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विकलांगता दिखाने को कर रहे चिरौरी
ब्यूरो/अमर उजाला, हरदोई
Updated Wed, 14 Jan 2015 12:23 AM IST
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विकलांगता अभिशाप नहीं है, पर जिला अस्पताल अपने को विकलांग साबित करने को
विकलांगों का काफी दिक्कतें उठानी पड़ती हैं। मंगलवार को जिला अस्पताल में
अपने को विकलांग साबित करने पहुंचे विकलांगों को ऐसे ही कटु अनुभव से
गुजरना पड़ा।
उधर, जिला अस्पताल में दोनों पैरों से विकलांग (60) वर्षीय हेमनाथ निवासी रहुला बिलग्राम से अपनी पत्नी के साथ पहुंचे। उनकी पत्नी फार्म तो ले आई, पर उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। वह इध्रर से उधर भटक रही थी। यहीं हाल शहर के नघेटा से आए सुरेश का था। वह अपनी पुत्री पूनम का प्रमाण पत्र बनवाने पहुंचे थे।
वहीं हरपालपुर के ग्राम मुर्चा निवासी दस वर्षीय मोनी अपने विकलांगता को साबित करने को परिजनों के साथ भटक रही थी। देहात कोतवाली के मोहन पुरवा के पुष्पेंद्र पुत्र रंजीत भी परेशान भटक रहे थे। उनका कहना था कि जब फार्म नहीं मिल रहे तो प्रमाण पत्र कैसे बनेगा।
उधर, शहर के एक व्यक्ति का विकलांग प्रमाण पत्र पहले बना था। जिसमें विकलांगता 40 फीसदी थी, पर अबकी कर्मचारी की बात न मानने पर विकलांगता घटकर 25 फीसदी रह गई। इससे वह परेशान भटक रहे थे। उधर, विकलांग प्रमाण पत्र को आवेदक को एक निर्धारित प्रारूप पर आवेदन करना होता है।
जिसमें निवास व आयु का प्रमाण पत्र लगाना होता है। उसके बाद उसका पंजीकरण किया जाता है। विकलांग का परीक्षण संबंधित डॉक्टर करता है और उसी पर प्रमाण पत्र निर्गत किया जाता है। उधर, सीएमओ डा. वीके गुप्ता से जब फार्म की बिक्री व विकलांग के शोषण के विषय में पूछा गया तो बोले, व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए हैं।
उधर, जिला अस्पताल में दोनों पैरों से विकलांग (60) वर्षीय हेमनाथ निवासी रहुला बिलग्राम से अपनी पत्नी के साथ पहुंचे। उनकी पत्नी फार्म तो ले आई, पर उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। वह इध्रर से उधर भटक रही थी। यहीं हाल शहर के नघेटा से आए सुरेश का था। वह अपनी पुत्री पूनम का प्रमाण पत्र बनवाने पहुंचे थे।
वहीं हरपालपुर के ग्राम मुर्चा निवासी दस वर्षीय मोनी अपने विकलांगता को साबित करने को परिजनों के साथ भटक रही थी। देहात कोतवाली के मोहन पुरवा के पुष्पेंद्र पुत्र रंजीत भी परेशान भटक रहे थे। उनका कहना था कि जब फार्म नहीं मिल रहे तो प्रमाण पत्र कैसे बनेगा।
उधर, शहर के एक व्यक्ति का विकलांग प्रमाण पत्र पहले बना था। जिसमें विकलांगता 40 फीसदी थी, पर अबकी कर्मचारी की बात न मानने पर विकलांगता घटकर 25 फीसदी रह गई। इससे वह परेशान भटक रहे थे। उधर, विकलांग प्रमाण पत्र को आवेदक को एक निर्धारित प्रारूप पर आवेदन करना होता है।
जिसमें निवास व आयु का प्रमाण पत्र लगाना होता है। उसके बाद उसका पंजीकरण किया जाता है। विकलांग का परीक्षण संबंधित डॉक्टर करता है और उसी पर प्रमाण पत्र निर्गत किया जाता है। उधर, सीएमओ डा. वीके गुप्ता से जब फार्म की बिक्री व विकलांग के शोषण के विषय में पूछा गया तो बोले, व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए हैं।