{"_id":"b9fca4fdeac9a6e5acc2cabb2a03fe12","slug":"deal-with-sensitive-as-intellectual-challenges-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"बुद्धिजीवी संवेदनशील बन चुनौतियों से निपटें","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बुद्धिजीवी संवेदनशील बन चुनौतियों से निपटें
ब्यूरो/अमर उजाला, हरदोई
Updated Mon, 13 Apr 2015 12:49 AM IST
विज्ञापन
संवाद संस्था के तत्वावधान में रविवार को सरस्वती सदन
विज्ञापन
सभागार में डा. आलोक टंडन की पुस्तक समय से संवाद को लेकर हुई परिचर्चा
में प्रोफेसर अखिलेश बाजपेई ने कहा कि बुद्धिजीवी को बुद्धिधर्मी बनना
होगा।
परिचर्चा को शुरू करते हुए प्रोफेसर बाजपेई ने कहा कि बुद्धिजीवी को सकारात्मक और संवेदनशील बनकर राष्ट्रीयता, सामंती संस्कारों और पश्चिमी अंधानुकरण की चुनौती से निपटना होगा। आधुुनिक प्रौद्योगिकी पर विमर्श और विकल्प विषयक निबंध पर चर्चा करते हुए डा. एसएस अग्निहोत्री ने डा. टंडन के चिंतन और लेखन को सराहते हुए कहा कि पुस्तक समस्याओं से जोड़ती है।
कहा कि हर अवधारणा आंदोलन या तकनीक पूरी तरह सफल या असफल नहीं होती। विपणन और प्रौद्योगिकी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कहा कि हम सबको इस बात पर सजग रहना होगा कि कभी-कभी प्रौद्योगिकी विपरीत प्रभाव डालकर उपभोक्ता को गुलाम बना देती है।
डा. तारकेश्वर गुप्ता ने दलित मुक्ति कुछ वैचारिक मुद्दे पर निबंध पर कहा कि दलित कौन है और क्या समाज का वह अंतिम व्यक्ति है। उन्होंने कहा कि इस अवधारणा को राजनैतिक दलों के दायरे से बाहर निकलकर सोचना होगा। कहा कि सामाजिक समरसता, आर्थिक नियोजन पर ध्यान देकर ही दलित मुक्ति संभव है।
पुस्तक के लेखक डा. आलोक टंडन ने परिचर्चा में उपस्थित बुद्धिजीवियों के द्वारा उठाई गई जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए कहा कि आधुनिक जीवन के केंद्र में प्रौद्योगिकी हैं, जो मनुष्य और प्रकृति से उसके संबंधों में तेजी से बदलाव ला रही है। उन्होंने कहा कि इसे समझे बिना भूमंडलीय कृत आधुनिक समाज को समझा नहीं जा सकता।
उन्होंने कहा कि प्रगति के नाम पर आधुनिकता के पीछे अंधी दौड़ ने सांस्कृतिक अस्मिता का संकट भी खड़ा कर दिया है। भारत सरकार के सेवानिवृत्त सलाहकार एसएन अग्निहोत्री ने जीवन में समस्याओं को संस्थागत बनाने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि स्व को खोये बिना हमें भूमंडलीय करण स्वीकार करना होगा।
परिचर्चा को शुरू करते हुए प्रोफेसर बाजपेई ने कहा कि बुद्धिजीवी को सकारात्मक और संवेदनशील बनकर राष्ट्रीयता, सामंती संस्कारों और पश्चिमी अंधानुकरण की चुनौती से निपटना होगा। आधुुनिक प्रौद्योगिकी पर विमर्श और विकल्प विषयक निबंध पर चर्चा करते हुए डा. एसएस अग्निहोत्री ने डा. टंडन के चिंतन और लेखन को सराहते हुए कहा कि पुस्तक समस्याओं से जोड़ती है।
कहा कि हर अवधारणा आंदोलन या तकनीक पूरी तरह सफल या असफल नहीं होती। विपणन और प्रौद्योगिकी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कहा कि हम सबको इस बात पर सजग रहना होगा कि कभी-कभी प्रौद्योगिकी विपरीत प्रभाव डालकर उपभोक्ता को गुलाम बना देती है।
डा. तारकेश्वर गुप्ता ने दलित मुक्ति कुछ वैचारिक मुद्दे पर निबंध पर कहा कि दलित कौन है और क्या समाज का वह अंतिम व्यक्ति है। उन्होंने कहा कि इस अवधारणा को राजनैतिक दलों के दायरे से बाहर निकलकर सोचना होगा। कहा कि सामाजिक समरसता, आर्थिक नियोजन पर ध्यान देकर ही दलित मुक्ति संभव है।
पुस्तक के लेखक डा. आलोक टंडन ने परिचर्चा में उपस्थित बुद्धिजीवियों के द्वारा उठाई गई जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए कहा कि आधुनिक जीवन के केंद्र में प्रौद्योगिकी हैं, जो मनुष्य और प्रकृति से उसके संबंधों में तेजी से बदलाव ला रही है। उन्होंने कहा कि इसे समझे बिना भूमंडलीय कृत आधुनिक समाज को समझा नहीं जा सकता।
उन्होंने कहा कि प्रगति के नाम पर आधुनिकता के पीछे अंधी दौड़ ने सांस्कृतिक अस्मिता का संकट भी खड़ा कर दिया है। भारत सरकार के सेवानिवृत्त सलाहकार एसएन अग्निहोत्री ने जीवन में समस्याओं को संस्थागत बनाने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि स्व को खोये बिना हमें भूमंडलीय करण स्वीकार करना होगा।