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मंडी अधिगृहीत होने से व्यापार को लगा झटका
अमर उजाला ब्यूरो, हमीरपुर
Updated Sun, 26 Feb 2017 10:42 PM IST
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सुमेरपुर मंडी में लगा ज्वार का ढेर।
- फोटो : अमर उजाला
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नोटबंदी के बाद चुनाव की आचार संहिता लग जाने से गल्ला मंडी का व्यापार काफी प्रभावित रहा। पिछले साल जहां फरवरी माह में 14 लाख राजस्व मिला था। वहीं, इस साल अभी तक दस लाख की वसूली हो सकी है। इस माह का लक्ष्य 18.33 लाख रखा गया था। वसूली कम होने का कारण चुनाव के चलते
व्यापार बंद होना बताया जा रहा है। नोटबंदी के बाद गल्ला मंडी का व्यापार जनवरी माह में रुटीन पर आया। लेकिन मंडी से चुनाव प्रक्रिया कराने के लिए प्रशासन ने नीलामी चबूतरों के अलावा व्यापारियों की दुकानें भी अधिगृहीत कर लीं। जिससे दर्जनों व्यापारी सड़क पर ही व्यापार करने लगे। पोलिंग पार्टियां
रवाना करने के लिए मंडी कर्मियों ने मंडी की सड़कें भी खाली करवा दीं। जिससे व्यापार पूरी तरह से ठप हो गया।मंडी सचिव देवकुमार पोरवाल कहते हैं कि फरवरी माह में 13.72 लाख रुपये मंडी शुल्क प्राप्त हुआ था। जो इस वर्ष अभी तक दस लाख ही वसूल हो पाया है। बताया कि इस माह का लक्ष्य 18.33 लाख
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रखा गया है। जिसके सापेक्ष सिर्फ दस लाख की वसूली हुई है। बताया कि इस वक्त ज्वार की आवक बढ़ी है। पिछले वर्ष माह फरवरी में आठ हजार क्विंटल ज्वार आई थी। लेकिन इस बाद 15 हजार क्विंटल आई। लेकिन भाव कम होने के कारण ज्यादा मंडी शुल्क वसूल नहीं हो सका। पिछले माह फरवरी माह में
ज्वार का भाव 4500 रुपये था। जबकि इस साल 2500 रुपये प्रति क्विंटल है। बताया कि पिछले वर्ष माह फरवरी में छह हजार क्विंटल तिल आया था। वहीं इस वर्ष दो हजार क्विंटल आ सका है। इससे भी मंडी शुल्क में फर्क पड़ा है। बताया कि पिछले माह फरवरी तक 4.26 करोड़ लक्ष्य के सापेक्ष 2.21 करोड़ का
राजस्व वसूल किया गया था। लेकिन पिछले वर्ष सूखा पड़ने के कारण इस लक्ष्य को घटाकर 2.96 करोड़ कर दिया गया। जिसके सापेक्ष अब तक 1.40 करोड़ वसूल हो सका है। बताया कि नोटबंदी के बाद से व्यापार पूरी तरह से ठप है। जनवरी में व्यापार पटरी में आना शुरू हुआ, लेकिन चुनाव के कारण मंडी को
अधिगृहीत कर लेने से एक बार फिर व्यापार प्रभावित हो गया। व्यापारी कुंज बिहारी पांडेय, रामरूप शिवहरे आदि ने बताया कि चुनाव में हर बार व्यापार काफी प्रभावित होता है। जिससे खाद्यान्न की आमद में फर्क पड़ता है। किसान इस मंडी की बजाए दूसरी मंडियों का रुख कर लेते हैं।
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व्यापार बंद होना बताया जा रहा है। नोटबंदी के बाद गल्ला मंडी का व्यापार जनवरी माह में रुटीन पर आया। लेकिन मंडी से चुनाव प्रक्रिया कराने के लिए प्रशासन ने नीलामी चबूतरों के अलावा व्यापारियों की दुकानें भी अधिगृहीत कर लीं। जिससे दर्जनों व्यापारी सड़क पर ही व्यापार करने लगे। पोलिंग पार्टियां
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रवाना करने के लिए मंडी कर्मियों ने मंडी की सड़कें भी खाली करवा दीं। जिससे व्यापार पूरी तरह से ठप हो गया।मंडी सचिव देवकुमार पोरवाल कहते हैं कि फरवरी माह में 13.72 लाख रुपये मंडी शुल्क प्राप्त हुआ था। जो इस वर्ष अभी तक दस लाख ही वसूल हो पाया है। बताया कि इस माह का लक्ष्य 18.33 लाख
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रखा गया है। जिसके सापेक्ष सिर्फ दस लाख की वसूली हुई है। बताया कि इस वक्त ज्वार की आवक बढ़ी है। पिछले वर्ष माह फरवरी में आठ हजार क्विंटल ज्वार आई थी। लेकिन इस बाद 15 हजार क्विंटल आई। लेकिन भाव कम होने के कारण ज्यादा मंडी शुल्क वसूल नहीं हो सका। पिछले माह फरवरी माह में
ज्वार का भाव 4500 रुपये था। जबकि इस साल 2500 रुपये प्रति क्विंटल है। बताया कि पिछले वर्ष माह फरवरी में छह हजार क्विंटल तिल आया था। वहीं इस वर्ष दो हजार क्विंटल आ सका है। इससे भी मंडी शुल्क में फर्क पड़ा है। बताया कि पिछले माह फरवरी तक 4.26 करोड़ लक्ष्य के सापेक्ष 2.21 करोड़ का
राजस्व वसूल किया गया था। लेकिन पिछले वर्ष सूखा पड़ने के कारण इस लक्ष्य को घटाकर 2.96 करोड़ कर दिया गया। जिसके सापेक्ष अब तक 1.40 करोड़ वसूल हो सका है। बताया कि नोटबंदी के बाद से व्यापार पूरी तरह से ठप है। जनवरी में व्यापार पटरी में आना शुरू हुआ, लेकिन चुनाव के कारण मंडी को
अधिगृहीत कर लेने से एक बार फिर व्यापार प्रभावित हो गया। व्यापारी कुंज बिहारी पांडेय, रामरूप शिवहरे आदि ने बताया कि चुनाव में हर बार व्यापार काफी प्रभावित होता है। जिससे खाद्यान्न की आमद में फर्क पड़ता है। किसान इस मंडी की बजाए दूसरी मंडियों का रुख कर लेते हैं।