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‘दशलक्षण धर्म का पालन करें’
Hardoi
Updated Fri, 28 Sep 2012 12:00 PM IST
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हरदोई। दिगंबर जैन मंदिर में गुरुवार को जैन समाज के अनुयायियों ने सत्य, अहिंसा व अपरिग्रह व्रत का पालन करने का संकल्प लिया। जैन समाज के लोगों ने उत्तम अकिंचन धर्म का पूजन कर विधि विधान से अर्चन किया। उन्हाेंने मन, वचन और कर्म से कार्यों को करने की सीख दी।
दशलक्षण पर्व के मौके पर दिगंबर जैन मंदिर में उत्तम अकिंचन धर्म का पूजन किया गया। किरन जैन, श्रवण जैन और अजय जैन ने सम्मेद शिखर विधान का आयोजन किया। इसमें 24 तीर्थंकरों में कैलाश पर्वत (अष्टापद), वासुपूज्य भगवान का चंपापुर (मंदारगिरी), नेमिनाथ भगवान का गिरनार (उर्जयंत) पर्वत, भगवान महावीर का पावारपुर शेष बीस तीर्थंकर सम्मेद शिखर से निर्वाण प्राप्त हुए। सभी की विधि से पूजा की गई। उत्तम अकिंचन धर्म की चरचा करते हुए पंडित रूपचंद्र जैन ने बताया कि अकिंचन का अर्थ है कि किंचित भी मेरा कुछ नहीं है। हमें ऐसे भाव संसार में बनाने होंगे। जब ऐसे भाव रहेंगे तथा अकिंचन धर्म का पूर्णतया पालन हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि हमें बिलकुल भी चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जब शरीर ही हमारा नहीं है, तो मकान, कपड़े आदि भौतिक सुखों को अपना कैसे समझा जाए। आत्मा के अतिरिक्त आत्म ध्यान के अतिरिक्त मेरा संसार में कुछ भी नहीं है। अकिंचन भाव की भावना बिलकुल भी सुलभ नहीं है। जैन समाज के पवन जैन ने बताया कि दिगंबर जैन मंदिर में दश लक्षण पर्व के मौके पर प्रतिदिन पूजन व विधान का आयोजन किया जा रहा है। जिसके क्रम में उत्तम अकिंचन धर्म के दिवस पर विधि विधान से अभिषेक, शांतिधारा व भगवान महावीर का पूजन कराया गया।
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उन्हाेंने कहा कि जीवन में सुख-शांति के लिए उत्तम क्षर्मा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, अकिंचन और ब्रह्मचर्य आदि दशलक्षण धर्मों का पालन हर मनुष्य को करना चाहिए। इस दौरान वर्ग की कई महिलाएं और पुरुष मौजूद थे।
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दशलक्षण पर्व के मौके पर दिगंबर जैन मंदिर में उत्तम अकिंचन धर्म का पूजन किया गया। किरन जैन, श्रवण जैन और अजय जैन ने सम्मेद शिखर विधान का आयोजन किया। इसमें 24 तीर्थंकरों में कैलाश पर्वत (अष्टापद), वासुपूज्य भगवान का चंपापुर (मंदारगिरी), नेमिनाथ भगवान का गिरनार (उर्जयंत) पर्वत, भगवान महावीर का पावारपुर शेष बीस तीर्थंकर सम्मेद शिखर से निर्वाण प्राप्त हुए। सभी की विधि से पूजा की गई। उत्तम अकिंचन धर्म की चरचा करते हुए पंडित रूपचंद्र जैन ने बताया कि अकिंचन का अर्थ है कि किंचित भी मेरा कुछ नहीं है। हमें ऐसे भाव संसार में बनाने होंगे। जब ऐसे भाव रहेंगे तथा अकिंचन धर्म का पूर्णतया पालन हो जाएगा।
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उन्होंने कहा कि हमें बिलकुल भी चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जब शरीर ही हमारा नहीं है, तो मकान, कपड़े आदि भौतिक सुखों को अपना कैसे समझा जाए। आत्मा के अतिरिक्त आत्म ध्यान के अतिरिक्त मेरा संसार में कुछ भी नहीं है। अकिंचन भाव की भावना बिलकुल भी सुलभ नहीं है। जैन समाज के पवन जैन ने बताया कि दिगंबर जैन मंदिर में दश लक्षण पर्व के मौके पर प्रतिदिन पूजन व विधान का आयोजन किया जा रहा है। जिसके क्रम में उत्तम अकिंचन धर्म के दिवस पर विधि विधान से अभिषेक, शांतिधारा व भगवान महावीर का पूजन कराया गया।
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उन्हाेंने कहा कि जीवन में सुख-शांति के लिए उत्तम क्षर्मा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, अकिंचन और ब्रह्मचर्य आदि दशलक्षण धर्मों का पालन हर मनुष्य को करना चाहिए। इस दौरान वर्ग की कई महिलाएं और पुरुष मौजूद थे।