलें बंद हो गईं।
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करीब 20 साल पहले तक हाथरस जनपद के हथकरघा कारोबार में पॉवरलूम का रूप ले लिया, लेकिन यह पॉवरलूम में भी काफी पुरानी मशीनों से काम किया जा रहा है। यहां के कारोबारियों को प्रोत्साहन न मिलने के कारण कारोबार मानों खत्म होता जा रहा है। इस कारोबार को फिर एक पहचान के लिए कारोबारी किसी संजीवनी का इंतजार कर रहे हैं।
हथकरघा उद्योग में हाथरस की अपनी अलग पहचान थी। 1970 के दशक में जनपद में कई कॉटन मिल थीं, जिसमें हजारों श्रमिक कार्यरत थे, लेकिन धीरे-धीरे सभी मिलें बंद हो गईं। दो दशक पहले तक जिले में करीब 250 बड़ी यूनिटें थीं, जो हैंडलूम के साथ पॉवरलूम का कार्य करती थीं, लेकिन वर्तमान में लगभग 20 यूनिटों में ही इसका काम हो रहा है। इन यूनिटों को अब प्रोत्साहन की दरकार है, क्योंकि इनकी मशीनें बहुत पुरानी हो गई हैं, जो कुछ चुनिंदा उत्पाद ही बना सकती हैं।
हम पुरानी मशीनों से कारोबार कर रहे हैं। मुख्य रूप से धागे व कपड़े का उत्पादन कर रहे हैं। हमें अभी तक कोई प्रोत्साहन नहीं मिला, जिससे हम अपने कारोबार को और अधिक बढ़ा सकें।-वेंकटेश अग्रवाल, कारोबारी।
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इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि टेक्सटाइल के क्षेत्र में हाथरस की अलग पहचान थी, लेकिन अब स्थिति काफी बदल गई है। जब तक सरकार इसे गंभीरता से नहीं लेगी, तब तक कुछ नहीं होगा।-अरविंद अग्रवाल, कारोबारी।
छोटे स्तर पर कुछ लाभ सरकार से मिले हैं, लेकिन इतना बड़ा कोई प्रोत्साहन नहीं मिला, जिससे हम अपनी यूनिटों को आधुनिक रूप दे सकें। हम अपने उत्पादों को पानीपत के उत्पादों के साथ बेच रहे हैं।-बुद्धसेन माहौर, कारोबारी।
आज भी हाथरस में हजारों की संख्या में हथकरघा कारोबारी मौजूद हैं। इतना हुनर है कि कारोबार चमक सकता है, लेकिन यह सरकार की मंशा के बगैर नहीं हो सकता। क्योंकि मुकाबला पानीपत से है।-प्रकाश चंद्र, कारोबारी।
पानीपत के उत्पादों के साथ मिलते हैं आर्डर
हाथरस के पॉवरलूम कारोबार के उत्पाद की अलग पहचान है, लेकिन आधुनिक समय में अब बाजार में तमाम ऐसे उत्पाद हैं, जिनका उत्पादन यहां मुमकिन नहीं है। ऐसे में यहां के कारोबारी अपने उत्पादों को बेचने के लिए पानीपत से आधुनिक उत्पादों को मंगाकर उनकी आपूर्ति करते हैं।
दूरदराज के प्रदेशों में होती है आपूर्ति
हाथरस के पॉवरलूम में बनने वाले उत्पादों की आपूर्ति सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि दूरदराज के प्रदेशों में भी की जाती है। इसमें गुजरात के साथ राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र व उत्तराखंड शामिल हैं।
गलीचों की होती है विदेशों तक आपूर्ति
हाथरस की दो बड़ी यूनिटों में पॉवरलूम के जरिए गलीचे यानी कॉरपेट तैयार होते हैं। यहां तैयार होने वाले कॉरपेट दिल्ली की बड़ी फर्में खरीदती हैं और उन्हें कई अन्य देशों में बेचती हैं। इस तरह के महंगे उत्पाद बनाने वाली यूनिटें अब काफी कम हैं।
अधिकांश यूनिटें धागे व कपड़े बना रहीं
हाथरस की अधिकांश यूनिटों में धागा और कपड़ा बन रहा है। इसमें सर्दियों में ओढ़ने वाले खेस यानी मोटे धागे से बनने वाली चादरें व अन्य उत्पाद शामिल हैं।
कारोबार एक नजर में
- चार नामी मिलें थीं 1970 के दशक में
- 12 हजार से अधिक लोग करते थे काम
- 20 बड़ी यूनिट ही अब मौजूद हैं जनपद में
- 02 हजार के करीब लोग करते हैं कामकाज
- 60 करोड़ रुपये का सालाना का टर्नओवर
- 20 साल पहले तक छोटी बड़ी 250 यूनिटें थीं
- प्रोत्साहन न मिलने से 20 यूनिट ही हैं संचालित