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शहीद विजय कुमार का शव देवरिया पहुंचा, पत्नी ने शव उठाने से रोका, सीएम को बुलाने की मांग

Sat, 16 Feb 2019 05:40 PM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देवरिया
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देवरिया Published by: Vikas Kumar Updated Sat, 16 Feb 2019 05:40 PM IST
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martyr Vijay Kumar dead body reached deoria
शहीद विजय कुमार का पार्थिव शरीर पहुंचा गांव - फोटो : अमर उजाला

पुलवामा में हुए आतंकी हमले में शहीद हुए विजय कुमार का पार्थिव देह देवरिया के गांव में शाम 4 बजे पहुंचा। जगह-जगह वाहन रोक कर लोग श्रद्धांजलि अर्पित करते दिखे। इस बीच शहीद की पत्नी ने शव को उठाने से रोक दिया। उनकी मांग थी कि प्रदेश के मुख्यमंत्री यहां आएं। 

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इससे पहले उनके पिता रामायण मौर्य ने कल इस घटना को लेकर बहुत ही भावुक बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि बस वर्दी पहनाकर हथियार थमा देते हैं। पॉवर तो देते नहीं, फिर बेटे तो शहीद होंगे ही। मौत का यह खेल कब तक चलेगा। सरकार सेना को खुली छूट क्यों नहीं देती। दरवाजे पर ढांढस बंधाने पहुंचे अफसरों से तीखे लहजे में पिता ने अपनी भड़ास निकाली। 
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कहा कि विजय बुढ़ापे का इकलौता सहारा था। उसे खोने का गम है, लेकिन इससे कहीं ज्यादा शहादत पर फख्र है। दुनिया में कोई अमर होकर नहीं आता, लेकिन विजय अमर होकर गया है। मैंने तो अपने लाल को देश को सौंप दिया। हमें तो बस बदला चाहिए। चिंता इस बात की है कि घर में दो बहुएं हैं, दोनों विधवा हो गईं। मासूम बच्चे हैं, अब उनकी देखभाल कैसे होगी। पिता की बातें सुन अफसरों की भी आंखें डबडबा गईं। वह ढांढस बंधाते हुए सरकार से हरसंभव मदद का आश्वासन देते रहे। 
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पुलवामा में हुए आतंकी हमले में विजय के शहीद होने की खबर वैसे तो गांव में देर रात तक आ गई थी, लेकिन पिता को इसकी जानकारी नहीं दी गई। अलसुबह दरवाजे पर भीड़ पहुंची और जब उन्हें यह बताया गया तो मानों पैरों तले जमीन खिसक गई। जवान बेटे को खोने के गम में पिता बेहाल थे। कुछ देर बाद उनके आंखों के आंसू भी सूख गए। दरवाजे पर आने-जाने वाले हर जिम्मेदार से वह यही कह रहे थे कि बस अब राजनीति बंद होनी चाहिए। सेना को खुली छूट मिले और जवानों की शहादत का बदला लिया जाए। दोपहर करीब 12 बजे प्रभारी डीएम राजेश त्यागी और एसपी एन. कोलांचि दरवाजे पर पहुंचे। घर के बाहर टीनशेड में तख्त पर बैठे पिता से मिलकर संवेदना प्रकट की। रोते हुए बुजुर्ग पिता ने कहा कि विजय ही मेरे बुढ़ापे का लाठी था। उसे भी भगवान ने छीन लिया, लेकिन वह देश की रक्षा के लिए शहीद हुआ है। इसका मुझे गर्व है, अब आगे का देखना है।

घर निर्माण का वादा कर गए थे विजय 
शहीद का पिता रामायण कुशवाहा ने कहा कि आठ फरवरी को जाते समय विजय बोला था कि अगली छुट्टी में आ रहा हूं तो अधूरे बरामदे का छत कराऊंगा। इसके लिए करीब 10 लाख रुपये बैंक से ऋण भी लिया हूं। लोगों से ऋण माफ कराने की बात कही।

विजय के कंधे पर थी पूरे परिवार की जिम्मेदारी  
रामायण कुशवाहा के तीन बेटों में दो दुनियां को छोड़ चुके हैं। बड़ा बेटा अशोक अपने परिवार के साथ गुजरात में रहकर किसी कंपनी में काम करते हैं। दूसरे नंबर का बेटा कृष्ण कुमार की गंभीर बीमारी से मौत हो चुकी है। कृष्ण कुमार की दो बेटियां अमृता और रीता हैं जो घर पर मां दुर्गावती के साथ रहती हैं। सभी का देखभाल विजय करते थे।


पत्नी की सिसकियां सुन भर जा रही थीं आंखें  
शहीद विजय के दरवाजे से घर के भीतर तक लोग मौजूद थे। हर कोई अलग-अलग तरीके से शहीद की शहादत पर दुख जता रहा था। घर के अंदर मौजूद पत्नी विजयलक्ष्मी की रुक-रुक कर आ रही रोने की आवाज मौजूद लोगों को झकझोर रही थी, मासूम बेटी आराध्या अपने खेलने में व्यस्त थी। कभी मां के तो कभी कमरे में मौजूद अन्य महिलाओं की गोद में जाकर खेल रही थी।

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