स्थापना दिवस: आज है हाथरस जिले का हैप्पी बर्थडे, 28 साल के सफर में चार बार बदला गया नाम
आज ही के दिन 3 मई 1997 को हाथरस जिले की स्थापना हुई थी। अलीगढ़ की हाथरस, सिकंदराराऊ व इगलास और मथुरा की सादाबाद तहसील को अलीगढ़ और मथुरा जनपदों से अलग कर नया जिला बनाया गया था। चार बार जिले का नाम बदला गया।
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28 साल पहले तीन मई 1997 को हाथरस जिले के रूप में सृजन हुआ, बाद में इसका दर्जा खत्म कर दिया गया, जिसे बनाए रखने के लिए यहां के लोगों ने संघर्ष किया, उनके प्रयास रंग लाए और जिले का दर्ज बहाल हुआ। इस दौरान इसका नाम बदलने पर भी खूब सियासत हुई। चार बार जिले का नाम बदला गया।
जिला बनने के साथ ही यहां जिला स्तरीय कार्यालय खुलने लगे। कलेक्ट्रेट के नए भवन, पुलिस लाइन, जिला कारागार, जिला न्यायालय के नए भवन के लिए भूमि की तलाश होने लगी, लेकिन इसी दौरान वर्ष 2004 में तत्कालीन सपा सरकार ने जिले को खत्म कर दिया। स्थिति यह हो गई कि जनपद न्यायालय तो इस जिले में ही संचालित रहा, लेकिन पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्थाएं फिर अलीगढ़ और मथुरा से संचालित होने लगी।
हाथरस को जिले बनाए रखने के लिए मुख्य रूप से अधिवक्ताओं, शहर के समाजसेवियों, व्यापारिक संगठनों ने जनपद बचाओ आंदोलन की शुरूआत की। लगभग तीन साल बाद वर्ष 2007 में हाईकोर्ट के आदेश पर जिला फिर बहाल हो गया। हाथरस जिले के नाम पर भी खूब सियासत हुई। बसपा सरकार ने जब हाथरस को जिला घोषित किया तो इसका नाम महामाया नगर रखा। इसके बाद फिर कल्याण सिंह की सरकार बनी तो जिले का नाम हाथरस कर दिया गया। फिर बसपा की सरकार बनने पर जिले का नाम महामायानगर कर दिया गया। सपा की सरकार बनी तो जिले का नाम फिर हाथरस कर दिया गया।
इगलास तहसील को अलग कर किया गया था जिले का सृजन
हाथरस को जिला बनाने की मांग 1990 में उठने लगी थी। तीन मई 1997 को तत्कालीन उर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय के प्रयासों से इसकी घोषणा हुई। अलीगढ़ की हाथरस, सिकंदराराऊ व इगलास और मथुरा की सादाबाद तहसील को अलीगढ़ और मथुरा जनपदों से अलग कर नया जिला बनाया गया था। वहां के लोगों ने विरोध किया तो इगलास तहसील को फिर अलीगढ़ जिले में शामिल कर दिया गया। हाथरस लोकसभा क्षेत्र में आज भी इगलास शामिल है। तब सासनी को शामिल करते हुए हाथरस को चार तहसील दी गई।
उम्मीदों के अनुरूप उद्योग धंधों को नहीं मिल पाया लाभ
जिला बनने के बाद लोगों को यह उम्मींद थी कि उद्योग धंधों का विकास होगा। हाथरस की पहचान पहले की तरह कानपुर के बाद प्रदेश में दूसरा औद्योगिक शहर बन जाएगा। शहर में रंग-गुलाल उद्योग, दाल उद्योग, हैंडीक्राफ्ट उद्योग के अलावा सिकंदराराऊ के पुरदिलनगर का मूंगा मोती उद्योग, सासनी का कांच उद्योग, बिसावर का चांदी उद्योग को सरकारी प्रोत्साहन नहीं मिला। हाथरस का दलहन उद्योग, मूंगा मोती उद्योग, सासनी का कांच उद्योग दम तोड़ गए। शहर के तीन बड़े मिल भी खत्म हो गए।
ट्रांसपोर्ट नगर नहीं बना, इत्र-गुलाबजल और गुलकंद को मिला जीआईटैग
हाथरस में 28 साल बाद भी ट्रांसपोर्ट नगर नहीं बना। इसका सीधा असर जनपद के उद्योग धंधों पर पड़ा है। एक जनपद एक उत्पाद में हींग उद्योग व रेडीमेड गारमेंट्स उद्योग के शामिल हुआ है। हसायन के इत्र, गुलकंद, गुलाब जल उद्योग को जीआई टैग मिला है।
स्वास्थ्य औरव्यवसायिक शिक्षा में जिला फिसड्डी
हाथरस जिला सबसे ज्यादा स्वास्थ्य सेवाओं में फिसड्डी है। जिला स्तरीय सरकारी अस्पताल हैं, लेकिन यहां भी पर्याप्त चिकित्सक व संसाधन नहीं है। हाथरस से बाद में जो जनपद बने, वहां मेडिकल कॉलेज खुल गए, लेकिन 28 साल बाद भी हाथरस जिले में मेडिकल कॉलेज नहीं बना। छोटी बीमारियों के लिए भी यहां के मरीजों को आगरा या अलीगढ़ भेजा जाता है। यहां सरकारी व्यवसायिक शिक्षा के नाम पर कोई उच्च संस्थान नहीं है। सात दशक पुराने एमजी पॉलीटेक्निक को भी इंजीनियरिंग कॉलेज का दर्जा नहीं मिला।
हाथरस जिले में आज भी नहीं कई जिला स्तरीय कार्यालय
जिले में अभी भी भूगर्भ जल विभाग, प्रदूषण नियंत्रण विभाग के कार्यालय नहीं है। नेडा का दफ्तर यहां नहीं हैं। अभी भी यहां अलीगढ़ और हाथरस की सहकारी बैंक ही संचालित है। जिला बनने के बाद महिला थाना व साइबर थाना की बात छोड़ दें तो जिले में कोई नया थाना नहीं बना। कोई नई नगर पंचायत नहीं बनी। कोई नया ब्लॉक सृजित नहीं हुआ।