{"_id":"6853007e4f9051668c0598b5","slug":"for-21-years-only-formality-is-being-done-in-the-name-of-investigation-hapur-news-c-135-1-hpr1002-126075-2025-06-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"Hapur News: 21 साल से जांच के नाम पर खानापूर्ति,\nजमा कराए बिल के साक्ष्य बन रहे रद्दी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Hapur News: 21 साल से जांच के नाम पर खानापूर्ति, जमा कराए बिल के साक्ष्य बन रहे रद्दी
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
हापुड़। जिले के 25 हजार किसानों को 1200 के नलकूप बिल घोटाले से राहत मिलती नहीं दिख रही। किसानों से जमा कराए बिल के साक्ष्य भी रद्दी बन रहे हैं। 21 साल से जांच के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है। किसानों के खाते में चार से दस लाख रुपये तक की देनदारी आ रही है।
दरअसल, साल 2000 से पहले नगर निगम में बिल घोटाले का खेल शुरू हुआ था। इसमें बहुत से ऐसे किसानों को निशाना बनाया गया जो बड़े बकायेदार थे। तत्कालीन कर्मचारियों ने इन किसानों को कम पैसे में ही मामला निपटाने का झांसा देकर जाल में फंसाया। किसानों को जमा बिल की रसीदें भी दी गईं, लेकिन रिकॉर्ड में फर्जीवाड़ा कर दिया गया, जिस कारण किसानों से मिलने वाला पैसा उक्त कर्मचारी, अधिकारियों की जेबों में जाता रहा। यही नहीं जिन किसानों से बिल जमा कराया उनके खातों से भी देनदारी नहीं हटायी गई। उस समय के चालान, लेजर भी गायब कर दिए गए। 220 करोड़ का यह घोटाला अब बढ़कर 1200 करोड़ के पार पहुंच गया है।
इस में फंसाए गए किसानों के बिल खातों में चार लाख से लेकर दस लाख रुपये तक की देनदारी आ रही है। पिछले दिनों किसानों ने हंगामा और धरना किया था। जिस पर एमडी कार्यालय से टीम आयी। किसानों से जमा बिलों की रसीदें उपलब्ध कराने को कहा, जिस पर किसानों ने कार्यालयों में रसीदें जमा करा दीं। इससे पहले भी अधिशासी अभियंता मनोज कुमार के समय रसीदें जमा करायी गई थी, लेकिन अब तक भी ये रसीदों की कॉपियों हापुड़ के कार्यालय में ही धूल फांक रही हैं। न तो जांच टीम ने इन्हें लिया है और न ही स्थानीय अधिकारियों ने रसीदों को ऊपर भेजना उचित समझा है।
विज्ञापन
ऊर्जा निगम के अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2004 में जब इस घपले की परतें खुली थी तब घोटाला महज 120 करोड़ का था। इसमें 85 करोड़ रुपये मूल था और 35 करोड़ रुपये ब्याज बन रहा था। उस समय सकारात्मक जांच कर कार्रवाई होती तो किसानों को अब तक राहत मिल चुकी होती।
वर्ष 2006 में ऐसे बिलों को संशोधित करने का प्रयास हुआ था। उस समय ओटीएस योजना लागू थी, बहुत से किसानों की पेनाल्टी और जुड़कर आ रही बकायेदारी को खातों से हटाया गया लेकिन, मामला बढ़ा तो फिर से अधिकारियों ने हटाई गई राशि को खातों में जोड़ दिया।
भाकियू अराजनैतिक के जिलाध्यक्ष पवन हूण ने बताया कि किसानों को 21 साल से गुमराह किया जा रहा है, जांच के नाम पर खानापूर्ति हो रही है। किसानों के पास जमा बिलों की रसीदें हैं, इस मामले में राहत नहीं दिलाई गई तो आंदोलन होगा।
अधीक्षण अभियंता एसके अग्रवाल ने बताया कि नलकूप बिलों से जुड़े इस प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच चल रही है। किसानों को राहत दिलाने के लिए उच्चाधिकारियों से लगातार वार्ता की जा रही है। इस प्रकरण में ऊपर से जैसे आदेश मिलेंगे, उसके अनुसार कार्य किया जाएगा।
विज्ञापन
हापुड़। जिले के 25 हजार किसानों को 1200 के नलकूप बिल घोटाले से राहत मिलती नहीं दिख रही। किसानों से जमा कराए बिल के साक्ष्य भी रद्दी बन रहे हैं। 21 साल से जांच के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है। किसानों के खाते में चार से दस लाख रुपये तक की देनदारी आ रही है।
दरअसल, साल 2000 से पहले नगर निगम में बिल घोटाले का खेल शुरू हुआ था। इसमें बहुत से ऐसे किसानों को निशाना बनाया गया जो बड़े बकायेदार थे। तत्कालीन कर्मचारियों ने इन किसानों को कम पैसे में ही मामला निपटाने का झांसा देकर जाल में फंसाया। किसानों को जमा बिल की रसीदें भी दी गईं, लेकिन रिकॉर्ड में फर्जीवाड़ा कर दिया गया, जिस कारण किसानों से मिलने वाला पैसा उक्त कर्मचारी, अधिकारियों की जेबों में जाता रहा। यही नहीं जिन किसानों से बिल जमा कराया उनके खातों से भी देनदारी नहीं हटायी गई। उस समय के चालान, लेजर भी गायब कर दिए गए। 220 करोड़ का यह घोटाला अब बढ़कर 1200 करोड़ के पार पहुंच गया है।
विज्ञापन
इस में फंसाए गए किसानों के बिल खातों में चार लाख से लेकर दस लाख रुपये तक की देनदारी आ रही है। पिछले दिनों किसानों ने हंगामा और धरना किया था। जिस पर एमडी कार्यालय से टीम आयी। किसानों से जमा बिलों की रसीदें उपलब्ध कराने को कहा, जिस पर किसानों ने कार्यालयों में रसीदें जमा करा दीं। इससे पहले भी अधिशासी अभियंता मनोज कुमार के समय रसीदें जमा करायी गई थी, लेकिन अब तक भी ये रसीदों की कॉपियों हापुड़ के कार्यालय में ही धूल फांक रही हैं। न तो जांच टीम ने इन्हें लिया है और न ही स्थानीय अधिकारियों ने रसीदों को ऊपर भेजना उचित समझा है।
विज्ञापन
ऊर्जा निगम के अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2004 में जब इस घपले की परतें खुली थी तब घोटाला महज 120 करोड़ का था। इसमें 85 करोड़ रुपये मूल था और 35 करोड़ रुपये ब्याज बन रहा था। उस समय सकारात्मक जांच कर कार्रवाई होती तो किसानों को अब तक राहत मिल चुकी होती।
वर्ष 2006 में ऐसे बिलों को संशोधित करने का प्रयास हुआ था। उस समय ओटीएस योजना लागू थी, बहुत से किसानों की पेनाल्टी और जुड़कर आ रही बकायेदारी को खातों से हटाया गया लेकिन, मामला बढ़ा तो फिर से अधिकारियों ने हटाई गई राशि को खातों में जोड़ दिया।
भाकियू अराजनैतिक के जिलाध्यक्ष पवन हूण ने बताया कि किसानों को 21 साल से गुमराह किया जा रहा है, जांच के नाम पर खानापूर्ति हो रही है। किसानों के पास जमा बिलों की रसीदें हैं, इस मामले में राहत नहीं दिलाई गई तो आंदोलन होगा।
अधीक्षण अभियंता एसके अग्रवाल ने बताया कि नलकूप बिलों से जुड़े इस प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच चल रही है। किसानों को राहत दिलाने के लिए उच्चाधिकारियों से लगातार वार्ता की जा रही है। इस प्रकरण में ऊपर से जैसे आदेश मिलेंगे, उसके अनुसार कार्य किया जाएगा।