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अब ‘पलकें’ कहां, पुराने हालात में आए मतदाता
Hardoi
Updated Fri, 29 Jun 2012 12:00 PM IST
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हरदोई। 7 पालिका व 6 नगर पंचायतों की 3.69 लाख से ज्यादा की आबादी मतदान कराने के बाद एक बार फिर अपने पुराने हालातों में फेंक दी गई है। पिछले डेढ़ माह से सुबह सवेरे होने वाली मनुहार व मतदान होने तक बिजली से लेकर पानी तक की दी जाने वाली सुविधाएं मतदान खत्म होते ही छीन ली गई।
इतने दिनों बाद पलकों व सुविधाआें से उतारे जाने के बाद लोगों का यही कहना है कि वोट डालना वोटरों की नियत सी बन गई है और उसके बाद इसी जनता पर राज करना नेताओं की परंपरा। इसे वोटरों का दुर्भाग्य कहें या फिर सौभाग्य। किसी भी चुनाव में जब चयन की बात आती है कि जनता को पुचकारने पार्टियां व उनके नेता वोटरों के घरों पर जाकर कुंडी खटखटाने लगते हैं। लगाव तो ऐसा कि आने जाने का भी समय नहीं देखते बस काकी, चाचा, चाची व अम्मा का रिश्ता निकालकर बस ऐसे जता देते हैं कि बस घर के ही हो। यही नहीं चुनावी जीतने के बाद रोज इसी तरह आना, बैठना व उनकी दिक्कतों को दरवाजे पर कम करने के आश्वासन भी बढ़ चढ़कर दिए जाते हैं।
यह इनके दावों में भी रहते हैं, पर चुनाव जीतना तो दूर की बात, मतदान होते ही प्रत्याशियों का जो चेहरा जनता की तरफ होता है, वह अब प्रशासन की तरफ मुड़ जाता है। घर पर जाकर समस्याआें का निस्तारण कराना तो दूर काम करवाने को यदि लोगों को इनके पास जाना पड़े तो भी मिन्नते करने के बाद भी काम हो जाए इसकी संभावना कम ही रहती है। नुमाइश पुरवा निवासी अमित शुक्ला, न्यू सिविल लाइंस निवासी विनय सिंह व धर्मशाला रोड निवासी आशीष अस्थाना का कहना है कि यदि यह कह दिया जाए कि मतदाता मतदान कराने तक सभी की पलकों पर ही रहता है। राजनीतिक खेमों द्वारा ही नहीं, बल्कि आयोग से लेकर प्रशासनिक तौर पर भी वोटरों को सहूलियतें दी जाती है, पर मतदान कराने के बाद तो जनता से कोई मतलब ही नहीं रहता।
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तीन दिन बिजली दी जा रही थी। मतदान खत्म होने के बाद बिजली ही नहीं पानी की भी किल्लत कर दी गई। वहीं पुरानी कटौती को जारी कर दिया गया। मतदाता प्रतिशत बढ़ाने पर प्रशासन को भी नंबर मिलते हैं, इसलिए आयोग मतदान कराने को वोटरों को छूट पर छूट दिए जा रहा है। अब तो चाहे जो जीते पांच साल तक उनके दरवाजे पर को ई नहीं आने वाला। उनका कहना है कि मतदाता शायद इसीलिए बना है कि कुछ दिन रामजुहार कराने के बाद सालों साल नेताओं की चिरौरी करते रहना।
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इतने दिनों बाद पलकों व सुविधाआें से उतारे जाने के बाद लोगों का यही कहना है कि वोट डालना वोटरों की नियत सी बन गई है और उसके बाद इसी जनता पर राज करना नेताओं की परंपरा। इसे वोटरों का दुर्भाग्य कहें या फिर सौभाग्य। किसी भी चुनाव में जब चयन की बात आती है कि जनता को पुचकारने पार्टियां व उनके नेता वोटरों के घरों पर जाकर कुंडी खटखटाने लगते हैं। लगाव तो ऐसा कि आने जाने का भी समय नहीं देखते बस काकी, चाचा, चाची व अम्मा का रिश्ता निकालकर बस ऐसे जता देते हैं कि बस घर के ही हो। यही नहीं चुनावी जीतने के बाद रोज इसी तरह आना, बैठना व उनकी दिक्कतों को दरवाजे पर कम करने के आश्वासन भी बढ़ चढ़कर दिए जाते हैं।
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यह इनके दावों में भी रहते हैं, पर चुनाव जीतना तो दूर की बात, मतदान होते ही प्रत्याशियों का जो चेहरा जनता की तरफ होता है, वह अब प्रशासन की तरफ मुड़ जाता है। घर पर जाकर समस्याआें का निस्तारण कराना तो दूर काम करवाने को यदि लोगों को इनके पास जाना पड़े तो भी मिन्नते करने के बाद भी काम हो जाए इसकी संभावना कम ही रहती है। नुमाइश पुरवा निवासी अमित शुक्ला, न्यू सिविल लाइंस निवासी विनय सिंह व धर्मशाला रोड निवासी आशीष अस्थाना का कहना है कि यदि यह कह दिया जाए कि मतदाता मतदान कराने तक सभी की पलकों पर ही रहता है। राजनीतिक खेमों द्वारा ही नहीं, बल्कि आयोग से लेकर प्रशासनिक तौर पर भी वोटरों को सहूलियतें दी जाती है, पर मतदान कराने के बाद तो जनता से कोई मतलब ही नहीं रहता।
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तीन दिन बिजली दी जा रही थी। मतदान खत्म होने के बाद बिजली ही नहीं पानी की भी किल्लत कर दी गई। वहीं पुरानी कटौती को जारी कर दिया गया। मतदाता प्रतिशत बढ़ाने पर प्रशासन को भी नंबर मिलते हैं, इसलिए आयोग मतदान कराने को वोटरों को छूट पर छूट दिए जा रहा है। अब तो चाहे जो जीते पांच साल तक उनके दरवाजे पर को ई नहीं आने वाला। उनका कहना है कि मतदाता शायद इसीलिए बना है कि कुछ दिन रामजुहार कराने के बाद सालों साल नेताओं की चिरौरी करते रहना।