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अय्यामे अज़ा के आखिरी दिन निकला जुलूस
अमर उजाला ब्यूरो, हरदोई।
Updated Sun, 20 Dec 2015 11:55 PM IST
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पिहानी (हरदोई)। अय्यामे अज़ा (गमों के दिन) का रविवार को जुलूस, मातम और मजलिस के साथ समापन हो गया। मस्जिद मिस्बाहे हुसैनी से बरामद जुलूस में शािमल जुलजनाह (हुसैन की प्रतीक सवारी) व गहवारा- ए- अली असगर (अली असगर के झुले) को मातमदारों ने अकीदत के साथ बोसे दिए। यहीं से इमाम हुसैन की शबीहे ताबूत भी बरामद की गई।
मोहल्ला खुर्मुली स्थित मस्जिद मिस्बाहे हुसैनी से कार्यक्रम की शुरुआत मजलिसे अजा के साथ हुई। मौलाना डा. जफर अब्बास ने कहा कि इमाम हुसैन ने पूरी इंसानियत को हक और नाहक के बीच फर्क पहचान कर सही का साथ देने का सबक अपनी शहादत के साथ दिया है।
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हमें करबला वालोें की शहादत के पैगाम को आम करना चाहिए। इसके बाद यहां से अंजुमन हुसैनिया कदीम ने जुलूस बरामद किया। बड़ा चौराहा पर मौलाना वजीहुल हसन ने तकरीर फरमाई। शिया जामा मस्जिद से अली असगर का झूला व ताबूत बरामद किया गया। यहां से रास्तों से होता हुआ जुलूस फाटक परिसर पहुंचा।
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इस दौरार्न आइं मेहमान अंजुमनों अजादारे हुसैनी जाफराबाद, जीनतुल अबा आलमपुर बाराबंकी, हुसैनिया कदीम कानपुर के अलावा रौनके अजा, हुसैनिया, लश्करे अली आदि ने नौहे पढ़कर मातम किया। फाटक परिसर में अलविदाई नौहे के साथ जुलूस का समापन हो गया।
बीते गम के दिन, अब मनेंगी खुशियां
पिहानी (हरदोई)। शियाओं में लगातार दो माह आठ दिन तक जारी गमे शहीदाने करबला के दिनों का समापन हो गया। इसके साथ ही शियाओं में खुशियां मनाने की शुरूआत नौवीं रवीउलअव्वल यानी (आज) से शुरू हो जाएगी। नवासा- ए- रसूल इमाम हुसैन और उनके साथी करबला में शहीद कर दिए गए थे, जिसके गम में शिया मोहर्रम से लेकर दो महीने आठ दिन तक खुशियों से परहेज करते हैं।
अय्यमे अज़ा के दौरान शिया समुदाय में शादी ब्याह आदि खुशियाें के कार्य नहीं होते और महिलाएं भी सुहाग की प्रतीक चीजों त्याग देती हैं। पूरा समय मातम मजलिस का दौर चलता है। यह सिलसिला रविवार को पूरा हो गया। अब अय्यामे अजा के समापन के साथ ही यह सिलसिला भी ठहर जाएगा। शिया महिलाएं भी अब सोमवार से चूड़ियां और रंगीन वस्त्रों समेत सुहाग की निशानियां धारण कर सकेेंगी। समुदाय में शादी आदि का सिलसिला भी अब शुरू हो जाएगा।