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बजट मिले तो बने पॉलिटेक्निक भवन
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संडीला। 2010 में संडीला में पॉलिटेक्निक कॉलेज को मंजूरी मिली थी, लेकिन भवन अब तक बजट के अभाव में अधूरा पड़ा है। इससे मेधावी छात्र-छात्राओं को कानपुर, लखनऊ, सीतापुर जाना पड़ता है। अगर भवन पूरा हो जाए तो छात्रों को इधर-उधर भटकना नहीं पड़ेगा।
2010 में बेनीगंज मार्ग स्थित मिनी स्टेडियम के पास पॉलिटेक्निक के भवन का निर्माण शुरू हुआ था। जिस भूमि पर भवन बन रहा था, विवाद हो गया। जब विवाद का निराकरण हुआ तो बजट का अभाव हो गया।
अब कार्यदायी संस्था को बजट मिले तो कार्य शुरू हो। 15 फरवरी 2010 को इस परियोजना को स्वीकृति मिली, तो तब बजट छह करोड़ 45 लाख 42 हजार मिला था।
इसके बाद करीब पांच वर्ष तक भूमि विवाद में कार्य रुका रहा। इसके बाद महंगाई बढ़ गई। दोबारा के बजट में इसकी कीमत दो गुना हो गई, जो लगभग 12 करोड़ 79 लाख 65 हजार रुपये हो गई है।
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अब इसके पूर्ण निर्माण के लिए तीन करोड़ की और जरूरत है। इसमें पेंटिंग, रास्ता, शीशे आदि का कार्य होना है। परियोजना में प्रशासनिक भवन, हॉस्टल, बाउंड्रीवाल, पाइप लाइन, गार्ड रूम, सड़क, बोरिंग आदि की व्यवस्था होनी थी।
कार्यदायी संस्था राजकीय निर्माण निगम के एई पंकज वर्मा ने बताया कि परियोजना को पूरा करने के लिए तीन करोड़ रुपये की आवश्यकता है। शासन को लिखा जा चुका है।
संस्था की तरफ से कोई देरी नहीं की गई। पहले जमीन विवाद के कारण स्टे हो गया और काम रुक गया। अब बजट नहीं मिल सका है।
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2010 में बेनीगंज मार्ग स्थित मिनी स्टेडियम के पास पॉलिटेक्निक के भवन का निर्माण शुरू हुआ था। जिस भूमि पर भवन बन रहा था, विवाद हो गया। जब विवाद का निराकरण हुआ तो बजट का अभाव हो गया।
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अब कार्यदायी संस्था को बजट मिले तो कार्य शुरू हो। 15 फरवरी 2010 को इस परियोजना को स्वीकृति मिली, तो तब बजट छह करोड़ 45 लाख 42 हजार मिला था।
इसके बाद करीब पांच वर्ष तक भूमि विवाद में कार्य रुका रहा। इसके बाद महंगाई बढ़ गई। दोबारा के बजट में इसकी कीमत दो गुना हो गई, जो लगभग 12 करोड़ 79 लाख 65 हजार रुपये हो गई है।
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अब इसके पूर्ण निर्माण के लिए तीन करोड़ की और जरूरत है। इसमें पेंटिंग, रास्ता, शीशे आदि का कार्य होना है। परियोजना में प्रशासनिक भवन, हॉस्टल, बाउंड्रीवाल, पाइप लाइन, गार्ड रूम, सड़क, बोरिंग आदि की व्यवस्था होनी थी।
कार्यदायी संस्था राजकीय निर्माण निगम के एई पंकज वर्मा ने बताया कि परियोजना को पूरा करने के लिए तीन करोड़ रुपये की आवश्यकता है। शासन को लिखा जा चुका है।
संस्था की तरफ से कोई देरी नहीं की गई। पहले जमीन विवाद के कारण स्टे हो गया और काम रुक गया। अब बजट नहीं मिल सका है।