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जिम्मेदारों ने खींचा हाथ, करोड़ों का ट्रॉमा सेंटर अनाथ

Sun, 13 Feb 2022 10:18 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sun, 13 Feb 2022 10:18 PM IST
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Responsible pulled hands, trauma center orphans worth crores
हरदोई। हरदोई की सीमा से करीब चार किलोमीटर दूर नया गांव में स्थापित ट्रॉमा सेंटर के छह वर्ष अनाथ की तरह गुजरे हैं।
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स्वास्थ्य विभाग के जिला स्तर के सबसे बड़े अधिकारी मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. ओपी तिवारी का कहना है कि ट्रॉमा सेंटर का प्रशासन उनके अधीन नहीं है। ऐसा ही कहना है मेडिकल कालेज की प्राचार्या डॉ. वाणी गुप्ता का। उन्होंने भी इससे पल्ला झाड़ लिया है।
उनका कहना है कि मेडिकल कालेज की 10 किलोमीटर की परिधि में न आने के कारण यह उनके प्रशासनिक क्षेत्र से बाहर है। जिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक ने भी इसको अपना मानने से इनकार कर दिया है।
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छह वर्ष पहले दो करोड़ 15 लाख रुपये की लागत से बनकर तैैयार हुआ हरदोई ट्रॉमा सेेंटर में ताला लटका हुआ है। हरदोई के लोगों के लिए ट्रॉमा सेंटर की स्वीकृति और शुरुआत किसी सपने के पूरा होने जैसी ही थी।
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उन्हें विश्वास था कि अब शायद गंभीर रोगों से निपटने केे लिए उन्हें लखनऊ, कानपुर या बरेली के ट्रॉमा सेंटरों की दौड़ नहीं लगानी होगी। वर्ष 2016 के फरवरी माह में फीता कटा, तालियां बजीं। फिर संसाधनों की कमी में डूब गया।
ट्रॉमा सेंटर के संचालन की बात तो दूर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी इससे नाता ही तोड़ बैठे हैं। मेडिकल कालेज की प्राचार्य डॉ. वाणी गुप्ता के मुताबिक, सेंटर उनकी प्रशासनिक क्षेत्र की परिधि में नहीं आता है।
मेडिकल कालेज के 10 किलोमीटर परिधि क्षेत्र में आने वाली स्वास्थ्य सेवाएं ही उनके अधीन हैं, जबकि सीएमओ डॉ. ओपी तिवारी ने भी ट्रामा सेंटर को अपने अधीन न होने की बात कही है।
मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. जेएन तिवारी के मुताबिक, पहले यह उनके अधीन था, लेकिन मेडिकल कालेज बनने के बाद वह खुद मेडिकल कालेज प्रशासन के निर्देशन में कार्य कर रहे हैं। ऐसे में अभी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा जा सकता कि ट्रामा सेंटर का संचालन कौन करेगा।
आठ डॉक्टर समेत 50 का स्टाफ मंजूर
ट्रॉमा सेंटर को जनता की सेवा में समर्पित करते हुए स्वास्थ्य विभाग ने 50 स्वास्थ्य कर्मियों के पद तय किए थे। इनमें आठ डॉक्टरों के अलावा स्टाफ नर्स, ईएमओ, ओटी टेक्नीशियन, नर्सिंग असिस्टेंट के पद भी थे।
ट्रॉमा सेंटर में इन संसाधनों की उपलब्धता हो जाती तो यहां के गंभीर रोगों के मरीजों को लखनऊ, कानपुर या बरेली के ट्रॉमा सेंटरों तक दौड़ना न पड़ता, लेकिन अनदेखी का शिकार ट्रामा सेंटर अपनी उपयोगिता खो चुका है।
100 शैया अस्पताल को दे दिए बेड, फर्नीचर
ट्रॉमा सेंटर के लिए आए बेड व अन्य फर्नीचर 100 शैया अस्पताल को दे दिए गए हैं। इसके अलावा यहां के वेंटिलेटर को भी 100 बेड अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया है।

ट्रॉमा सेंटर खोलने, बंद करने और साफ-सफाई करने के लिए केवल दो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ही बचे हैं।
यहां के इंचार्ज डॉ. नवनीत आनंद की कोरोना संक्रमण से निधन और डॉ. पीयूष की संविदा समाप्त होने के बाद बचे एकमात्र चिकित्सक डॉ. मुरलीधर का भी 100 शैया अस्पताल में ट्रांसफर हो गया। इसके बाद यहां के 18 लोग अब जिला अस्पताल में ड्यूटी कर रहे हैं।
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