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सांडी पक्षी विहार में दहर झील सूखने से रूठ गए विदेशी पक्षी

Tue, 13 Jan 2015 12:20 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, हरदोई
ब्यूरो/ अमर उजाला, हरदोई Updated Tue, 13 Jan 2015 12:20 AM IST
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Dahar lake drying upset exotic birds

कड़कड़ाती ठंड में जहां विदेशी पक्षियों की चहचहाहट और कुहू-कुहू कानों में

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रस घोल देती थी वहीं अब दहर झील में गौरैया और कौवे भी नहीं फटक रहे हैं। झील का पानी सूख चुका है और वहां की जमीन में सूखे की वजह दरारें पड़ गई हैं। इसके पीछे का प्रमुख कारण अफसरों की लापरवाही है, जिसकी वजह से झील को नहर से पानी नहीं मिल रहा है।

बुजुर्गो का कहना है कि 50 वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है कि झील इस कदर सूखी है कि खेती योग्य भूमि दिखने लगी है।  क्षेत्राधिकारी का कहना है कि जब तक प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं देगा तब तक झील अपने पुराने स्वरूप को नहीं पा सकेगी।

दुनिया के मानचित्र पर कस्बे में स्थित तीन वर्ग किलोमीटर में फैली दहर झील को पक्षी विहार के रूप में स्थान मिला है। लेकिन जिले के अफसरों के नकारापन  के चलते झील का अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है।  इस बार सांडी पक्षी विहार सूखे की मार झेल रहा है।
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यहां स्थित झील में जहां कभी पानी नहीं सूखता था वहीं इस बार पूरी झील सूखी है। स्थलीय पक्षियों में टोपीदार पीलक, कजला लटोरा, खकी पपीहा, तारदुम अबाबील, स्तेती धनेश, ब्राहमिनी स्ब्टार्लिंग, बड़ा बसन्ता, कठफोड़वा व घास के चितकबरा झसड़, पिद्दा, लाल मुनिश्या, बड़ा गैंगा, टुनटुनी फुदकी, ववई मुनिया, सादी, फुदकी, चित्तिदार मुनिया, नम भूमि के पक्षी, सफेद बुज्जा, चमचा, स्टेली अंजन, रंगीन जांधिल यहां अठखेलियां करते थे।
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सर्दी शुरू होते ही लाखों साइबेरियन पक्षी कई लाख किलोमीटर की दूरी तय करके यहां रैन बसेरा बनाते रहे हैं। जिस कारण यह झील लोगों के आकर्षण केंद्र रही है।  यह कहना गलत न होगा कि यहां झील की दशा को देखकर पता चलता है कि पक्षियाें के बजाए अब आवारा पशुओं का चारागाह हो गया है।

पक्षी बिहार के कर्मचारियों के अनुसार अब किसी से शुल्क नहीं लिया जाता है। वह पक्षी विहार अब लोगों के लिए छिपने छिपाने की जगह बन गया। 

कस्बे के मो. सरायमुल्लागंज निवासी अद्दा का कहना है कि पक्षी विहार का जब से विकास किया गया है। तभी से इसके चारों ओर बसे गांवों अलियापुर, मिर्जापुर, कोईलाई, आदमपुर में बेरोजगारी बढ़ गई है। उसका नतीजा सामने है।

पक्षी बिहार के कर्मचारियों का कहना है कि जब इसका परिसीमन नहीं था तब लोग इससे भसीड़े, अनेक प्रकार की पाए जाने वाली जूड़ी बूटियां, कमल गट्टा, पत्ते आदि के द्वारा बाजार में बेचकर घर परिवार चलाते थे।

आदमपुर के विश्राम, पुत्तूलाल, धरमू, फूल सिंह, अहिवरन, मिहीलाल, जयचरन, चंद्रिका के अनुसार पक्षी विहार के बनने से लोगों को तमाम बंदिशों का सामना करना पड़ रहा है।

भसीड़े की खुदाई कर्मचारी ठेके पर कराते हैं। कमल का फूल, मछलियों का शिक ार, कमल गट्टा का बीज सब का यहां के कर्मचारी ठेका उठा लेते हैं, जो अवैध है।  क्षेत्राधिकारी अबू अरशद खां ने बताया कि यहां  पड़ने के दौरान चारों तरफ के बंधी को ठीक करा लिया गया है। पानी की आपूर्ति के लिए शासन को शारदा नहर से जोड़ने का प्रस्ताव भेजा गया है।

कमल के बीज से मखाने बनाए जाते है। जबकि कमल के रेसो से नकली केसर बनती है। भसीड़े बहुतायत मात्रा में होता है। कमल के पत्ते शादी बरातों में खाना खिलाने के काम आता था। पशुओं के लिए उत्तम चारागाह था। 

प्रशासन यदि सहयोग करें तो शारदा नहर से ग्राम संगेचामऊ से आने वाली नहर से लिंक किया जा सकता है। उसके द्वारा झील में पानी भर सकता है। उससे पानी की कमी दूर हो सकती है।


प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक नेता राजाराम दीक्षित ने जिलाधिकारी से अपील की है कि कम खर्च में पानी पक्षी विहार में सदैव आ सकता है। पक्षी विहार ग्राम अलियापुर के बीच की दूरी एक किलोमीटर है। अलियापुर की सीमा में गर्रा नदी है। उससे पक्षी विहार तक सीमेंट के पाइप से पानी की आपूर्ति हो सकती है।
 

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