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मुकद्दस रमजान का आखिरी और सबसे अहम अशरा आज शुरू होगा
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मुकद्दस रमजान का आखिरी व सबसे अहम अशरा आज होगा शुरू
गढ़मुक्तेश्वर। मुकद्दस रमजान माह का आखिरी और सबसे अहम अशरा सोमवार की सुबह प्रारंभ होगा, जिसमें अल्लाह की खास रहमत नाजिल होने के साथ ही शबे कद्र वाली एक रात में इबादत करने का सवाब हजार महीनों से भी अधिक मिलता है।
मजहबे इस्लाम से मुकद्दस रमजान माह में दस दस दिन के तीन अशरे(भाग) होते हैं। जिनमें सबसे पहला अशरा अल्लाह की रहमत, दूसरा गुनाहों से मगफिरत और तीसरा दोजख (नरक) की आग से निजात दिलाने वाला होता है। रमजान का तीसरा अशरा सोमवार की तड़के में होने वाली सहरी से प्रारंभ होगा, जो अल्लाह की खास रहमत से जुड़ा होने पर बेहद अहम माना जाता है। क्योंकि इसी अशरे में रोजदारों को दोजख से मुक्ति मिलती है और शबे कद्र के रूप में अल्लाह की खास रहमत भी नाजिल होती है। रमजान माह के आखिरी अशरे की ताक (विषम) रातें शबे कद्र वाली कहलाई जाती हैं, जिनमें एक रात इबादत करने का सवाब हजार माह की इबादत से भी अधिक मिलता है।
मुफ्ती मोहम्मद अनस, शहर काजी हाजी सैयद कसीमुद्दीन, हाफिज मोहम्मद अली का कहना है कि आखिरी अशरे की ताक(विषम) रातों में 21, 23, 25, 27 और 29 वीं रात शुमार होती हैं, जिनमें कोई एक रात शबे कद्र वाली होती है। इसलिए इन सभी रातों में जागकर इबादत करने का सवाब एक रात में हजार माह से भी अधिक मिलता है।
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आखिरी अशरे में एतकाफ करना सुन्नत अलल किफाया है
- मुफ्ती मोहम्मद अनस ने बताया कि आखिरी अशरे में मस्जिद में रहकर एतकाफ करना सुन्नत अलल किफाया है, जिसमें बस्ती में कम से कम एक शख्श को एतकाफ में बैठना जरूरी होता है, जिससे सारी बस्ती का हक अदा हो जाता है, लेकिन अगर कोई भी एतकाफ में नहीं बैठता है तो फिर बस्ती में रहने वाले हर किसी पर इसका गुनाह लाजिम होता है।
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गढ़मुक्तेश्वर। मुकद्दस रमजान माह का आखिरी और सबसे अहम अशरा सोमवार की सुबह प्रारंभ होगा, जिसमें अल्लाह की खास रहमत नाजिल होने के साथ ही शबे कद्र वाली एक रात में इबादत करने का सवाब हजार महीनों से भी अधिक मिलता है।
मजहबे इस्लाम से मुकद्दस रमजान माह में दस दस दिन के तीन अशरे(भाग) होते हैं। जिनमें सबसे पहला अशरा अल्लाह की रहमत, दूसरा गुनाहों से मगफिरत और तीसरा दोजख (नरक) की आग से निजात दिलाने वाला होता है। रमजान का तीसरा अशरा सोमवार की तड़के में होने वाली सहरी से प्रारंभ होगा, जो अल्लाह की खास रहमत से जुड़ा होने पर बेहद अहम माना जाता है। क्योंकि इसी अशरे में रोजदारों को दोजख से मुक्ति मिलती है और शबे कद्र के रूप में अल्लाह की खास रहमत भी नाजिल होती है। रमजान माह के आखिरी अशरे की ताक (विषम) रातें शबे कद्र वाली कहलाई जाती हैं, जिनमें एक रात इबादत करने का सवाब हजार माह की इबादत से भी अधिक मिलता है।
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मुफ्ती मोहम्मद अनस, शहर काजी हाजी सैयद कसीमुद्दीन, हाफिज मोहम्मद अली का कहना है कि आखिरी अशरे की ताक(विषम) रातों में 21, 23, 25, 27 और 29 वीं रात शुमार होती हैं, जिनमें कोई एक रात शबे कद्र वाली होती है। इसलिए इन सभी रातों में जागकर इबादत करने का सवाब एक रात में हजार माह से भी अधिक मिलता है।
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आखिरी अशरे में एतकाफ करना सुन्नत अलल किफाया है
- मुफ्ती मोहम्मद अनस ने बताया कि आखिरी अशरे में मस्जिद में रहकर एतकाफ करना सुन्नत अलल किफाया है, जिसमें बस्ती में कम से कम एक शख्श को एतकाफ में बैठना जरूरी होता है, जिससे सारी बस्ती का हक अदा हो जाता है, लेकिन अगर कोई भी एतकाफ में नहीं बैठता है तो फिर बस्ती में रहने वाले हर किसी पर इसका गुनाह लाजिम होता है।