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कैसे हो विकास, एचपीडीए अपना ठिकाना तक नहीं बना पाया
Updated Mon, 01 Jan 2018 12:57 AM IST
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15 वर्ष में अपना ठिकाना भी नहीं बना सका एचपीडीए
गढ़मुक्तेश्वर। एचपीडीए को यहां अस्तित्व में आए 15 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन अभी अपना ठिकाना नहीं बना सका है। एचपीडीए का दफ्तर आज भी तहसील की बिल्डिंग में ही चल रहा है। यही नहीं इतने दिनों में पहली आवासीय कालोनी भी नहीं बन पाई है। वजह यह रही है कि मुआवजा राशि को कम बताकर किसानों ने कड़ा विरोध जताया था।
हरिद्वार को उत्तराखंड में शामिल किए जाने पर प्रदेश शासन ने वर्ष 2001 में दशकों से उपेक्षित गढ़-ब्रजघाट गंगानगरी को इसी तर्ज पर विकसित कराने की घोषणा की थी। इसे अमलीजामा पहनाने का जिम्मा गाजियाबाद विकास प्राधिकरण को सौंपा गया था। लेकिन गढ़ में परिक्रमा पथ, ब्रजघाट में घंटाघर, चेजिंग रूम जैसे चंद काम कराने के बाद जीडीए ने धनाभाव का हवाला देकर हाथ खड़े कर दिए थे। हालांकि इससे पहले जीडीए ने वर्ष 2002 में सबसे पहली आवासीय कालोनी विकसित करने को पुराने दिल्ली रोड पर रेलवे फाटक के पास गांव बदरखा के 85 किसानों की 34 हेक्टेयर से भी अधिक भूमि अधिग्रहीत कर ली थी। जीडीए के हाथ खड़े करने पर शासन ने वर्ष 2005 में विकास का जिम्मा एचपीडीए को सौंप दिया था। इस पर एचपीडीए ने पहली आवासीय कालोनी विकसित कराने की कवायद शुरू की, लेकिन किसानों ने आठ सौ रुपये मीटर तय किए गए मुआवजे को कम बताकर कड़ा विरोध जताया था। एचपीडीए ने अधिग्रहित की गई भूमि के अभिलेखों से संबंधित किसानों के नाम खारिज कराकर उसमें अपने नाम की प्रविष्टि करा ली थी। इस पर किसानों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी, जिस पर हाईकोर्ट ने एचपीडीए का नाम निरस्त कराकर जनवरी 2016 में फिर से किसानों के नाम भू-अभिलेखों में दर्ज करा दिए थे।
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लौटानी पड़ी थी भवनों के लिए दी गई राशि
आवासीय कालोनी में भवनों का निर्माण लॉटरी सिस्टम के आधार पर किया जाना था, जिसके एवज में एचपीडीए ने लोगों से करोड़ों की रकम भी वसूल ली थी। लेकिन जब कालोनी में कोई भी निर्माण प्रारंभ नहीं हो सका, तो लोगों की रकम लौटानी पड़ी थी।
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उत्पीड़न सहन नहीं करेंगे किसान
किसान जुल्फिकार फौजी, हाजी इरफान, हाजी बाबू, गुल्लू चौहान का कहना है कि एचपीडीए द्वारा अधिग्रहित की गई जिस भूमि का मुआवजा 800 सौ रुपये मीटर की दर से तय किया गया था, उसका सर्किल रेट करीब दस हजार रुपये मीटर है। इसलिए किसान किसी भी दशा में अपना उत्पीड़न सहन नहीं करेंगे और सर्किल रेट की दर से मुआवजा न मिलने पर अपनी जमीन नहीं देंगे।
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वर्जन:--
प्रेम गंगा धाम आवासीय कालोनी का मामला कानूनी दावपेच में उलझने से फिलहाल कालोनी विकसित किया जाना प्रस्तावित नहीं है, जबकि तहसील मुख्यालय में चल रहे ऑफिस को भी अलग शिफ्ट करने की कोई योजना नहीं है।
-आरके शर्मा, अवर अभियंता
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गढ़मुक्तेश्वर। एचपीडीए को यहां अस्तित्व में आए 15 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन अभी अपना ठिकाना नहीं बना सका है। एचपीडीए का दफ्तर आज भी तहसील की बिल्डिंग में ही चल रहा है। यही नहीं इतने दिनों में पहली आवासीय कालोनी भी नहीं बन पाई है। वजह यह रही है कि मुआवजा राशि को कम बताकर किसानों ने कड़ा विरोध जताया था।
हरिद्वार को उत्तराखंड में शामिल किए जाने पर प्रदेश शासन ने वर्ष 2001 में दशकों से उपेक्षित गढ़-ब्रजघाट गंगानगरी को इसी तर्ज पर विकसित कराने की घोषणा की थी। इसे अमलीजामा पहनाने का जिम्मा गाजियाबाद विकास प्राधिकरण को सौंपा गया था। लेकिन गढ़ में परिक्रमा पथ, ब्रजघाट में घंटाघर, चेजिंग रूम जैसे चंद काम कराने के बाद जीडीए ने धनाभाव का हवाला देकर हाथ खड़े कर दिए थे। हालांकि इससे पहले जीडीए ने वर्ष 2002 में सबसे पहली आवासीय कालोनी विकसित करने को पुराने दिल्ली रोड पर रेलवे फाटक के पास गांव बदरखा के 85 किसानों की 34 हेक्टेयर से भी अधिक भूमि अधिग्रहीत कर ली थी। जीडीए के हाथ खड़े करने पर शासन ने वर्ष 2005 में विकास का जिम्मा एचपीडीए को सौंप दिया था। इस पर एचपीडीए ने पहली आवासीय कालोनी विकसित कराने की कवायद शुरू की, लेकिन किसानों ने आठ सौ रुपये मीटर तय किए गए मुआवजे को कम बताकर कड़ा विरोध जताया था। एचपीडीए ने अधिग्रहित की गई भूमि के अभिलेखों से संबंधित किसानों के नाम खारिज कराकर उसमें अपने नाम की प्रविष्टि करा ली थी। इस पर किसानों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी, जिस पर हाईकोर्ट ने एचपीडीए का नाम निरस्त कराकर जनवरी 2016 में फिर से किसानों के नाम भू-अभिलेखों में दर्ज करा दिए थे।
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लौटानी पड़ी थी भवनों के लिए दी गई राशि
आवासीय कालोनी में भवनों का निर्माण लॉटरी सिस्टम के आधार पर किया जाना था, जिसके एवज में एचपीडीए ने लोगों से करोड़ों की रकम भी वसूल ली थी। लेकिन जब कालोनी में कोई भी निर्माण प्रारंभ नहीं हो सका, तो लोगों की रकम लौटानी पड़ी थी।
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उत्पीड़न सहन नहीं करेंगे किसान
किसान जुल्फिकार फौजी, हाजी इरफान, हाजी बाबू, गुल्लू चौहान का कहना है कि एचपीडीए द्वारा अधिग्रहित की गई जिस भूमि का मुआवजा 800 सौ रुपये मीटर की दर से तय किया गया था, उसका सर्किल रेट करीब दस हजार रुपये मीटर है। इसलिए किसान किसी भी दशा में अपना उत्पीड़न सहन नहीं करेंगे और सर्किल रेट की दर से मुआवजा न मिलने पर अपनी जमीन नहीं देंगे।
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वर्जन:--
प्रेम गंगा धाम आवासीय कालोनी का मामला कानूनी दावपेच में उलझने से फिलहाल कालोनी विकसित किया जाना प्रस्तावित नहीं है, जबकि तहसील मुख्यालय में चल रहे ऑफिस को भी अलग शिफ्ट करने की कोई योजना नहीं है।
-आरके शर्मा, अवर अभियंता
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