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स्कूल की छत गिरी: ईंटों से बने चार कॉलम पर डाल रहे थे 24 मीटर लंबी छत, नहीं थे आरईएस के जेई मौजूद

Sat, 29 Nov 2025 01:46 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस
अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस Updated Sat, 29 Nov 2025 01:46 AM IST
सार

छत कास्टिंग से पहले जेई ने शटरिंग व जाल को चेक नहीं किया। प्रधानाध्यापक की भी लापरवाही रही कि उन्होंने बिना किसी इंजीनियर की मौजूदगी में छत कास्ट करने की अनुमति दे दी। विद्यालय में छत डालने के समय केवल मिस्त्री व मजदूर थे।

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A 24-meter-long roof was being placed on four brick columns
विद्यालय के बरामदे की गिरी शटरिंगएवं पिलर को देखते ग्रामीण - फोटो : संवाद

विस्तार

विद्यालय का निर्माण केवल मिस्त्री व मजदूरों के भरोसे हो रहा था। यहां देरखरेख के लिए आरईएस के जेई मौजूद नहीं थे। छत कास्टिंग के समय इंजीनियर होना जरूरी होता है, जिससे इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके। प्रधानाध्यपक खुद ही निर्माण करा रहे थे। यही वजह रही कि तकनीकी खामियों को कोई परख नहीं सका और यह हादसा हो गया।

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बेसिक शिक्षा विभाग जिले में 14 उच्च माध्यमिक विद्यालयों में नए भवन का निर्माण कार्य करा रहा है। प्रत्येक की लागत 29 लाख रुपये है। इसमें चार कमरे, हेड मास्टर कक्ष व बरामदा है। प्रधानाध्यापक व विद्यालय की शिक्षा समिति की देखरेख व आरईएस के जेई के सुपरविजन में निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं।
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आरईएस के जेई को ब्लॉक के अनुसार जिम्मेदारी दी जाती है। सहपऊ ब्लॉक की जिम्मेदारी जेई राजकुमार पर है। छत, स्लैब आदि की कास्टिंग के दौरान जेई की मौजूदगी होनी चाहिए, जिससे कोई तकनीकी खामी हो तो कास्टिंग से पहले दूर करा दी जाए। शुक्रवार को जेई विद्यालय में नहीं थे। इसके बाद भी बरामदे की छत डलवाई जा रही थी। बरामदे की लंबाई लगभग 24 मीटर यानी 78 फीट है और कक्ष से बरामद की चौड़ाई तीन मीटर है।

आरईएस का कार्य केवल सुपरविजन का होता है। छत या स्लैब कास्टिंग के दौरान जेई मौजूद रहते हैं। तकनीकी स्वीकृति आदि से कोई संबंध नहीं है। यह काम शिक्षा विभाग ही कराता है। जेई एसआईआर की ड्यूटी में थे, इसलिए वहां मौजूद नहीं थे। उनकी अनुपस्थिति में छत नहीं डलवाई जानी चाहिए थी।-अशोक कुमार शर्मा, एक्सईएन आरईएस

केवल चार कॉलम के भरोसे थी छत

इतने बड़े बरामदे में 14 बाय नौ इंच के केवल चार कॉलम खड़े किए गए थे। ये कॉलम ईंट के बनाए गए थे। पिलिंथ बीम (फर्श पर बिछा बीम) से केवल एक-एक सरिया निकालकर ईंटों से कॉलम बना दिए गए थे, जबकि पिलिंथ बीम से कॉलम की कम से कम छह सरिया बांधकर आरसीसी का कॉलम कास्ट करना था। डीसी निर्माण दुष्यंत ने बताया कि शटरिंग की बल्ली मिट्टी में धंसने के कारण छत गिरी। यदि कॉलम आरसीसी का होता तो छत का वजन सह लेते। यही हादसा भवन बनने के बाद भी हो सकता था।

तकनीकी स्वीकृति को लेकर संशय
शिक्षा विभाग में बनने वाले ये विद्यालय किसी निर्माणदायी इकाई के द्वारा नहीं बनाए जा रहे। प्रधानाध्यापक व शिक्षा समिति अपने स्तर से मिस्त्री व मजदूरों के भरोसे निर्माण कार्य कराती हैं। इस पर कोई ध्यान नहीं देता कि प्रस्तावित ड्राइंग की तकनीकी स्वीकृति है या नहीं और उसके अनुसार काम हो रहा है या नहीं। यहां भी यही लापरवाही देखने को मिली, बेसिक शिक्षा विभाग के के डीसी निर्माण दुष्यंत गौतम ने बताया कि निर्माण के लिए ड्राइंग उन्हें शासन स्तर से मिली है, जिसकी तकनीकी स्वीकृति उनके स्तर से नहीं ली जाती है। उनका दावा है कि इसी ड्राइंग के अनुसार नगला रमजू में निर्माण कार्य कराया जा रहा था।

सुपरविजन के नाम पर इतिश्री
विद्यालय में हो रहे निर्माण कार्यों में सुपरविजन की बात करें तो शिक्षा विभाग व आरईएस इसके नाम पर केवल इतिश्री कर रहे हैं। हैरानी की बात है कि छत कास्टिंग से पहले जेई ने शटरिंग व जाल को चेक नहीं किया। प्रधानाध्यापक की भी लापरवाही रही कि उन्होंने बिना किसी इंजीनियर की मौजूदगी में छत कास्ट करने की अनुमति दे दी। विद्यालय में छत डालने के समय केवल मिस्त्री व मजदूर थे। पूरी आशंका है कि अन्य विद्यालयों में हो रहे निर्माण कार्यों में भी यही लापरवाही हो रही होगी।

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