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लोक-साहित्य और भाषा-अध्ययन में अवधी भाषा का महत्व : डॉ. अमिता

Sun, 28 Dec 2025 11:50 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sun, 28 Dec 2025 11:50 PM IST
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The importance of the Awadhi language in folklore and linguistic studies: Dr. Amita
संवाद न्यूज एजेंसी
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हरदोई। उप्र हिंदी संस्थान लखनऊ की प्रधान संपादक डॉ. अमिता दूबे ने कहा कि लोक-साहित्य और भाषा-अध्ययन में अवधी भाषा का महत्व आज भी है। अवधी भाषा हिंदी के एक महत्वपूर्ण पूर्वी उपभाषा के रूप में स्थापित है।
डॉ. राम मनोहर लोहिया महाविद्यालय अल्लीपुर और उप्र भाषा संस्थान लखनऊ की तरफ से अवधी भाषा की विकास यात्रा विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी की मुख्य वक्ता ने कहा कि आधुनिक काल में खड़ी बोली के प्रभाव से अवधी भाषा का साहित्यिक रूप सीमित हुआ। कहा कि प्राचीन काल से अवधी की जड़ें, इंडो-आर्यन भाषा परिवार में है।
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यह अर्द्धमागधी प्राकृत से विकसित हुई मानी जाती है। अयोध्या क्षेत्र की स्थानीय बोली, जिसे कोसली कहा जाता था, अवधी के विकास का आधार बनी। गोष्ठी के मुख्य अतिथि आईटीबीपी के जनसंपर्क अधिकारी प्रकाशन प्रमुख कमलेश कमल ने कहा कि भक्तिकाल में श्रीतुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस और जायसी ने पद्मावत जैसे ग्रंथों में साहित्यिक भाषा के रुप में इस्तेमाल किया, जिसने प्रेमाख्यान और भक्ति काव्य को समृद्ध किया।
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विशिष्ट अतिथि डॉ. ब्रह्म स्वरूप पांडे ने कहा कि रीतिकाल और आधुनिक काल भक्तिकाल के बाद अवधी का काव्य भाषा के रूप में प्रयोग कम हुआ है, लेकिन समाप्त नहीं हुआ। 1857 के विद्रोह के केंद्र अवध में मौखिक साहित्य की रचना हुई। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए सार्वजनिक शिक्षोन्नयन संस्थान के संस्थापक, अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी मधुपेश ने कहा कि भक्तिकाल अवधी का सबसे स्वर्ण काल रहा।
वरिष्ठ साहित्यकार मदन मोहन पांडेय, डॉ. एनसी शुक्ला, डॉ. ईश्वर चंद्र वर्मा, निशानाथ अवस्थी निशंक, राजकुमार सिंह प्रखर, विपिन त्रिपाठी, सुखदेव पांडेय सरल, अरविंद मिश्र, डॉ. शीला पांडेय, डॉ. राहुल सिंह को सम्मानित किया गया। संगोष्ठी का संचालन डॉ. देश दीपक शुक्ल ने किया।

इस मौके पर स्नेहल पांडे, डॉ. शशिकांत पांडेय, डॉ. विवेक वाजपेयी, डॉ. रश्मि द्विवेदी, आनंद विशारद, शुभम मिश्रा, दीपक कुमार, संजीव अस्थाना आदि मौजूद रहे।
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