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अनिल को तीर बना नरेश - नितिन के दुर्ग को भेदने की कोशिश में सपा
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सपा मुखिया अखिलेश यादव के साथ पूर्व विधायक अनिल वर्मा। संवाद
- फोटो : HARDOI
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हरदोई। यूं तो सपा और सुभासपा की संयुक्त जनसभा शनिवार को संडीला विधानसभा क्षेत्र के झाबर मैदान में हुई, लेकिन इसके बाद सदर विधानसभा क्षेत्र की सियासत गरमा गई। दरअसल, पूर्व विधायक अनिल वर्मा की सपा में हुई वापसी ने सदर विधानसभा क्षेत्र की चुनावी सरगर्मी अचानक बढ़ा दी है। अनिल का सपा में शामिल होना अखिलेश यादव की विधानसभा उपाध्यक्ष नितिन अग्रवाल को उनके ही गढ़ में घेरने की चुनावी रणनीति मानी जा रही है।
सदर सीट कद्दावर नेता नरेश अग्रवाल की परंपरागत सीट है। नरेश अग्रवाल खुद कभी इस सीट से चुनाव नहीं हारे, तो उनके पुत्र विधानसभा के उपाध्यक्ष नितिन अग्रवाल भी अब तक अपराजित ही हैं। नरेश और नितिन के चुनावी कॅरियर में मात देने की रणनीति तो कई बार बनी, लेकिन यह दुर्ग भेदा नहीं जा सका। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए सपा ने बेहद गोपनीय ढंग से नितिन अग्रवाल को उनके ही गढ़ में घेरने की रणनीति बनाई है। इसी रणनीति के तहत सपा ने शनिवार को आयोजित जनसभा में अनिल वर्मा को पार्टी में शामिल किया है। पार्टी से जुड़े विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि अनिल वर्मा को सदर से चुनाव लड़ाने के लिए पार्टी ने तैयारी करने को कहा है। इससे इतर कहीं न कहीं नरेश और नितिन विरोधी भी अनिल को मजबूत प्रत्याशी मानकर चल रहे हैं।
खुद अनिल वर्मा ने अमर उजाला से हुई बातचीत में स्वीकार किया कि वे सदर विधानसभा क्षेत्र से सपा के टिकट पर चुनाव लड़के के इच्छुक हैं। पार्टी के स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक ने उनसे तैयारी करने की बात कहते हुए टिकट के लिए भी आश्वस्त किया है।
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अनिल वर्मा का अब तक का राजनीतिक सफर
अनिल वर्मा मूल रूप से बावन विकास खंड की ग्राम पंचायत सारंगापुर के निवासी हैं। वर्ष 1991-92 शिक्षा सत्र में सीएसएन डिग्री कालेज छात्रसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। उनके चाचा छोटेलाल वर्ष 1993 में बसपा और 1996 में भाजपा के टिकट पर तत्कालीन बावन-हरियावां सीट से विधायक चुने गए थे। 1999 में उनके निधन के बाद उपचुनाव हुआ था। तब भाजपा के टिकट पर अनिल वर्मा पहली बार चुनाव लड़े थे, लेकिन बसपा प्रत्याशी शिव प्रसाद वर्मा से 1200 वोट से हार गए थे। वर्ष 2002 के आम चुनाव में अनिल भाजपा के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए। इसके बाद सीधे 2012 का चुनाव उन्होंने सपा के टिकट पर बालामऊ सीट से लड़ा और जीत हासिल की। वर्ष 2017 का चुनाव भी अनिल वर्मा ने नहीं लड़ा था।
...तो जातीय आंकड़ों पर मंथन के बाद अनिल हुए सपाई
सपा से जुड़े विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि पार्टी किसी भी हाल में सदर सीट से नितिन अग्रवाल को मात देने की कवायद में लगी है। इस कवायद में जब जातिगत आंकड़े खंगाले गए, तो काफी कुछ स्पष्ट हुआ। दरअसल, सदर विधानसभा क्षेत्र में सबसे अधिक मतदाता पासी बिरादरी के हैं। कुल मतदाताओं के 15.17 फीसदी मतदाता पासी बिरादरी के हैं। अनिल वर्मा इसी बिरादरी से आते हैं। इसके अलावा 7.57 फीसदी मुस्लिम, 4.06 फीसदी यादव और 10.32 फीसदी रैदास मतदाता भी इस क्षेत्र में निर्णायक की भूमिका में हैं। इसी क्षेत्र में ब्राह्मण 10.84 फीसदी, 14.92 फीसदी क्षत्रिय और 4.87 फीसदी बनिया मतदाता भी हैं। इन आंकड़ों पर गौर करने के बाद ही अनिल सपाई हुए और सपा ने भी उन्हें हाथों हाथ लिया।
कोशिश बहुत हुईं, मगर अभेद्य ही रहा दुर्ग
सदर विधानसभा क्षेत्र की बात की जाए तो यह नरेश और नितिन का अभेद्य दुर्ग ही रहा है। कई बार नरेश अग्रवाल और नितिन अग्रवाल को घेरने की कोशिश हुई, लेकिन अब तक यह कोशिशें सफल नहीं हुईं। नरेश अग्रवाल वर्ष 1980,1989, 1991, 1993, 1996, 2002 और 2007 में इस सीट से विधायक चुने गए। वर्ष 1991 की राम लहर में बेहद नजदीकी मुकाबला हुआ था और तब भी नरेश अग्रवाल 1017 वोटों से चुनाव जीत गए थे। नितिन अग्रवाल 2008 के उपचुनाव में और 2012 व 2017 के चुनाव में विधायक निर्वाचित हुए। 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के राजाबख्श सिंह को लगभग पांच हजार वोटों से हराया था।
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सदर सीट कद्दावर नेता नरेश अग्रवाल की परंपरागत सीट है। नरेश अग्रवाल खुद कभी इस सीट से चुनाव नहीं हारे, तो उनके पुत्र विधानसभा के उपाध्यक्ष नितिन अग्रवाल भी अब तक अपराजित ही हैं। नरेश और नितिन के चुनावी कॅरियर में मात देने की रणनीति तो कई बार बनी, लेकिन यह दुर्ग भेदा नहीं जा सका। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए सपा ने बेहद गोपनीय ढंग से नितिन अग्रवाल को उनके ही गढ़ में घेरने की रणनीति बनाई है। इसी रणनीति के तहत सपा ने शनिवार को आयोजित जनसभा में अनिल वर्मा को पार्टी में शामिल किया है। पार्टी से जुड़े विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि अनिल वर्मा को सदर से चुनाव लड़ाने के लिए पार्टी ने तैयारी करने को कहा है। इससे इतर कहीं न कहीं नरेश और नितिन विरोधी भी अनिल को मजबूत प्रत्याशी मानकर चल रहे हैं।
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खुद अनिल वर्मा ने अमर उजाला से हुई बातचीत में स्वीकार किया कि वे सदर विधानसभा क्षेत्र से सपा के टिकट पर चुनाव लड़के के इच्छुक हैं। पार्टी के स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक ने उनसे तैयारी करने की बात कहते हुए टिकट के लिए भी आश्वस्त किया है।
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अनिल वर्मा का अब तक का राजनीतिक सफर
अनिल वर्मा मूल रूप से बावन विकास खंड की ग्राम पंचायत सारंगापुर के निवासी हैं। वर्ष 1991-92 शिक्षा सत्र में सीएसएन डिग्री कालेज छात्रसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। उनके चाचा छोटेलाल वर्ष 1993 में बसपा और 1996 में भाजपा के टिकट पर तत्कालीन बावन-हरियावां सीट से विधायक चुने गए थे। 1999 में उनके निधन के बाद उपचुनाव हुआ था। तब भाजपा के टिकट पर अनिल वर्मा पहली बार चुनाव लड़े थे, लेकिन बसपा प्रत्याशी शिव प्रसाद वर्मा से 1200 वोट से हार गए थे। वर्ष 2002 के आम चुनाव में अनिल भाजपा के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए। इसके बाद सीधे 2012 का चुनाव उन्होंने सपा के टिकट पर बालामऊ सीट से लड़ा और जीत हासिल की। वर्ष 2017 का चुनाव भी अनिल वर्मा ने नहीं लड़ा था।
...तो जातीय आंकड़ों पर मंथन के बाद अनिल हुए सपाई
सपा से जुड़े विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि पार्टी किसी भी हाल में सदर सीट से नितिन अग्रवाल को मात देने की कवायद में लगी है। इस कवायद में जब जातिगत आंकड़े खंगाले गए, तो काफी कुछ स्पष्ट हुआ। दरअसल, सदर विधानसभा क्षेत्र में सबसे अधिक मतदाता पासी बिरादरी के हैं। कुल मतदाताओं के 15.17 फीसदी मतदाता पासी बिरादरी के हैं। अनिल वर्मा इसी बिरादरी से आते हैं। इसके अलावा 7.57 फीसदी मुस्लिम, 4.06 फीसदी यादव और 10.32 फीसदी रैदास मतदाता भी इस क्षेत्र में निर्णायक की भूमिका में हैं। इसी क्षेत्र में ब्राह्मण 10.84 फीसदी, 14.92 फीसदी क्षत्रिय और 4.87 फीसदी बनिया मतदाता भी हैं। इन आंकड़ों पर गौर करने के बाद ही अनिल सपाई हुए और सपा ने भी उन्हें हाथों हाथ लिया।
कोशिश बहुत हुईं, मगर अभेद्य ही रहा दुर्ग
सदर विधानसभा क्षेत्र की बात की जाए तो यह नरेश और नितिन का अभेद्य दुर्ग ही रहा है। कई बार नरेश अग्रवाल और नितिन अग्रवाल को घेरने की कोशिश हुई, लेकिन अब तक यह कोशिशें सफल नहीं हुईं। नरेश अग्रवाल वर्ष 1980,1989, 1991, 1993, 1996, 2002 और 2007 में इस सीट से विधायक चुने गए। वर्ष 1991 की राम लहर में बेहद नजदीकी मुकाबला हुआ था और तब भी नरेश अग्रवाल 1017 वोटों से चुनाव जीत गए थे। नितिन अग्रवाल 2008 के उपचुनाव में और 2012 व 2017 के चुनाव में विधायक निर्वाचित हुए। 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के राजाबख्श सिंह को लगभग पांच हजार वोटों से हराया था।