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Hathras News: हाईकोर्ट के आदेश से बिटिया के परिजनों को राहत की उम्मीद
Fri, 28 Aug 2026 02:31 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
Updated Fri, 28 Aug 2026 02:31 AM IST
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प्रतीकात्मक चित्र।
- फोटो : Archive
वर्ष 2020 के चर्चित चंदपा कांड में प्रयागराज हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ से आए आदेश के बाद पीड़ित परिवार को पुनर्वास और रोजगार की नई उम्मीद जगी है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर नाराजगी जताते हुए निर्देश दिया है कि परिवार को तीन महीने के भीतर गाजियाबाद या नोएडा में मकान और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी उपलब्ध कराई जाए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि तीन महीने में आदेश का अनुपालन नहीं होता है तो अपर मुख्य सचिव (गृह) को 30 नवंबर 2026 को अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश होना पड़ेगा।
अदालत के फैसले के बाद मीडिया से बातचीत में पीड़िता के भाई ने कहा कि कोर्ट का आदेश राहत देने वाला है, लेकिन असली सवाल सरकार की मंशा का है। भाई ने कहा कि वे पिछले कई सालों से सीआरपीएफ के सुरक्षा घेरे के बीच चहारदीवारी में कैद जैसी जिंदगी जीने पर मजबूर हैं।परिवार का कहना है कि बच्चों की पढ़ाई से लेकर रोजमर्रा की जिंदगी पूरी तरह प्रभावित रही है। हालांकि अब कोर्ट के निर्देश पर बच्चों का एडमिशन केंद्रीय विद्यालय में कराया गया है और सुरक्षाकर्मी ही उन्हें स्कूल ले जाते व लाते हैं।
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अड़ियल रवैये पर सवाल : भाई ने बताया कि सरकार उन्हें एटा, कासगंज या अलीगढ़ में बसाना चाहती थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि हमने पहले ही नोएडा या गाजियाबाद का विकल्प दिया था, ताकि रिश्तेदार पास रहें और रोजगार के साधन भी मिल सकें।
ये हैं परिवार की मुख्य मांगें
गाजियाबाद/नोएडा में पुनर्वास : परिवार चाहता है कि कोर्ट द्वारा निर्धारित तीन महीने की समय सीमा के भीतर उन्हें सुरक्षित स्थान पर आवास आवंटित किया जाए।
सरकारी नौकरी : परिवार के एक सदस्य को योग्यता के अनुसार रोजगार दिया जाए, ताकि आजीविका सुचारू हो सके।
न्याय की गुहार : परिजनों का कहना है कि मुख्य मामले में जो कानूनी लड़ाई चल रही है, उसमें सख्त से सख्त कार्रवाई हो और उनकी दिवंगत बेटी को पूर्ण न्याय मिल सके।
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कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि तीन महीने में आदेश का अनुपालन नहीं होता है तो अपर मुख्य सचिव (गृह) को 30 नवंबर 2026 को अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश होना पड़ेगा।
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अदालत के फैसले के बाद मीडिया से बातचीत में पीड़िता के भाई ने कहा कि कोर्ट का आदेश राहत देने वाला है, लेकिन असली सवाल सरकार की मंशा का है। भाई ने कहा कि वे पिछले कई सालों से सीआरपीएफ के सुरक्षा घेरे के बीच चहारदीवारी में कैद जैसी जिंदगी जीने पर मजबूर हैं।परिवार का कहना है कि बच्चों की पढ़ाई से लेकर रोजमर्रा की जिंदगी पूरी तरह प्रभावित रही है। हालांकि अब कोर्ट के निर्देश पर बच्चों का एडमिशन केंद्रीय विद्यालय में कराया गया है और सुरक्षाकर्मी ही उन्हें स्कूल ले जाते व लाते हैं।
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अड़ियल रवैये पर सवाल : भाई ने बताया कि सरकार उन्हें एटा, कासगंज या अलीगढ़ में बसाना चाहती थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि हमने पहले ही नोएडा या गाजियाबाद का विकल्प दिया था, ताकि रिश्तेदार पास रहें और रोजगार के साधन भी मिल सकें।
ये हैं परिवार की मुख्य मांगें
गाजियाबाद/नोएडा में पुनर्वास : परिवार चाहता है कि कोर्ट द्वारा निर्धारित तीन महीने की समय सीमा के भीतर उन्हें सुरक्षित स्थान पर आवास आवंटित किया जाए।
सरकारी नौकरी : परिवार के एक सदस्य को योग्यता के अनुसार रोजगार दिया जाए, ताकि आजीविका सुचारू हो सके।
न्याय की गुहार : परिजनों का कहना है कि मुख्य मामले में जो कानूनी लड़ाई चल रही है, उसमें सख्त से सख्त कार्रवाई हो और उनकी दिवंगत बेटी को पूर्ण न्याय मिल सके।