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Hardoi News: आर्थिक निर्भरता ने खोली गलत और हिंसक रिश्तों से निकलने की राह

Wed, 25 Feb 2026 10:50 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Wed, 25 Feb 2026 10:50 PM IST
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Economic dependence opens the way out of abusive and violent relationships
हरदोई। भारतीय समाज में शादी को न सिर्फ इस जीवन बल्कि सात जन्मों का बंधन माना जाता रहा है। पिछले कुछ वर्ष में सामाजिक ढांचे में हुए बदलाव और बढ़ती आत्मनिर्भरता ने हालात तेजी से बदले हैं। कभी न्यायालय में तलाक के लिए सिर्फ पुरुष ही पहल करते थे लेकिन अब बड़ी संख्या में महिलाएं भी विवाह विच्छेद के लिए पहल करते हुए वाद दर्ज करा रही हैं।
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सामाजिक ढांचा कुछ इस तरह का था कि महिलाएं पारिवारिक उत्पीड़न भी झेलती थीं। परिवार का मान, कुनबे की मर्यादा का ख्याल कर महिलाएं दहेज और मानसिक उत्पीड़न का भी सामना करती रहीं। अब बदले माहौल में परिवार न्यायालयों के आंकड़े बताते हैं कि तलाक की याचिकाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ी है। यह बदलाव सिर्फ कानून का नहीं बल्कि समाज के विचारों में हुए बदलाव का भी संकेत है। आर्थिक निर्भरता के कारण भी महिलाएं टूटते रिश्तों को निभाने की भरपूर कोशिश करती थीं लेकिन अब सम्मान, सुरक्षा और आत्मसम्मान के लिए महिलाएं कानूनी लड़ाई लड़ने से भी नहीं हिचक रहीं।
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केस-1
दहेज उत्पीड़न से परेशान शिक्षिका ने मांगा तलाक

हरदोई की एक शिक्षिका का विवाह कानपुर निवासी एक शिक्षक से हुआ है। शिक्षिका ने पति और ससुरालीजनों पर दहेज उत्पीड़न, मानसिक उत्पीड़न और पीटने का आरोप लगाया। महिला का दावा है कि नौकरी में होने के बाद भी उससे दहेज में नकदी और कार की मांग की जा रही थी। परेशान होकर शिक्षिका ने परिवार न्यायालय में तलाक का वाद दर्ज करा दिया है।
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केस-2

शराबी पति से छुटकारा पाने कोर्ट पहुंची महिला
जनपद के एक कस्बा निवासी महिला ने परिवार न्यायालय में तलाक के लिए याचिका दाखिल की। दावा है कि पति शराब का आदी है। शराब के नशे में उनको पीटता है। नशेबाजी के कारण बच्चों की पढ़ाई और परिवार की आर्थिक स्थिति गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।

केस-3

कॅरिअर विवाद में टूटा रिश्ता
शहर के एक प्रतिष्ठित परिवार की कारोबारी महिला ने भी परिवार न्यायालय में तलाक का मामला दर्ज कराया है। महिला का आरोप है कि पति उन पर नौकरी छोड़ने का दबाव बनाते हैं। स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का भी आरोप है। लगातार इस वजह से हो रहे विवाद के कारण मामला न्यायालय तक पहुंच गया।



-मृदुल श्रीवास्तव कहते हैं कि पहले घरेलू हिंसा और शराब की आदत पर महिलाएं चुप रहती थीं। अब महिलाओं ने चुप्पी तोड़कर कानूनी रास्ता अपनाना शुरू किया है।

-परामर्शदाता आलोक द्विवेदी बताते है कि पूर्व में तलाक को सामाजिक कलंक के तौर पर देखा जाता था। अब बदले परिवेश में तलाक को असफल विवाह से बाहर निकलने का वैध विकल्प माना जाने लगा है।




-परामर्श दाता अरविंद त्रिपाठी बताते है कि महिलाएं आत्मनिर्भर हुई हैं। इससे वह आर्थिक रूप से दूसरे पर निर्भर नहीं रह गई हैं। ऐसे में वे गलत और हिंसक रिश्तों से बाहर निकलने का साहस कर पा रही हैं।
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