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शहीद की कब्र का भी सुध नहीं ले रहा प्रशासन
Updated Thu, 26 Jul 2018 12:12 AM IST
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस।
आज यानी गुरुवार को कारगिल विजय दिवस है। कारगिल युद्ध के बाद आपरेशन रक्षक में शहीद हुए गांव मीतई निवासी जहूर खां के परिजनों को 16 साल बाद भी कोई सरकारी मदद नहीं मिली है। और तो और गांव के उनकी कब्र की देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है। परिजनों को इस बात की टीस है कि कुछ नहीं तो कम से कम इस पक्की कब्र व उसके आस-पास बने चबूतरे के रख-रखाव के इंतजाम तो प्रशासन करा दे।
कारगिल विजय दिवस पर हर साल शहीदों की याद किया जाता है। कारगिल विजय दिवस के बाद जब आपरेशन रक्षक चला तो इसमें सेना की 4 ग्रेनेडियर में तैनात जहूर खां भी 17 अक्टूबर 2002 को शहीद हुए। वह गांव मीतई के रहने वाले थे, जबकि उनका परिवार वर्षों से यहां मोहल्ला मधुगढ़ी इगलास अड्डा पर रह रहा है। जहूर ने अपने पीछे अपनी पत्नी हजारा बेगम के साथ-साथ छह बच्चों को छोड़ा।
जहूर की शहादत के समय तमाम वादे किए गए लेकिन परिवार को कोई सरकारी इमदाद नहीं मिली। उनकी पत्नी हजारा व बेटे जाहिद का कहना है कि सरकारी इमदाद तो उन्हें नहीं मिली लेकिन उनके पिता की कब्र के आस-पास जो बाउंड्री आदि बनवाई गई थी, उसकी स्थिति भी आज बदहाल है। वहां भी साफ-सफाई नहीं है। बाउंड्री भी तोड़ दी गई है। बोर्ड भी उखाड़ दिया गया है। कम से कम प्रशासन ऐसे शहीद की याद को संजोकर रखे, जिसने देश के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया।
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आज यानी गुरुवार को कारगिल विजय दिवस है। कारगिल युद्ध के बाद आपरेशन रक्षक में शहीद हुए गांव मीतई निवासी जहूर खां के परिजनों को 16 साल बाद भी कोई सरकारी मदद नहीं मिली है। और तो और गांव के उनकी कब्र की देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है। परिजनों को इस बात की टीस है कि कुछ नहीं तो कम से कम इस पक्की कब्र व उसके आस-पास बने चबूतरे के रख-रखाव के इंतजाम तो प्रशासन करा दे।
कारगिल विजय दिवस पर हर साल शहीदों की याद किया जाता है। कारगिल विजय दिवस के बाद जब आपरेशन रक्षक चला तो इसमें सेना की 4 ग्रेनेडियर में तैनात जहूर खां भी 17 अक्टूबर 2002 को शहीद हुए। वह गांव मीतई के रहने वाले थे, जबकि उनका परिवार वर्षों से यहां मोहल्ला मधुगढ़ी इगलास अड्डा पर रह रहा है। जहूर ने अपने पीछे अपनी पत्नी हजारा बेगम के साथ-साथ छह बच्चों को छोड़ा।
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जहूर की शहादत के समय तमाम वादे किए गए लेकिन परिवार को कोई सरकारी इमदाद नहीं मिली। उनकी पत्नी हजारा व बेटे जाहिद का कहना है कि सरकारी इमदाद तो उन्हें नहीं मिली लेकिन उनके पिता की कब्र के आस-पास जो बाउंड्री आदि बनवाई गई थी, उसकी स्थिति भी आज बदहाल है। वहां भी साफ-सफाई नहीं है। बाउंड्री भी तोड़ दी गई है। बोर्ड भी उखाड़ दिया गया है। कम से कम प्रशासन ऐसे शहीद की याद को संजोकर रखे, जिसने देश के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया।
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