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बिना पाई, गांव से कैसी ‘सगाई’
ब्यूरो/अमर उजाला, हरदोई
Updated Sat, 28 Feb 2015 12:27 AM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कड़े फरमान के बावजूद
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सांसद आदर्श ग्राम योजना को लेकर पार्टी के टिकट पर चुने गए सांसद भी गंभीर
नजर नहीं आ रहे। आलम यह है कि जिस गांव को भाजपा सांसद अंशुल वर्मा ने गोद
लिया आज उस गांव में सड़क दलदल में तब्दील है। योजनाओं का क्रियान्वयन तो
दूर यहां तो एक होर्डिंग भी लगाने की जहमत नहीं उठाई गई।
बीते दिन इस गांव में अफसरोें ने चौपाल लगाकर ग्रामीणों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाया और विकास के वादे किए, पर हैरत इस बात की है कि इस कार्यक्रम में सांसद तो दूर उनका प्रतिनिधि तक मौजूद नहीं थे। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता कि योजना को कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है।
विकास खंड भरखनी की ग्राम सभा मुंडेर की आबादी करीब 4 हजार है। इस गांव में काफी समय से गलियां गंदी पड़ी है और नालियां चोक हैं, जिसके चलते गंदा पानी सड़क पर बह रहा है। गांव के मजरे रूपापुर, गदरिया, हूसेपुर, खेमपुर, अटवापुर, दूबा, गढ़िया आदि की भी स्थिति बदहाल है।
घनी आबादी के बीच दलबल में तब्दील सड़कों पर वाहन तो दूर पैदल निकलना दूभर हो रहा है। गांव की अधिकांश नालियां चोक हैं, जिसके कारण सड़क पर पानी भरता है। रूपापुर से खनिकलापुर जाने वाली चार किलोमीटर सड़क पर गहरे गड्ढे हैं, जिस पर आए दिन हादसे होते रहते हैं।
किसानों की फसलों की सिंचाई के लिए नलकूप तो हैं, पर उनकी नालियां टूटी पड़ी। वहीं नलकूप भी अर्से से खराब है। नतीजतन किसानों को पानी के लिए निजी संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है। ग्रामीणों की मांग के बावजूद जिम्मेदारों ने नलकूप सुधरवाने की जहमत तक नहीं उठाई।
ग्रामीणों को उम्मीद थी कि सांसद ने जब इस गांव को गोद लिया है तो उनके दिन बहुरेंगे, पर यह सपने भी अब टूटने लगे। ग्राम प्रधान का कहना है कि शासन की ओर से मिलने वाले बजट को वह विकास कार्यों में खर्च करती हैं। गांव वाले कोटेदार की मनमानी से जूझ रहे हैं।
गांव के विकास में सांसद समेत अन्य जनप्रतिनिधियों ने भी फूटी कौड़ी नहीं लगाई। उधर, जिस गांव को सांसद ने गोद लिया, उस गांव का प्राइमरी व जूनियर स्कूल की व्यवस्था बदहाल है। यहां न तो टीचर के आने का समय निर्धारित है न ही बच्चे पढ़ते दिखते।
ग्रामीणों की माने तो यहां आने वाले टीचरोें का समय भी निश्चित नहीं है। बच्चे भी खाने के समय स्कूल में पहुुंचते हैं। स्वास्थ्य विभाग की ओर से पचास रुपये प्रतिमाह किराए पर एक उपकेंद्र चल रहा है, जिसमें तीन आशा बहुएं तैनात हैं। यहां टीकाकरण व अन्य उपचार की सुविधा नहीं।
नतीजतन मामूली बीमारी में मरीज को पीएचसी पर आना पड़ता है। सरकार की कई योजनाएं चलने के बावजूद गांव में शौचालय बदहाल है। कुछ साल पहले बने शौचालयों मेें कूड़ा करकट भरा है, वहीं दरवाजे भी गायब हैं। ऐसे में ग्रामीणों को खुले में ही शौच को जाना पड़ता।
बीते दिन इस गांव में अफसरोें ने चौपाल लगाकर ग्रामीणों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाया और विकास के वादे किए, पर हैरत इस बात की है कि इस कार्यक्रम में सांसद तो दूर उनका प्रतिनिधि तक मौजूद नहीं थे। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता कि योजना को कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है।
विकास खंड भरखनी की ग्राम सभा मुंडेर की आबादी करीब 4 हजार है। इस गांव में काफी समय से गलियां गंदी पड़ी है और नालियां चोक हैं, जिसके चलते गंदा पानी सड़क पर बह रहा है। गांव के मजरे रूपापुर, गदरिया, हूसेपुर, खेमपुर, अटवापुर, दूबा, गढ़िया आदि की भी स्थिति बदहाल है।
घनी आबादी के बीच दलबल में तब्दील सड़कों पर वाहन तो दूर पैदल निकलना दूभर हो रहा है। गांव की अधिकांश नालियां चोक हैं, जिसके कारण सड़क पर पानी भरता है। रूपापुर से खनिकलापुर जाने वाली चार किलोमीटर सड़क पर गहरे गड्ढे हैं, जिस पर आए दिन हादसे होते रहते हैं।
किसानों की फसलों की सिंचाई के लिए नलकूप तो हैं, पर उनकी नालियां टूटी पड़ी। वहीं नलकूप भी अर्से से खराब है। नतीजतन किसानों को पानी के लिए निजी संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है। ग्रामीणों की मांग के बावजूद जिम्मेदारों ने नलकूप सुधरवाने की जहमत तक नहीं उठाई।
ग्रामीणों को उम्मीद थी कि सांसद ने जब इस गांव को गोद लिया है तो उनके दिन बहुरेंगे, पर यह सपने भी अब टूटने लगे। ग्राम प्रधान का कहना है कि शासन की ओर से मिलने वाले बजट को वह विकास कार्यों में खर्च करती हैं। गांव वाले कोटेदार की मनमानी से जूझ रहे हैं।
गांव के विकास में सांसद समेत अन्य जनप्रतिनिधियों ने भी फूटी कौड़ी नहीं लगाई। उधर, जिस गांव को सांसद ने गोद लिया, उस गांव का प्राइमरी व जूनियर स्कूल की व्यवस्था बदहाल है। यहां न तो टीचर के आने का समय निर्धारित है न ही बच्चे पढ़ते दिखते।
ग्रामीणों की माने तो यहां आने वाले टीचरोें का समय भी निश्चित नहीं है। बच्चे भी खाने के समय स्कूल में पहुुंचते हैं। स्वास्थ्य विभाग की ओर से पचास रुपये प्रतिमाह किराए पर एक उपकेंद्र चल रहा है, जिसमें तीन आशा बहुएं तैनात हैं। यहां टीकाकरण व अन्य उपचार की सुविधा नहीं।
नतीजतन मामूली बीमारी में मरीज को पीएचसी पर आना पड़ता है। सरकार की कई योजनाएं चलने के बावजूद गांव में शौचालय बदहाल है। कुछ साल पहले बने शौचालयों मेें कूड़ा करकट भरा है, वहीं दरवाजे भी गायब हैं। ऐसे में ग्रामीणों को खुले में ही शौच को जाना पड़ता।