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Hardoi News: टॉन्सिल पर सफेद झिल्ली बन सकती गला घोटू बीमारी की वजह
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हरदोई। बच्चों में गला घोटू (डिप्थीरिया) के मामले आम होते जा रहे हैं। डिप्थीरिया से बचाव के लिए एक मात्र उपाय टीकाकरण है।
इसका नियमित समय से पालन कर लगवाना आवश्यक है, लेकिन इसके अलावा सर्दियों में टॉन्सिल की बीमारी पर भी बहुत ध्यान देने की जरूरत है। टाॅन्सिल पर सफेद झिल्ली को अगर अधिक दिनों तक नजर अंदाज किया जाता है तो सांस लेने की दिक्कत हो जाती है और यही डिप्थीरिया की वजह बन जाता है।
डिप्थीरिया एक गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण होता है, जो नाक और गले की श्लेष्मा झिल्ली को प्रभावित करता है। यह आसानी से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में पहुंच सकता है। डिप्थीरिया के कुछ लक्षण आमतौर पर जुकाम के लक्षणों जैसे होते हैं। इस कारण गले में खराबी, बुखार, ग्रंथियों में सूजन और कमजोरी की समस्याएं आती हैं, लेकिन गहरे ग्रे या सफेद रंग की झिल्ली टॉन्सिल पर जमना इसका मुख्य लक्षण होता है।
यह झिल्ली सांस नली को प्रभावित करती है और सांस लेने में दिक्कत होती है। इसे अगर नजर अंदाज किया जाए तो यह जानलेवा साबित होता है। नाक, कान और गला विशेषज्ञ डाॅ. विवेक सिंह ने बताया कि वैसे तो डिप्थीरिया का बचाव सिर्फ टीकाकरण है, जिसे नियत समय पर बच्चे को लगवाना चाहिए। अगर टीकाकरण नहीं होता है और लक्षण मिलते तो यह जानलेवा भी हो सकता है।
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डिप्थीरिया पीड़ित दो बच्चे अस्पताल में भर्ती
हरदोई। मेडिकल कॉलेज के पीडियाट्रिक वार्ड में डिप्थीरिया से पीड़ित दो मरीजों को भर्ती किया गया है। बिलग्राम के जरौली निवासी नूर हसन के आठ वर्षीय पुत्र अबू बकर को पांच दिन पहले भर्ती किया गया। शाहाबाद के ककरघट के जावेद की चार वर्षीय भांजी सुनेरा को सोमवार को भर्ती किया गया है। इसके दो दिन पहले भी एक डिप्थीरिया के मरीज को इलाज देकर छुट्टी दी गई है। इधर, डिप्थीरिया के मरीजों में इजाफा हुआ है।
लक्षण
गले में दर्द और तेज बुखार।
सूजी हुई लसीका ग्रंथियां।
बच्चों को खाना निगलने में दिक्कत
सामान्य कमज़ोरी।
बचाव
डिप्थीरिया के बचाव के लिए टीकाकरण सबसे महत्वपूर्ण है। ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. विवेक सिंह ने बताया कि बच्चों के जन्म के बाद 6वें सप्ताह, 10वें सप्ताह और 14वें सप्ताह में टीकाकरण कराया जाना आवश्यक है। इसके बाद पहला बूस्टर डोज 16 से 24 माह पर दिया जाना चाहिए और दूसरा बूस्टर डोज 5 से 6 साल पर देना चाहिए। इससे डिप्थीरिया के चांस न के बराबर हो जाते हैं। अन्यथा डिप्थीरिया काफी गंभीर और जानलेवा बीमारी है।
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इसका नियमित समय से पालन कर लगवाना आवश्यक है, लेकिन इसके अलावा सर्दियों में टॉन्सिल की बीमारी पर भी बहुत ध्यान देने की जरूरत है। टाॅन्सिल पर सफेद झिल्ली को अगर अधिक दिनों तक नजर अंदाज किया जाता है तो सांस लेने की दिक्कत हो जाती है और यही डिप्थीरिया की वजह बन जाता है।
डिप्थीरिया एक गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण होता है, जो नाक और गले की श्लेष्मा झिल्ली को प्रभावित करता है। यह आसानी से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में पहुंच सकता है। डिप्थीरिया के कुछ लक्षण आमतौर पर जुकाम के लक्षणों जैसे होते हैं। इस कारण गले में खराबी, बुखार, ग्रंथियों में सूजन और कमजोरी की समस्याएं आती हैं, लेकिन गहरे ग्रे या सफेद रंग की झिल्ली टॉन्सिल पर जमना इसका मुख्य लक्षण होता है।
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यह झिल्ली सांस नली को प्रभावित करती है और सांस लेने में दिक्कत होती है। इसे अगर नजर अंदाज किया जाए तो यह जानलेवा साबित होता है। नाक, कान और गला विशेषज्ञ डाॅ. विवेक सिंह ने बताया कि वैसे तो डिप्थीरिया का बचाव सिर्फ टीकाकरण है, जिसे नियत समय पर बच्चे को लगवाना चाहिए। अगर टीकाकरण नहीं होता है और लक्षण मिलते तो यह जानलेवा भी हो सकता है।
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डिप्थीरिया पीड़ित दो बच्चे अस्पताल में भर्ती
हरदोई। मेडिकल कॉलेज के पीडियाट्रिक वार्ड में डिप्थीरिया से पीड़ित दो मरीजों को भर्ती किया गया है। बिलग्राम के जरौली निवासी नूर हसन के आठ वर्षीय पुत्र अबू बकर को पांच दिन पहले भर्ती किया गया। शाहाबाद के ककरघट के जावेद की चार वर्षीय भांजी सुनेरा को सोमवार को भर्ती किया गया है। इसके दो दिन पहले भी एक डिप्थीरिया के मरीज को इलाज देकर छुट्टी दी गई है। इधर, डिप्थीरिया के मरीजों में इजाफा हुआ है।
लक्षण
गले में दर्द और तेज बुखार।
सूजी हुई लसीका ग्रंथियां।
बच्चों को खाना निगलने में दिक्कत
सामान्य कमज़ोरी।
बचाव
डिप्थीरिया के बचाव के लिए टीकाकरण सबसे महत्वपूर्ण है। ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. विवेक सिंह ने बताया कि बच्चों के जन्म के बाद 6वें सप्ताह, 10वें सप्ताह और 14वें सप्ताह में टीकाकरण कराया जाना आवश्यक है। इसके बाद पहला बूस्टर डोज 16 से 24 माह पर दिया जाना चाहिए और दूसरा बूस्टर डोज 5 से 6 साल पर देना चाहिए। इससे डिप्थीरिया के चांस न के बराबर हो जाते हैं। अन्यथा डिप्थीरिया काफी गंभीर और जानलेवा बीमारी है।