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Hamirpur News: शहर की आबादी की राज्यपाल से दरकार, सिटी फॉरेस्ट का हो जीर्णोद्धार
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हमीरपुर। उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल स्व. मोतीलाल बोरा की ओर से शहरी क्षेत्र की 56 हजार आबादी को दी गई सिटी फाॅरेस्ट पार्क की सौगात को जंगल के अफसरों ने बर्बाद कर दिया है। गुलजार रहने वाले इस पार्क में अब सन्नाटा है। एक मात्र पार्क के बदहाल होने से छुट्टी के दिन भी बच्चे घरों में कैद रहने को मजबूर हैं। राज्यपाल आनंदीबेन के दौरे के बाद लोगों में इसके जीर्णोद्धार की आस जगी है।
हमीरपुर-कालपी मार्ग पर शहरी क्षेत्र में तत्कालीन डीएम डॉ. बीपी नीलरत्न ने बच्चों के मनोरंजन के लिए सिटी फारेस्ट के नाम से पार्क बनवाया था। उद्घाटन उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल स्व. डॉ. मोतीलाल बोरा ने 1993 में किया था। पार्क वन विभाग की जमीन पर बना था। देख-रेख और रखरखाव का जिम्मा भी जंगल के अफसरों ने ही संभाल रखा था। समाजसेवी जलीस खान ने बताया कि वर्ष 1998 तक पार्क गुलजार रहा। इसके बाद अफसरों की अनदेखी के चलते यह वीरान होने लगा। डीएफओ यूसी राय का कहना है कि प्रस्ताव बनाकर भेजा जा चुका है। उम्मीद है जल्द ही स्वीकृति मिल जाएगी।
पार्क के अंदर बच्चों के लिए कई छोटे-बड़े झूले लगे थे। इसके अलावा फव्वारा, फिश प्वाइंट और पिकनिक स्पाट बना था। अब झूलों के अधिकतर पुर्जे गायब हो चुके हैं। लोहे के एंगल मात्र बचे हैं। फव्वारा बंद है। पानी की टंकी गायब है। अब पूरे पार्क में गंदगी है। शराब की खाली बोतलें और पाउच बिखरे हैं। यह स्थान अब अराजकतत्वों का अड्डा बन चुका है। इस पार्क में बच्चों के मनोरंजन के लिए हाथी, मगरमच्छ, मेढक, कछुआ की बड़ी-बड़ी मूर्तियों लगाई गईं थी। अब इन मूर्तियों के आसपास बड़ी-बड़ी झाड़ियां और घास उग आई है।
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मुख्य गेट पर लगा पार्क का बड़ा सा बोर्ड गायब हो चुका है। रोड के किनारे लगा सूचना बोर्ड उखाड़कर अंदर फेंक दिया गया है। बिजली का बिल वन विभाग के जिम्मेदारों ने जमा नहीं किया है। इसके चलते करीब एक वर्ष से पार्क का कनेक्शन बिजली विभाग ने काट दिया था। चोरों ने झूला आदि का सामान पार कर दिया है।
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हमीरपुर-कालपी मार्ग पर शहरी क्षेत्र में तत्कालीन डीएम डॉ. बीपी नीलरत्न ने बच्चों के मनोरंजन के लिए सिटी फारेस्ट के नाम से पार्क बनवाया था। उद्घाटन उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल स्व. डॉ. मोतीलाल बोरा ने 1993 में किया था। पार्क वन विभाग की जमीन पर बना था। देख-रेख और रखरखाव का जिम्मा भी जंगल के अफसरों ने ही संभाल रखा था। समाजसेवी जलीस खान ने बताया कि वर्ष 1998 तक पार्क गुलजार रहा। इसके बाद अफसरों की अनदेखी के चलते यह वीरान होने लगा। डीएफओ यूसी राय का कहना है कि प्रस्ताव बनाकर भेजा जा चुका है। उम्मीद है जल्द ही स्वीकृति मिल जाएगी।
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पार्क के अंदर बच्चों के लिए कई छोटे-बड़े झूले लगे थे। इसके अलावा फव्वारा, फिश प्वाइंट और पिकनिक स्पाट बना था। अब झूलों के अधिकतर पुर्जे गायब हो चुके हैं। लोहे के एंगल मात्र बचे हैं। फव्वारा बंद है। पानी की टंकी गायब है। अब पूरे पार्क में गंदगी है। शराब की खाली बोतलें और पाउच बिखरे हैं। यह स्थान अब अराजकतत्वों का अड्डा बन चुका है। इस पार्क में बच्चों के मनोरंजन के लिए हाथी, मगरमच्छ, मेढक, कछुआ की बड़ी-बड़ी मूर्तियों लगाई गईं थी। अब इन मूर्तियों के आसपास बड़ी-बड़ी झाड़ियां और घास उग आई है।
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मुख्य गेट पर लगा पार्क का बड़ा सा बोर्ड गायब हो चुका है। रोड के किनारे लगा सूचना बोर्ड उखाड़कर अंदर फेंक दिया गया है। बिजली का बिल वन विभाग के जिम्मेदारों ने जमा नहीं किया है। इसके चलते करीब एक वर्ष से पार्क का कनेक्शन बिजली विभाग ने काट दिया था। चोरों ने झूला आदि का सामान पार कर दिया है।