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बाढ़ से बचाने के नाम पर डकार गए 90 करोड़!
Updated Sun, 04 Mar 2018 11:50 PM IST
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बाढ़ से बचाने के नाम पर डकार गए 90 करोड़
हापुड़। गढ़ में बाढ़ सुरक्षा के नाम पर सिंचाई विभाग के अधिकारी 90 करोड़ रुपये डकार गए हैं। ऐसा दिखाया गया है कि गढ़ के गांव लठीरा, आलमपुर और आसपास के गांवों को बाढ़ से बचाने के लिए यह धनराशि खर्च की गई। जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। इसमें काम कराने में जितना बजट दर्शाया गया उससे कहीं कम खर्च की गई है। पिछली सरकार में हुई शिकायत के बाद मामले को दबा दिया गया। उसके बाद अब मुख्यमंत्री से शिकायत के बाद डीएम ने दो सदस्यीय कमेटी गठित कर जांच शुरू करा दी है।
सपा शासन काल में गढ़ गंगा किनारे के गांवों को बाढ़ से बचाने के लिए बाढ़ सुरक्षा परियोजना के नाम पर पत्थर और रेत के बोरे आदि लगाकर गंगा में रोक लगाई गई थी। सिंचाई विभाग ने इस कार्य पर 90 करोड़ रुपये का भारी भरकम बजट खर्च किया था। हालांकि कुछ दिन बाद ही गंगा में लगाई गई रोक के साथ 90 करोड़ का यह कार्य भी बह गया। उसके बाद से इस पर सवाल खड़े होने शुरू हो गये।
इस मामले में उस दौरान भी शिकायत हुई थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जांच सही प्रकार से नहीं हुई। इस कारण उस समय मामले को दबा दिया गया, लेकिन प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद इस मामले में नई दिल्ली सुल्तानपुरी निवासी मनोज कुमार ने जनवरी में एक बार फिर मुख्यमंत्री से शिकायत की थी। उसमें कहा गया है कि बाढ़ प्रभावित गांवों में फर्जी आंकड़े दिखाकर शासन से परियोजना पर मंजूरी ली गई और बिना किसी आवश्यकता के गंगा के घाटों पर यह कार्य किया गया।
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इतना ही नहीं गंगा की दृष्टि से इस कार्य को अनुभवहीन ठेकेदार को सौंपा गया। इस मामले में मुख्य आरोपी सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता को ऐसे ही भ्रष्टाचार के मामले में बर्खास्त किया जा चुका है। शासन के आदेश पर इस मामले में डीएम कृष्णा करुनेश ने पूरे मामले की जांच के लिए दो सदस्यीय कमेटी गठित कर दी है। इसमें पीडब्लूडी के सहायक अभियंता और कलक्ट्रेट एएसडीएम शामिल हैं। यह कमेटी इस कार्य और जांच करने वाली टीम द्वारा लगाई गई रिपोर्ट दोनों की जांच करेगी।
डीएम के स्टेनो के नाम पर भी उगाही का आरोप
पूर्व में मामले की शिकायत के बाद डीआरडीए के अधिकारियों द्वारा मामले की जांच की गई थी। जांच में साफ था कि कार्य में पुराने सीमेेंट के बैग का प्रयोग किया गया था। जबकि रिपोर्ट में नए बैग का प्रयोग दर्शाया गया था। इसके अलावा गंगा में नींव की वास्तविक लंबाई को भी बढ़ा चढ़ाकर दर्शाया गया। इस रिपोर्ट को गुप्त रखने के लिए जांच अधिकारियों ने न सिर्फ खुद मोटी रिश्वत ली, बल्कि डीएम के स्टेनो के नाम पर भी 50 हजार रुपये ले लिये।
गंगा के स्वरूप से भी किया खिलवाड़
शिकायत में कहा गया है कि इस कार्य के दौरान गंगा के वास्तविक रूप से भी खिलवाड़ किया गया। रोक लगाने के लिए प्रयोग किए गए लाल पत्थरों और गंदे सीमेंट के खाली बोरे के प्रयोग से गंगा की स्वच्छता भी प्रभावित हुई। मोटा कमाने के चक्कर में गंगा और इसमें रहने वाले जलीय जीवों के लिए खतरा पैदा किया गया। शासन ने इन सब मुद्दों पर जांच के निर्देश भी दिये हैं।
पूरे मामले की होगी निष्पक्ष जांच
डीएम कृष्णा करुनेश का कहना है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के आदेश दे दिये गए हैं। कमेटी हर बिंदु की गंभीरता से जांच कर रिपोर्ट सौंपेगी। इस आधार पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
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हापुड़। गढ़ में बाढ़ सुरक्षा के नाम पर सिंचाई विभाग के अधिकारी 90 करोड़ रुपये डकार गए हैं। ऐसा दिखाया गया है कि गढ़ के गांव लठीरा, आलमपुर और आसपास के गांवों को बाढ़ से बचाने के लिए यह धनराशि खर्च की गई। जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। इसमें काम कराने में जितना बजट दर्शाया गया उससे कहीं कम खर्च की गई है। पिछली सरकार में हुई शिकायत के बाद मामले को दबा दिया गया। उसके बाद अब मुख्यमंत्री से शिकायत के बाद डीएम ने दो सदस्यीय कमेटी गठित कर जांच शुरू करा दी है।
सपा शासन काल में गढ़ गंगा किनारे के गांवों को बाढ़ से बचाने के लिए बाढ़ सुरक्षा परियोजना के नाम पर पत्थर और रेत के बोरे आदि लगाकर गंगा में रोक लगाई गई थी। सिंचाई विभाग ने इस कार्य पर 90 करोड़ रुपये का भारी भरकम बजट खर्च किया था। हालांकि कुछ दिन बाद ही गंगा में लगाई गई रोक के साथ 90 करोड़ का यह कार्य भी बह गया। उसके बाद से इस पर सवाल खड़े होने शुरू हो गये।
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इस मामले में उस दौरान भी शिकायत हुई थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जांच सही प्रकार से नहीं हुई। इस कारण उस समय मामले को दबा दिया गया, लेकिन प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद इस मामले में नई दिल्ली सुल्तानपुरी निवासी मनोज कुमार ने जनवरी में एक बार फिर मुख्यमंत्री से शिकायत की थी। उसमें कहा गया है कि बाढ़ प्रभावित गांवों में फर्जी आंकड़े दिखाकर शासन से परियोजना पर मंजूरी ली गई और बिना किसी आवश्यकता के गंगा के घाटों पर यह कार्य किया गया।
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इतना ही नहीं गंगा की दृष्टि से इस कार्य को अनुभवहीन ठेकेदार को सौंपा गया। इस मामले में मुख्य आरोपी सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता को ऐसे ही भ्रष्टाचार के मामले में बर्खास्त किया जा चुका है। शासन के आदेश पर इस मामले में डीएम कृष्णा करुनेश ने पूरे मामले की जांच के लिए दो सदस्यीय कमेटी गठित कर दी है। इसमें पीडब्लूडी के सहायक अभियंता और कलक्ट्रेट एएसडीएम शामिल हैं। यह कमेटी इस कार्य और जांच करने वाली टीम द्वारा लगाई गई रिपोर्ट दोनों की जांच करेगी।
डीएम के स्टेनो के नाम पर भी उगाही का आरोप
पूर्व में मामले की शिकायत के बाद डीआरडीए के अधिकारियों द्वारा मामले की जांच की गई थी। जांच में साफ था कि कार्य में पुराने सीमेेंट के बैग का प्रयोग किया गया था। जबकि रिपोर्ट में नए बैग का प्रयोग दर्शाया गया था। इसके अलावा गंगा में नींव की वास्तविक लंबाई को भी बढ़ा चढ़ाकर दर्शाया गया। इस रिपोर्ट को गुप्त रखने के लिए जांच अधिकारियों ने न सिर्फ खुद मोटी रिश्वत ली, बल्कि डीएम के स्टेनो के नाम पर भी 50 हजार रुपये ले लिये।
गंगा के स्वरूप से भी किया खिलवाड़
शिकायत में कहा गया है कि इस कार्य के दौरान गंगा के वास्तविक रूप से भी खिलवाड़ किया गया। रोक लगाने के लिए प्रयोग किए गए लाल पत्थरों और गंदे सीमेंट के खाली बोरे के प्रयोग से गंगा की स्वच्छता भी प्रभावित हुई। मोटा कमाने के चक्कर में गंगा और इसमें रहने वाले जलीय जीवों के लिए खतरा पैदा किया गया। शासन ने इन सब मुद्दों पर जांच के निर्देश भी दिये हैं।
पूरे मामले की होगी निष्पक्ष जांच
डीएम कृष्णा करुनेश का कहना है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के आदेश दे दिये गए हैं। कमेटी हर बिंदु की गंभीरता से जांच कर रिपोर्ट सौंपेगी। इस आधार पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।