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Hapur News: घोटाले से बिगड़े नलकूप किसानों के लेजर, नहीं जमा हो रहे ऑनलाइन बिल
Wed, 18 Oct 2023 10:14 PM IST
गाजियाबाद ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हापुड़
संवाद न्यूज एजेंसी, हापुड़
Updated Wed, 18 Oct 2023 10:14 PM IST
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हापुड़। नलकूप के बिलों में 600 करोड़ के घोटाले ने किसानों के लेजर बिगाड़ दिए हैं। जिन्हें 20 सालों में संशोधित नहीं किया गया है। इसके कारण जिले के करीब 25 हजार किसानों को ऑनलाइन बिल जमा करने का लाभ ही नहीं मिल रहा। मैनुअल तरीके से ही बिल जमा किया जा रहा है, जो बाद में फिर परेशानी का सबब बन सकता है।
2004 में बिल घोटाला सामने आया था, उस दौरान रिकॉर्ड को जला दिया गया। बहुत सी रसीदों को नाले में बहाया गया, जो बरामद भी हुई। अनेकों एजेंसियां इस प्रकरण की जांच करती चली आ रही हैं। लेकिन अभी तक दोषियों पर कार्रवाई तो दूर घोटाले की पर्त तक नहीं खुल सकी हैं।
आलम यह है कि इस घोटाले में फंसे 25 हजार किसानों को गलत बिल दिए जा रहे हैं। इसका बड़ा कारण यह है कि किसानों के लेजर ही ठीक नहीं हैं। 20 सालों में न जाने कितने एक्सईएन, अधीक्षण अभियंता बदले लेकिन इस मामले में किसी ने हाथ डालना मुनासिब नहीं समझा। आलम यह है कि जहां पारदर्शिता बनाने के लिए हर सुविधा ऑनलाइन की जा रही है। वहीं, हापुड़ के 25 हजार किसान इससे अछूते हैं। क्योंकि उनके लेजर में घोटाले की रकम को जोड़ दिया गया है। यही कारण है कि किसानों के पास रसीदें उपलब्ध होने के बावजूद उनके बिलों से इस बकायेदारी को नहीं हटाया जा रहा है।
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बिल जमा करने के लिए काटने पड़ते हैं चक्कर-
घोटाले का दंश झेल रहे किसानों को अपना बिल जमा करने के लिए पहले ऊर्जा निगम के कार्यालय जाना पड़ता है। वहां पुरानी रसीदें दिखानी पड़ती हैं, जिसके बाद लिपिक मैनुअल बिल बनाते हैं, जिसकी दरों का किसानों को कोई ज्ञान नहीं होता। फिर भी जितना हाथ से पैसा लिख दिया जाता है किसान उसे जमा करते हैं।
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ओटीएस के दौरान भी नहीं हटती पैनल्टी
ओटीएस जब भी लागू होती है तब पैनल्टी की माफी सिर्फ उतने समय की दी जाती है, जिस समय तक किसान ने अंतिम बार बिल जमा किया था। पुरानी पैनल्टी पर माफी नहीं मिलती। यही कारण है कि आज किसानों के बिल दो से पांच लाख तक पहुंच गए हैं।
2006 में पैनल्टी हटाकर फिर से जोड़ी
2006 में ओटीएस आई थी, उस समय अधिकारियों ने किसानों के बिलों में जुड़कर आ रहे पुराने विलंब शुल्क को हटा दिया था। लेकिन इस मामले ने तूल पकड़ा तो फिर से वह शुल्क लेजरों में जोड़ दिया गया। इसके बाद से किसी ने भी इन लेजर को छेड़ने की हिम्मत नहीं दिखाई।
-दो साल पहले किसानों से जमा कराई रसीदें
किसानों को राहत दिलाने का झांसा देकर दो साल पहले पुरानी रसीदों की छायाप्रति अधिकारियों ने जमा कराई थी। जिनके आधार पर लेजरों को सुधारने का दावा किया गया था, लेकिन सुधार तो हुआ नहीं। अधिकारी भी अपना पल्ला झाड़ने लगे।
उच्चस्तर पर चल रही जांच
इस मामले की उच्चस्तरीय जांच चल रही है, जैसे आदेश मिलेंगी कार्रवाई की जाएगी। इस तरह के किसानों को जल्द ही ऑनलाइन बिल जमा करने की सुविधा मिलेगी।-- यूके सिंह, अधीक्षण अभियंता।
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2004 में बिल घोटाला सामने आया था, उस दौरान रिकॉर्ड को जला दिया गया। बहुत सी रसीदों को नाले में बहाया गया, जो बरामद भी हुई। अनेकों एजेंसियां इस प्रकरण की जांच करती चली आ रही हैं। लेकिन अभी तक दोषियों पर कार्रवाई तो दूर घोटाले की पर्त तक नहीं खुल सकी हैं।
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आलम यह है कि इस घोटाले में फंसे 25 हजार किसानों को गलत बिल दिए जा रहे हैं। इसका बड़ा कारण यह है कि किसानों के लेजर ही ठीक नहीं हैं। 20 सालों में न जाने कितने एक्सईएन, अधीक्षण अभियंता बदले लेकिन इस मामले में किसी ने हाथ डालना मुनासिब नहीं समझा। आलम यह है कि जहां पारदर्शिता बनाने के लिए हर सुविधा ऑनलाइन की जा रही है। वहीं, हापुड़ के 25 हजार किसान इससे अछूते हैं। क्योंकि उनके लेजर में घोटाले की रकम को जोड़ दिया गया है। यही कारण है कि किसानों के पास रसीदें उपलब्ध होने के बावजूद उनके बिलों से इस बकायेदारी को नहीं हटाया जा रहा है।
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बिल जमा करने के लिए काटने पड़ते हैं चक्कर-
घोटाले का दंश झेल रहे किसानों को अपना बिल जमा करने के लिए पहले ऊर्जा निगम के कार्यालय जाना पड़ता है। वहां पुरानी रसीदें दिखानी पड़ती हैं, जिसके बाद लिपिक मैनुअल बिल बनाते हैं, जिसकी दरों का किसानों को कोई ज्ञान नहीं होता। फिर भी जितना हाथ से पैसा लिख दिया जाता है किसान उसे जमा करते हैं।
ओटीएस के दौरान भी नहीं हटती पैनल्टी
ओटीएस जब भी लागू होती है तब पैनल्टी की माफी सिर्फ उतने समय की दी जाती है, जिस समय तक किसान ने अंतिम बार बिल जमा किया था। पुरानी पैनल्टी पर माफी नहीं मिलती। यही कारण है कि आज किसानों के बिल दो से पांच लाख तक पहुंच गए हैं।
2006 में पैनल्टी हटाकर फिर से जोड़ी
2006 में ओटीएस आई थी, उस समय अधिकारियों ने किसानों के बिलों में जुड़कर आ रहे पुराने विलंब शुल्क को हटा दिया था। लेकिन इस मामले ने तूल पकड़ा तो फिर से वह शुल्क लेजरों में जोड़ दिया गया। इसके बाद से किसी ने भी इन लेजर को छेड़ने की हिम्मत नहीं दिखाई।
-दो साल पहले किसानों से जमा कराई रसीदें
किसानों को राहत दिलाने का झांसा देकर दो साल पहले पुरानी रसीदों की छायाप्रति अधिकारियों ने जमा कराई थी। जिनके आधार पर लेजरों को सुधारने का दावा किया गया था, लेकिन सुधार तो हुआ नहीं। अधिकारी भी अपना पल्ला झाड़ने लगे।
उच्चस्तर पर चल रही जांच
इस मामले की उच्चस्तरीय जांच चल रही है, जैसे आदेश मिलेंगी कार्रवाई की जाएगी। इस तरह के किसानों को जल्द ही ऑनलाइन बिल जमा करने की सुविधा मिलेगी।