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मजदूरी के लिए पलायन कर रहे किसान
ब्यूरो, अमर उजाला/हमीरपुर
Updated Fri, 27 Mar 2015 12:40 AM IST
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बारिश और ओलावृष्टि से खेतों में सड़ रही फसल। बैंक और साहूकारों का कर्ज।
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बेटी के ब्याह की चिंता। बेटे की शहर में हो रही पढ़ाई छूटने का भय तो जैसे
पीछे छूट गया।
अब तो दो वक्त की रोटी का जुगाड़ जैसे जिंदगी की सबसे बड़ी जंग हो गई। ये हकीकत किन्हीं एक दो घरों की नहीं है। बल्कि हजारों किसान परिवार इस मुसीबत से जूझ रहे हैं। सदमे से दम तोड़ने से तो अच्छा है कि हिम्मत रखकर कुछ किया जाए और जिया जाए।
इसी धारणा पर सैकड़ों किसान गांवों को छोड़कर मजदूरी के लिए परदेश चले गए हैं। ताकि परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो सके। गुरुवार को अमर उजाला टीम ने फसल बर्बादी का दंश झेल रहे गांवों का दौरा किया तो कुछ ऐसी ही हकीकत सामने आई। पढ़िए कुम्हऊगांव के किसानों की व्यथा, जहां लेखपाल ने 70 फीसदी नुकसान होना बताया।
कुम्हऊपुर गांव में घुसते ही एक घर के आगे छप्पर के नीचे सैय्यददीन (70) लेटा मिला। बाइक की आवाज सुन चारपाई से उठकर बैठ गया। हम कुछ कहते इससे पहले ही वह पूछ बैठे... का है? बताया कि अमर उजाला से हैं और बारिश में हुए नुकसान का हाल जानने आए हैं तो छप्पर के पीछे एक कच्चे कमरे में लेटी उसकी पत्नी चंद्रकली बोली, लाला कछु नहीं बचो सब बर्बाद हुईगा।
मदद मिलने की बात पूछी तो वृद्ध ने कहा कि उसे 750 रुपये की चेक मिली है। वह हमीरपुर में बैंक गया, वहां पहचान पत्र मांगा जो उसके पास नहीं है। इसलिए चेक अभी रखी है। तभी उसका पुत्र जयप्रकाश आ गया। फसल खराब होने पर परिवार का खर्च कैसे चल रहा है पूछने पर वह टीम को अंदर ले गया।
कच्चे मकान में सिर्फ एक जगह खपरैल मिला। आंगन में पड़ी चारपाई में फटे पुराने कपड़े गरीबी बयां कर रहे थे। वहीं घर के पीछे की तरफ खुले में बनी रसोई में जंगल से बीनकर लाई गई लकड़ियां पड़ी मिलीं। एक बोरी मेें करीब ढाई किलो आटा था। सैय्यददीन ने अपनी लड़खड़ाती आवाज से कहा कि उसके पास मात्र पांच बीघा खेत है। जेमा आधे परती परे हैं। बाकी मा चना बौए रहयं। ज्यादा पानी बरसैं से वेहू खराब हुई गए। का करबे अब। भगवान नीक थोई करत हैं।
जयप्रकाश गांव के कालेज में कक्षा 11 में पढ़ रहा है। बताया कि घर में खाने का सामान खरीदने के लिए पैसा नहीं है। छह महीने से लड़के क ी फीस जमा नहीं कर पाई है। जयप्रकाश ने अपना हौसला नहीं तोड़ा है। कहता है कि मेहनत मजदूरी कर वह फीस जमा करेगा। बहन विनीता शादी लायक है। लड़का देखा है लेकिन फसल ने साथ नहीं दिया तो शादी अब अगले साल हो पाएंगी।
अब तो दो वक्त की रोटी का जुगाड़ जैसे जिंदगी की सबसे बड़ी जंग हो गई। ये हकीकत किन्हीं एक दो घरों की नहीं है। बल्कि हजारों किसान परिवार इस मुसीबत से जूझ रहे हैं। सदमे से दम तोड़ने से तो अच्छा है कि हिम्मत रखकर कुछ किया जाए और जिया जाए।
इसी धारणा पर सैकड़ों किसान गांवों को छोड़कर मजदूरी के लिए परदेश चले गए हैं। ताकि परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो सके। गुरुवार को अमर उजाला टीम ने फसल बर्बादी का दंश झेल रहे गांवों का दौरा किया तो कुछ ऐसी ही हकीकत सामने आई। पढ़िए कुम्हऊगांव के किसानों की व्यथा, जहां लेखपाल ने 70 फीसदी नुकसान होना बताया।
कुम्हऊपुर गांव में घुसते ही एक घर के आगे छप्पर के नीचे सैय्यददीन (70) लेटा मिला। बाइक की आवाज सुन चारपाई से उठकर बैठ गया। हम कुछ कहते इससे पहले ही वह पूछ बैठे... का है? बताया कि अमर उजाला से हैं और बारिश में हुए नुकसान का हाल जानने आए हैं तो छप्पर के पीछे एक कच्चे कमरे में लेटी उसकी पत्नी चंद्रकली बोली, लाला कछु नहीं बचो सब बर्बाद हुईगा।
मदद मिलने की बात पूछी तो वृद्ध ने कहा कि उसे 750 रुपये की चेक मिली है। वह हमीरपुर में बैंक गया, वहां पहचान पत्र मांगा जो उसके पास नहीं है। इसलिए चेक अभी रखी है। तभी उसका पुत्र जयप्रकाश आ गया। फसल खराब होने पर परिवार का खर्च कैसे चल रहा है पूछने पर वह टीम को अंदर ले गया।
कच्चे मकान में सिर्फ एक जगह खपरैल मिला। आंगन में पड़ी चारपाई में फटे पुराने कपड़े गरीबी बयां कर रहे थे। वहीं घर के पीछे की तरफ खुले में बनी रसोई में जंगल से बीनकर लाई गई लकड़ियां पड़ी मिलीं। एक बोरी मेें करीब ढाई किलो आटा था। सैय्यददीन ने अपनी लड़खड़ाती आवाज से कहा कि उसके पास मात्र पांच बीघा खेत है। जेमा आधे परती परे हैं। बाकी मा चना बौए रहयं। ज्यादा पानी बरसैं से वेहू खराब हुई गए। का करबे अब। भगवान नीक थोई करत हैं।
जयप्रकाश गांव के कालेज में कक्षा 11 में पढ़ रहा है। बताया कि घर में खाने का सामान खरीदने के लिए पैसा नहीं है। छह महीने से लड़के क ी फीस जमा नहीं कर पाई है। जयप्रकाश ने अपना हौसला नहीं तोड़ा है। कहता है कि मेहनत मजदूरी कर वह फीस जमा करेगा। बहन विनीता शादी लायक है। लड़का देखा है लेकिन फसल ने साथ नहीं दिया तो शादी अब अगले साल हो पाएंगी।