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अंतरराष्ट्रीय चरस तस्कर गिरफ्तार
Updated Thu, 17 May 2018 01:29 AM IST
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- फोटो : demo
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गोरखपुर। गोरखपुर एसटीएफ और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो लखनऊ की टीम ने बुधवार को चरस तस्करी के अंतरराष्ट्रीय गिरोह का पर्दाफाश किया। साथ ही एंबुलेंस से तस्करी को ले जाई जा रही 24 किलो 500 ग्राम चरस बरामद की। इसकी अंतरराष्ट्रीय कीमत 2.50 करोड़ रुपये बताई गई है। इस मामले में खोराबार थानाक्षेत्र से जिन्हें पकड़ा गया है वे सुल्तानपुर के थाना कोतवाली देहात के ओदरा गांव निवासी मुहम्मद सोहराब और कोतवाली थानाक्षेत्र के मकान नंबर-100 सिटी फैशन गली गंदा नाला निवासी कादिर अहमद शामिल हैं। उन्हें जेल भेज दिया गया है।
एसटीएफ के एसएसपी अभिषेक सिंह को गोरखपुर के रास्ते नेपाल तक चरस तस्करी की सूचना मिली थी। इस पर अलर्ट जारी किया गया था। एसटीएफ के अपर पुलिस अधीक्षक एस. आनंद और प्रभारी निरीक्षक सत्यप्रकाश की टीम ने गोपनीय सूचना जुटानी शुरू कर दी। इसी बीच पता चला कि नेपाल से भारी मात्रा में चरस दिल्ली और पश्चिमी यूपी में ले जाई जा रही है। एसटीएफ या पुलिस को चकमा देने के लिए एंबुलेंस का इस्तेमाल किया जा रहा है। हूटर लगी एंबुलेंस से चरस की खेप जाएगी। इस पर एसटीएफ की गोरखपुर इकाई ने घेराबंदी की और खोराबार से दो तस्करों को गिरफ्तार कर लिया। एंबुलेंस जब्त कर ली गई है। जांच में स्ट्रेचर सीट के नीचे छिपाई गई चरस भी जब्त कर ली गई है। इस मामले में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने केस दर्ज कर लिया है।
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गिरफ्तार मोहम्मद सोहराब ने एसटीएफ को बताया कि पहले वह जीप ड्राइवर था। इसी बीच सुल्तानपुर के एक अन्य ड्राइवर कल्लू से मुलाकात हुई। कल्लू ही उसे लेकर बहराइच आया और एक सर्वे कंपनी में ड्राइवर बनवा दिया। वहीं पर नेपालगंज निवासी असगर से उसकी पहचान हुई। बाद में पता चला कि कल्लू और असगर चरस के धंधे में लिप्त हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान पर चरस पहुंचाने के लिए 30-40 हजार रुपये मिलते हैं। वह इसी लालच में फंस गया। एसटीएफ की पूछताछ में ही सोहराब ने कबूल किया कि 2008 में सुल्तानपुर के महताब की इंडिया गाड़ी से 50 किलोग्राम चरस कैराना के माजिद के पास ले जा रहा थी लेकिन बरेली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। तीन साल तक वह बरेली जेल में बंद रहा। जेल से छूटने के बाद भी वह चरस की तस्करी में लग गया। नेपाल के असगर और शराफत ने ही कैराना के माजिद और डॉ. अरशद से परिचय कराया था। चरस पहुंचाने पर 35 हजार रुपये मिलने थे। इसमें से 10 हजार रुपये कादिर को दिया जाना था।
बरामदगी
24,500 किलोग्राम चरस, एक इको एंबुलेंस, एक पैन कार्ड, दो डीएल, एक मतदाता पहचान पत्र, दो आधार कार्ड, 1500 रुपये नकद और एक अन्य वाहन का पंजीकरण प्रमाण पत्र।
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एसटीएफ के एसएसपी अभिषेक सिंह को गोरखपुर के रास्ते नेपाल तक चरस तस्करी की सूचना मिली थी। इस पर अलर्ट जारी किया गया था। एसटीएफ के अपर पुलिस अधीक्षक एस. आनंद और प्रभारी निरीक्षक सत्यप्रकाश की टीम ने गोपनीय सूचना जुटानी शुरू कर दी। इसी बीच पता चला कि नेपाल से भारी मात्रा में चरस दिल्ली और पश्चिमी यूपी में ले जाई जा रही है। एसटीएफ या पुलिस को चकमा देने के लिए एंबुलेंस का इस्तेमाल किया जा रहा है। हूटर लगी एंबुलेंस से चरस की खेप जाएगी। इस पर एसटीएफ की गोरखपुर इकाई ने घेराबंदी की और खोराबार से दो तस्करों को गिरफ्तार कर लिया। एंबुलेंस जब्त कर ली गई है। जांच में स्ट्रेचर सीट के नीचे छिपाई गई चरस भी जब्त कर ली गई है। इस मामले में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने केस दर्ज कर लिया है।
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नेपाल से कैराना ले जाई जा रही थी चरस
एसटीएफ के मुताबिक चरस नेपाल से एंबुलेंस में रखी गई, फिर गोरखपुर-सुल्तानपुर से होकर इसे कैराना शामली ले जाया जाना था। कैराना के आल कला निवासी माजिद पुत्र फकरु और उसके साथी खेलकला निवासी डॉ. अरशद पुत्र रियासत को चरस दी जानी थी, लेकिन तस्कर पहले ही एसटीएफ के हत्थे चढ़ गए। अब कैराना के आरोपियों की गिरफ्तारी की कोशिश की जा रही है।
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ड्राइवर से बना चरस तस्कर
गिरफ्तार मोहम्मद सोहराब ने एसटीएफ को बताया कि पहले वह जीप ड्राइवर था। इसी बीच सुल्तानपुर के एक अन्य ड्राइवर कल्लू से मुलाकात हुई। कल्लू ही उसे लेकर बहराइच आया और एक सर्वे कंपनी में ड्राइवर बनवा दिया। वहीं पर नेपालगंज निवासी असगर से उसकी पहचान हुई। बाद में पता चला कि कल्लू और असगर चरस के धंधे में लिप्त हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान पर चरस पहुंचाने के लिए 30-40 हजार रुपये मिलते हैं। वह इसी लालच में फंस गया। एसटीएफ की पूछताछ में ही सोहराब ने कबूल किया कि 2008 में सुल्तानपुर के महताब की इंडिया गाड़ी से 50 किलोग्राम चरस कैराना के माजिद के पास ले जा रहा थी लेकिन बरेली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। तीन साल तक वह बरेली जेल में बंद रहा। जेल से छूटने के बाद भी वह चरस की तस्करी में लग गया। नेपाल के असगर और शराफत ने ही कैराना के माजिद और डॉ. अरशद से परिचय कराया था। चरस पहुंचाने पर 35 हजार रुपये मिलने थे। इसमें से 10 हजार रुपये कादिर को दिया जाना था।
तो कादिर बन जाता था मरीज
एंबुलेंस से चरस ले जाने वाले सोहराब और कादिर शातिर हैं। पुलिस को देखते ही कादिर मरीज बनकर एंबुलेंस में लेट जाता था। ऑक्सीजन सिलेंडर की कैप उसके मुंह में लगा दी जाती थी। ग्लूकोज की बोतल भी टंगी रहती थी। इससे पुलिस भ्रम में पड़ जाती थी और पूछताछ नहीं होती थी। एंबुलेंस का हूटर बजाकर आराम से चरस की तस्करी की जाती थी। एंबुलेंस की वजह से टोल टैक्स भी नहीं देना पड़ता था।बरामदगी
24,500 किलोग्राम चरस, एक इको एंबुलेंस, एक पैन कार्ड, दो डीएल, एक मतदाता पहचान पत्र, दो आधार कार्ड, 1500 रुपये नकद और एक अन्य वाहन का पंजीकरण प्रमाण पत्र।