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अनूठी परंपरा: बच्चियों ने किया भूले-बिसरे पितरों का तर्पण
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हमीरपुर। बुंदेलखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति की पहचान रही महबुलिया की परंपरा अब धीरे-धीरे गांवों तक सिमटती जा रही है। पितृपक्ष में 15 दिनों तक निभाई जाने वाली अनूठी लोकरीति में छोटी-छोटी बच्चियां पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करती हैं। एक ओर जहां घरों में श्राद्ध और तर्पण के जरिये पूर्वजों को याद किया जाता है। वहीं बुंदेलखंड में बच्चियां पारंपरिक गीत गाकर महबुलिया की पूजा करती हैं।
महबुलिया बुंदेलखंड की ऐसी लोकपरंपरा है जिसमें धार्मिक आस्था के साथ बच्चों को संस्कारों से जोड़ने का संदेश भी छिपा है। पितृपक्ष के दौरान लगातार 15 दिनों तक गोधूलि बेला में इसका आयोजन किया जाता है। बच्चियां समूह बनाकर गांव की गलियों और चौबारों में महबुलिया के पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। उनकी तोतली आवाज में गूंजते गीत ग्रामीण परिवेश में लोकपर्व जैसा माहौल बना देते हैं। यह परंपरा पूर्वजों के प्रति सम्मान और पुरानी पीढ़ी से मिले संस्कारों को आगे बढ़ाने का माध्यम मानी जाती है।
कांटेदार झाड़ पर सजाती हैं रंग-बिरंगे फूल
महबुलिया की पूजा की विधि भी बेहद अनूठी है। बच्चियां पूजा स्थल को गाय के गोबर से लीपकर आटे से चौक बनाती हैं। इसके बाद कांटेदार झाड़ को रंग-बिरंगे फूलों और पत्तियों से सजाकर महबुलिया का स्वरूप देती हैं। पूजन के बाद बच्चियां पारंपरिक लोकगीत गाते हुए महबुलिया को गांव के किसी तालाब या पोखर तक ले जाती हैं। वहां कांटों से फूलों को अलग कर पानी में विसर्जित किया जाता है। पूजा और विसर्जन के बाद लौटते समय बच्चियां राहगीरों को भीगी हुई चने की दाल और गुड़ का प्रसाद बांटती हैं। सामूहिक सहभागिता, लोकगीतों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के जरिये बुंदेली संस्कृति के रंग दिखाई देते हैं।
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भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी लोकमान्यता
खड़ेही लोधन गांव के पूर्व प्रधान राजाराम तिवारी और वीरेंद्र सिंह राजपूत के अनुसार, उनके पूर्वज महबुलिया से जुड़ी एक लोकमान्यता सुनाया करते थे। इसके मुताबिक, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने भूले-बिसरे पितरों का तर्पण किया था। इसी मान्यता को इस परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। यह कथा क्षेत्र में पीढ़ियों से चली आ रही लोकविश्वास की परंपरा का हिस्सा है।
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महबुलिया बुंदेलखंड की ऐसी लोकपरंपरा है जिसमें धार्मिक आस्था के साथ बच्चों को संस्कारों से जोड़ने का संदेश भी छिपा है। पितृपक्ष के दौरान लगातार 15 दिनों तक गोधूलि बेला में इसका आयोजन किया जाता है। बच्चियां समूह बनाकर गांव की गलियों और चौबारों में महबुलिया के पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। उनकी तोतली आवाज में गूंजते गीत ग्रामीण परिवेश में लोकपर्व जैसा माहौल बना देते हैं। यह परंपरा पूर्वजों के प्रति सम्मान और पुरानी पीढ़ी से मिले संस्कारों को आगे बढ़ाने का माध्यम मानी जाती है।
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कांटेदार झाड़ पर सजाती हैं रंग-बिरंगे फूल
महबुलिया की पूजा की विधि भी बेहद अनूठी है। बच्चियां पूजा स्थल को गाय के गोबर से लीपकर आटे से चौक बनाती हैं। इसके बाद कांटेदार झाड़ को रंग-बिरंगे फूलों और पत्तियों से सजाकर महबुलिया का स्वरूप देती हैं। पूजन के बाद बच्चियां पारंपरिक लोकगीत गाते हुए महबुलिया को गांव के किसी तालाब या पोखर तक ले जाती हैं। वहां कांटों से फूलों को अलग कर पानी में विसर्जित किया जाता है। पूजा और विसर्जन के बाद लौटते समय बच्चियां राहगीरों को भीगी हुई चने की दाल और गुड़ का प्रसाद बांटती हैं। सामूहिक सहभागिता, लोकगीतों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के जरिये बुंदेली संस्कृति के रंग दिखाई देते हैं।
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भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी लोकमान्यता
खड़ेही लोधन गांव के पूर्व प्रधान राजाराम तिवारी और वीरेंद्र सिंह राजपूत के अनुसार, उनके पूर्वज महबुलिया से जुड़ी एक लोकमान्यता सुनाया करते थे। इसके मुताबिक, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने भूले-बिसरे पितरों का तर्पण किया था। इसी मान्यता को इस परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। यह कथा क्षेत्र में पीढ़ियों से चली आ रही लोकविश्वास की परंपरा का हिस्सा है।