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Hardoi News: पुनर्जीवन से पहले जलाशय की प्रकृति का अध्ययन जरूरी

Fri, 19 Jan 2024 01:57 AM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, हरदोई
संवाद न्यूज एजेंसी, हरदोई Updated Fri, 19 Jan 2024 01:57 AM IST
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It is necessary to study the nature of the reservoir before revitalization.
हरदोई। तालाबों की खोदाई और पुनर्जीवित करने मात्र से भूगर्भ जल रिचार्ज नहीं होने लगता है। इसके लिए उसकी प्रकृति का अध्ययन जरूरी है। जलाशय की प्रकृति के अनुसार ही प्राकृतिक तरीकों से उनका संरक्षण, संवर्धन और जीर्णोद्धार बारिश की एक-एक बूंद को बचाने और सभी को पानी उपलब्ध कराने में कारगर साबित होगा। सैटेलाइट व रिमोट सेंसिंग से सर्वेक्षण कर जल निकाय के संबंध में पूरी जानकारी हासिल की जा सकती है।
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विकास भवन सभागार में जल निकायों के सैटेलाइट व रिमोट सेंसिंग आधारित सर्वेक्षण विषयक कार्यशाला में वैज्ञानिकों ने अधिकारियों को जानकारी दी। लखनऊ के केंद्रीय बाबा साहब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर डॉ. वेंकटेश दत्ता, रिमोट सेंसिंग केंद्र के वैज्ञानिक आलोक सैनी ने जल संरक्षण और जल निकायों के जीर्णोद्धार के समय प्रकृति को भी सुरक्षित रखने के तरीकों को बताया।
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वैज्ञानिकों ने बताया कि वेटलैंड, जलाशय, तालाब आदि को पुनर्जीवित किए जाने से पहले प्री और पोस्ट मानसून पानी की स्थिति, पानी आने के स्रोत, ट्रीटमेंट कैसे किया जाए, जैव विविधता का ध्यान रखते हुए कार्ययोजना बनाई जाए। वेटलैंड में मैनुअली काम कराया जाना चाहिए। उपायुक्त आरपी सिंह, पीडी गजेंद्र तिवारी, डीएसटीओ डॉ. रामप्रकाश, एसडीओ वन विभाग डॉ. अर्चना रावत सहित तहसीलदार, बीडीओ आदि मौजूद रहे।
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जलकुंभी को रोकने के लिए कमल बोए
वैज्ञानिक डॉ. वेंकटेश दत्ता ने अधिकारियों की एक जिज्ञासा को शांत करते हुए बताया कि जलकुंभी आक्रामक पौधा है। यह फास्फेट और नाइट्रेट की पानी में अधिक मात्रा से स्वयं पैदा होता है। जलकुंभी को रोकने के लिए कमल को बोना चाहिए। ऐसे जल स्रोतों के में आने वाले नाला-नालियों के इनलेट के आसपास लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़ों को बिछा देना चाहिए। जिससे पानी में आने वाले फास्फेट और नाइट्रेट को यह लकड़ी सोख लेगी।



पांच हजार साल पहले रिचार्ज हुए पानी को आज पी रहे हैं हम
बाबा साहब भीमराव डॉ. आंबेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. वेंकटेश दत्ता ने कार्यशाला में कहा कि आज हम भूगर्भ जल दोहन कर जो पानी पी रहें हैं, वह हमारे पूर्वजों ने करीब पांच हजार साल पर संरक्षित किया था। करीब पांच हजार साल पहले रिचार्ज हुए पानी को जब अब हम पा रहे तो, कल्पना करें कि जो पानी हम रिचार्ज करेंगे वह भूगर्भ जल के रूप कब भावी पीढ़ी को मिलेगा। प्रयोगशाला में जांच में पानी की आयु साढ़े तीन हजार से पांच हजार साल आ रही है।
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