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अंधेरे में है हमारी दीवाली, चाक तो घूमी हाथ फिर भी खाली
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फोटो-11-भरखनी ब्लाक के ग्राम विनायका अकबरपुर में चक्के पर दिए बनाता गंगा प्रसाद। संवाद
- फोटो : HARDOI
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हरदोई। पुश्तैनी माटी कला को संजोए कुम्हारों के परिवार दिवाली नजदीक देख चाक तेजी से घुमाने लगे हैं लेकिन उत्साह फीका है। माटी कला और विश्वकर्मा योजना उन्हें लाभ नहीं दे सकीं। अब माटी व ईंधन महंगा होने से कुम्हारी कला के हुनरमंदों की मजदूरी भी नहीं निकल पा रही है।
भरखनी ब्लाक के ग्राम विनायका अकबरपुर में 15 कुम्हारों के परिवार रहते हैं। कुम्हारों का कहना है कि अब बाबा-दादा के समय वाला उत्साह नहीं रही। महंगाई बढ़ गई है और लोगों को भी अब सिर्फ त्योहार पर ही थोड़ी बहुत इस कला की याद आती है। कुम्हार आज भी 30 रुपये सैकड़ा दिये बेच रहे हैं जबकि लोग मॉल और दुकानों से महंगे दिये खरीद लेते हैं। कुम्हारी कला के हुनरमंदों की माने तो अब सिर्फ परंपरा के रूप में परिवार ये हुनर ढो रहे हैं। माटी कला योजना को सुनकर उनके अंदर कुछ उत्साह जगा था लेकिन उसमें भी हाथ खाली रहे। ऐसे में उनके चाक घूम तो रहे हैं पर महंगी मिट्टी व ईंधन के कारण मजदूरी भी नहीं मिल पा रही है। (संवाद)
अब तो कला से माटी ने ही बना ली दूरी
ग्राम विनायका अकबरपुर में दिये बनाते गंगा प्रसाद ने कहा कि अब तो माटी ने ही माटी कला से दूरी बनाना शुरू कर दिया है। पहले जहां मिट्टी की ट्राली 700 रुपये के करीब थी तो अब 1800 रुपये में उपलब्ध हो पा रही है। ऐेसे में कुम्हार इसे लेने में असमर्थ र्हैं। इंधन भी महंगा होता जा रहा है।
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दिहाड़ी भी नहीं निकल पा रही
कुम्हारी कला से जुड़ी लक्ष्मी व रामश्री का कहना है कि उनका दो से तीन लोगों का परिवार लगातार कुम्हारी कला में जुटा रहता है लेकिन बर्तन व दियों की बिक्री को देखकर हिसाब लगाते हैं तो पता चलता है कि दिहाड़ी भी नहीं निकल पा रही है।
चुकरिया 80 पैसे तो दिये 30 रुपये सैकड़ा
कुम्हार रामनरेश, रामपाल, जागेश्वर व गुड्डू का कहना है कि महंगाई बढ़ गई लेकिन चुकरिया आज भी 80 पैसे व दिया 30 रुपये सैकड़ा ही बिक रहे हैं।
आठ के आए आवेदन, तीन को मिला अनुदान
खादी ग्रामोद्योग विभाग ने पहली बार माटी कला योजना शुरू की तो जिले से आठ आवेदन किए गए। लेकिन इनमें से सिर्फ तीन को बैंकों के माध्यम से एक लाख 90 हजार रुपये का अनुदान मिल सका। पांच आवेदक राह तकते रह गए।
225 को नहीं मिल पाईं किटें
उद्योग केंद्र की ओर से विश्वकर्मा योजना चलाई गई जिसमें कुम्हारी कला के लोगों के लिए किटों का वितरण किया जाना था। 250 से अधिक ने आवेदन किया, लेकिन किटें 25 को ही मिल सकीं।
कुम्हारों को योजना का पता ही नहीं
कुम्हारों का कहना है कि विश्वकर्मा योजना हो या माटी कला उन्हें इसका पता ही नहीं चला कि आवेदन कब मांगे गए।
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भरखनी ब्लाक के ग्राम विनायका अकबरपुर में 15 कुम्हारों के परिवार रहते हैं। कुम्हारों का कहना है कि अब बाबा-दादा के समय वाला उत्साह नहीं रही। महंगाई बढ़ गई है और लोगों को भी अब सिर्फ त्योहार पर ही थोड़ी बहुत इस कला की याद आती है। कुम्हार आज भी 30 रुपये सैकड़ा दिये बेच रहे हैं जबकि लोग मॉल और दुकानों से महंगे दिये खरीद लेते हैं। कुम्हारी कला के हुनरमंदों की माने तो अब सिर्फ परंपरा के रूप में परिवार ये हुनर ढो रहे हैं। माटी कला योजना को सुनकर उनके अंदर कुछ उत्साह जगा था लेकिन उसमें भी हाथ खाली रहे। ऐसे में उनके चाक घूम तो रहे हैं पर महंगी मिट्टी व ईंधन के कारण मजदूरी भी नहीं मिल पा रही है। (संवाद)
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अब तो कला से माटी ने ही बना ली दूरी
ग्राम विनायका अकबरपुर में दिये बनाते गंगा प्रसाद ने कहा कि अब तो माटी ने ही माटी कला से दूरी बनाना शुरू कर दिया है। पहले जहां मिट्टी की ट्राली 700 रुपये के करीब थी तो अब 1800 रुपये में उपलब्ध हो पा रही है। ऐेसे में कुम्हार इसे लेने में असमर्थ र्हैं। इंधन भी महंगा होता जा रहा है।
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दिहाड़ी भी नहीं निकल पा रही
कुम्हारी कला से जुड़ी लक्ष्मी व रामश्री का कहना है कि उनका दो से तीन लोगों का परिवार लगातार कुम्हारी कला में जुटा रहता है लेकिन बर्तन व दियों की बिक्री को देखकर हिसाब लगाते हैं तो पता चलता है कि दिहाड़ी भी नहीं निकल पा रही है।
चुकरिया 80 पैसे तो दिये 30 रुपये सैकड़ा
कुम्हार रामनरेश, रामपाल, जागेश्वर व गुड्डू का कहना है कि महंगाई बढ़ गई लेकिन चुकरिया आज भी 80 पैसे व दिया 30 रुपये सैकड़ा ही बिक रहे हैं।
आठ के आए आवेदन, तीन को मिला अनुदान
खादी ग्रामोद्योग विभाग ने पहली बार माटी कला योजना शुरू की तो जिले से आठ आवेदन किए गए। लेकिन इनमें से सिर्फ तीन को बैंकों के माध्यम से एक लाख 90 हजार रुपये का अनुदान मिल सका। पांच आवेदक राह तकते रह गए।
225 को नहीं मिल पाईं किटें
उद्योग केंद्र की ओर से विश्वकर्मा योजना चलाई गई जिसमें कुम्हारी कला के लोगों के लिए किटों का वितरण किया जाना था। 250 से अधिक ने आवेदन किया, लेकिन किटें 25 को ही मिल सकीं।
कुम्हारों को योजना का पता ही नहीं
कुम्हारों का कहना है कि विश्वकर्मा योजना हो या माटी कला उन्हें इसका पता ही नहीं चला कि आवेदन कब मांगे गए।

फोटो-12-मिट्टी तैयार करती लक्ष्मी। संवाद- फोटो : HARDOI

फोटो-13-मटका सुखाती रामश्री। संवाद- फोटो : HARDOI