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Hardoi News: हत्या में 15 साल बाद दोषी को उम्रकैद, डीएनए रिपोर्ट आने में लग गए 13 साल

Mon, 17 Nov 2025 11:40 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Mon, 17 Nov 2025 11:40 PM IST
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Murder convict sentenced to life imprisonment after 15 years, DNA report took 13 years to arrive
एक्सक्ल्यूसिव
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- रिपोर्ट आने के साढ़े 11 माह के अंदर अपर जिला जज योेगेंद्र चौहान ने सुनाया फैसला
संवाद न्यूज एजेंसी
हरदोई। हत्या के एक मामले में 15 साल बाद दोषी को अपर जिला जज कोर्ट संख्या -3 योगेंद्र चौहान ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। हैरतअंगेज पहलू यह है कि घटना के बाद छह माह में आरोप तय हो गए थे। फिर चार माह में गवाही भी पूरी हो गई। इसके बाद डीएन रिपोर्ट आने में 13 साल लग गए। घटना ऐसी थी कि बिना डीएनए रिपोर्ट के निर्णय हो ही नहीं सकता था। डीएनए रिपोर्ट आने के साढ़े 11 माह में ही सजा सुना दी गई।
उन्नाव जनपद के थाना बांगरमऊ क्षेत्र के भवानी खेड़ा जकटापुर निवासी मदनलाल ने कासिमपुर थाने में तीन फरवरी 2011 को रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसमें बताया था कि उसके पुत्र अविनाश उर्फ महेंद्र (20) को कासिमपुर थाना क्षेत्र के दुलारपुर आंट निवासी अनिल नौकरी दिलाने का झांसा देकर साथ ले गया था।
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28 सितंबर 2010 को अनिल अपने साथ अविनाश को ले गया था। दावा था कि इससे पहले भी अनिल उसके बेटे को तीन बार ले गया था। रुपयों के लेनदेन को लेकर विवाद हो गया था। इसकी वजह से अनिल रंजिश मानता था। एक जनवरी 2011 को सिरदार नगर गांव से महेंद्र के भाई कमलेश के पास एक कॉल आई।
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इसमें बताया गया कि गांव के पास से निकली सई नदी के किनारे एक मानव खोपड़ी और कुछ हड्डियां प्लास्टिक की पन्नी में लिपटी मिली हैं। हड्डियों के पास से एक डायरी मिली थी। डायरी में लिखे नंबरों से इसकी पहचान हुई थी। पूछताछ के दौरान अनिल ने पुलिस को बताया था कि उसने नदी में डुबोकर महेंद्र की हत्या कर दी थी।
बोरी में शव रखकर नदी में डाल दिया था। अभियोजन पक्ष की ओर से 11 गवाहों को पेश किया गया। इसके साथ ही 13 अभिलेखीय साक्ष्य भी पेश किए गए थे। दोनों पक्षों की तर्को को सुनने व पत्रावली पर मौजूद सबूतों के आधार पर अपर जिला जज ने सजा सुनाई है।
घटना के दो माह बाद पुलिस ने लिखी थी रिपोर्ट
अविनाश उर्फ महेंद्र 28 सितंबर 2010 से लापता था। अविनाश का कंकाल (खोपड़ी, जांघ, कंधे और घुटने की हड्डी) एक जनवरी 2011 को मिला था। पुलिस ने दो माह तक रिपोर्ट इसलिए दर्ज नहीं की थी क्योंकि यह नहीं साबित हो रहा था कि कंकाल अविनाश का ही है। तीन फरवरी 2011 को पुलिस ने कासिमपुर थाना क्षेत्र के दुलारपुर आंट निवासी अनिल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करली। चार फरवरी 2011 को कंकाल का पोस्टमार्टम हुआ। सीएचसी संडीला में पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक ने लिखा कि डीएनए जांच से ही स्पष्ट हो पाएगा कि यह कंकाल अविनाश का ही है।
नौ मई 2011 को रक्त का नमूना और बरामद हुई हड्डियों को डीएनए टेस्ट के लिए भेजा गया
नौ मई 2011 को अविनाश के माता पिता का रक्त नमूना और बरामद हुई हड्डियों को डीएनए टेस्ट के लिए भेजा गया। इस बीच 19 अगस्त 2011 को मामले में आरोप तय हो गए। 12 सितंबर 2011 से गवाही शुरू हो गई। 13 जनवरी 2012 तक सभी 11 गवाहों की गवाही भी दर्ज करली गई, लेकिन डीएनए की रिपोर्ट नहीं आई। इसको लेकर कई पत्र भी शासन में संबंधित अधिकारियों का भेजे गए। लगभग 13 साल बाद 30 सितंबर 2024 को डीएनए रिपोर्ट आई। इसमें पुष्टि हो गई कि हड्डियां अविनाश की ही थीं। इसके बाद फिर से सुनवाई में तेजी आई और रिपोर्ट आने के लगभग साढ़े 11 माह बाद ही सोमवार को अपर जिला जज योगेंद्र चौहान ने सजा सुना दी।



खेत में सिंचाई के दौरान पाइप में फंस गया था कंकाल
सई नदी के किनारे स्थित खेतों में एक जनवरी 2011 को सिंचाई कर रहा था। सई नदी से पंपिंग सेट के जरिए हो रही सिंचाई में अचानक पाइप से पानी आना बंद हो गया। किसान ने पाइप देखा तो उसमें बोरीनुमा पॉलीथिन फंसी हुई थी। इसे निकाला तो इसमें मानव खोपड़ी और हड्डियां मिलीं। इसी में एक डायरी भी मिली। डायरी में कुछ नंबर लिखे हुए थे। इनमें से पहला नंबर मृतक के चाचा कमलेश का था। किसान ने इसी आधार पर कमलेश को फोन पर जानकारी दी थी।


इनसेट
तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के आदेश पर दर्ज हुई थी रिपोर्ट
एक जनवरी 2011 को कंकाल मिलने के बाद भी पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज नहीं की थी। पुलिस अलग अलग तरह के सवालों में मृतक के परिजनों को उलझा रही थी। तीन फरवरी को तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के आदेश पर रिपोर्ट दर्ज हुई। इसके बाद चार फरवरी को पुलिस ने कंकाल अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा था।
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