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हरदोई जिपं अध्यक्ष चुनाव: पति की तपस्या का प्रेमा ने पाया फल, पिता बेचते थे कोयला, पीके ने संघर्षों से सब कुछ बनाया
Sat, 03 Jul 2021 10:57 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हरदोई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हरदोई
Published by: शिखा पांडेय
Updated Sat, 03 Jul 2021 10:57 PM IST
सार
जब जिला पंचायत अध्यक्ष का पद अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित होने की सुगबुगाहट हुई तो पीके ने रणनीति बनाकर तैयारी शुरू कर दी। पति के इन संघर्षों का फल ही प्रेमावती को जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी के रूप में मिला है।
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पति पीके वर्मा के साथ प्रेमावती
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हरदोई में जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं प्रेमावती को उनके पति प्रदीप कुमार उर्फ पीके वर्मा के संघर्षों का फल मिला है। हालात के मुताबिक पीके वर्मा राजनीतिक दल भले ही बदलते रहे हों, लेकिन सामाजिक कार्यों के साथ राजनीति में उनकी सक्रियता बनी रही।
कभी राज्य अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य रहे पीके वर्मा ने विधानसभा चुनाव में टिकट हासिल करने के लिए छह माह पहले ही पद छोड़ दिया था। प्रेमावती दो विषयों से परास्नातक हैं। वर्ष की शुरुआत तक वह बावन विकास खंड में सहायक अध्यापिका के पद पर तैनात थीं।
चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी। उनका खुद का भले ही कोई राजनीतिक जीवन न रहा हो, लेकिन पति पीके वर्मा दो दशक से राजनीति में सक्रिय हैं। सिविल इंजीनियर पीके वर्मा धोबी बिरादरी से आते हैं।
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राजनीति में वर्ष 2000 से सक्रिय पीके वर्मा ने वर्ष 2007 में तत्कालीन बावन-हरियावां विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था, लेकिन तीसरे स्थान पर रहे थे। इसके बाद वह सत्ता के साथ दल बदलते रहे। सपा सरकार में वर्ष 2015 में हुए पंचायत चुनाव में छोटे भाई की पत्नी रंजिता को सांडी का ब्लाक प्रमुख बनवाने में भी पीके वर्मा कामयाब हो गए थे।
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कभी राज्य अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य रहे पीके वर्मा ने विधानसभा चुनाव में टिकट हासिल करने के लिए छह माह पहले ही पद छोड़ दिया था। प्रेमावती दो विषयों से परास्नातक हैं। वर्ष की शुरुआत तक वह बावन विकास खंड में सहायक अध्यापिका के पद पर तैनात थीं।
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चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी। उनका खुद का भले ही कोई राजनीतिक जीवन न रहा हो, लेकिन पति पीके वर्मा दो दशक से राजनीति में सक्रिय हैं। सिविल इंजीनियर पीके वर्मा धोबी बिरादरी से आते हैं।
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राजनीति में वर्ष 2000 से सक्रिय पीके वर्मा ने वर्ष 2007 में तत्कालीन बावन-हरियावां विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था, लेकिन तीसरे स्थान पर रहे थे। इसके बाद वह सत्ता के साथ दल बदलते रहे। सपा सरकार में वर्ष 2015 में हुए पंचायत चुनाव में छोटे भाई की पत्नी रंजिता को सांडी का ब्लाक प्रमुख बनवाने में भी पीके वर्मा कामयाब हो गए थे।
सपा सरकार में ही अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य रहे और वर्ष 2016 की दूसरी छमाही में उन्होंने पद छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में वह सांडी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के टिकट के दावेदार थे, लेकिन टिकट नहीं मिला था।
वर्ष 2019 में उन्होंने हरदोई लोकसभा क्षेत्र से टिकट के लिए दावेदारी की थी, लेकिन इसमें भी सफलता नहीं मिली। जब जिला पंचायत अध्यक्ष का पद अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित होने की सुगबुगाहट हुई तो पीके ने रणनीति बनाकर तैयारी शुरू कर दी। पति के इन संघर्षों का फल ही प्रेमावती को जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी के रूप में मिला है।
पिता बेचते थे कोयला, संघर्षों से सब कुछ पीके ने बनाया
पीके वर्मा के पिता राजाराम वर्मा नुमाइश चौराहा के निकट कोयला बेचते थे। पिता राजाराम वर्मा ने काफी संघर्ष कर पीके वर्मा को पढ़ाया-लिखाया। पीके वर्मा सिविल इंजीनियर बने तो फिर उन्होंने छोटे भाइयों को पढ़ा-लिखाकर इस स्थिति में पहुंचा दिया कि अधिकांश सरकारी सेवा में हो गए। कोई शिक्षक हुआ तो कोई लिपिक और कोई ग्राम सचिव। पीके वर्मा जो एक बार आगे बढ़े तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
वर्ष 2019 में उन्होंने हरदोई लोकसभा क्षेत्र से टिकट के लिए दावेदारी की थी, लेकिन इसमें भी सफलता नहीं मिली। जब जिला पंचायत अध्यक्ष का पद अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित होने की सुगबुगाहट हुई तो पीके ने रणनीति बनाकर तैयारी शुरू कर दी। पति के इन संघर्षों का फल ही प्रेमावती को जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी के रूप में मिला है।
पिता बेचते थे कोयला, संघर्षों से सब कुछ पीके ने बनाया
पीके वर्मा के पिता राजाराम वर्मा नुमाइश चौराहा के निकट कोयला बेचते थे। पिता राजाराम वर्मा ने काफी संघर्ष कर पीके वर्मा को पढ़ाया-लिखाया। पीके वर्मा सिविल इंजीनियर बने तो फिर उन्होंने छोटे भाइयों को पढ़ा-लिखाकर इस स्थिति में पहुंचा दिया कि अधिकांश सरकारी सेवा में हो गए। कोई शिक्षक हुआ तो कोई लिपिक और कोई ग्राम सचिव। पीके वर्मा जो एक बार आगे बढ़े तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।