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चंपा देवी पार्क में भागवत कथा का पांचवां दिन, कंस वध पर गूंजा वृंदावन बिहारीलाल का जयकारा
Fri, 13 Dec 2019 11:29 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
Published by: गोरखपुर ब्यूरो
Updated Fri, 13 Dec 2019 11:29 AM IST
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सुप्रसिद्ध कथा वाचिका आस्था भारती से कथा सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु
- फोटो : अमर उजाला
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से चंपा देवी पार्क में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन बृहस्पतिवार को व्रजवासियों के द्वारा प्रभु की विदाई, मथुरा में तारनहार का अभिवादन, बसंतोत्सव व कंस वध आदि प्रसंगों और उनमें छिपे गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों का सुप्रसिद्ध कथा वाचक आस्था भारती ने वर्णन किया। तारनहार अभिवादन प्रसंग पर श्रद्धालुओं पर फूलों की वर्षा की गई। पूरा पंडाल ‘बांके बिहारी लाल की जय’, ‘साचे दरबार की जय’ और ‘गुरु गोरखनाथ’ के जयकारे से गूंज उठा। अधर्म पर धर्म की विजय का शंखनाद गुंजायमान हो उठा। कथा के अंतराल में श्रद्धालु भजनों पर झूमते रहे।
सुप्रसिद्ध कथा वाचिका आस्था भारती से कथा सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु
- फोटो : अमर उजाला
साध्वी आस्था भारती ने कहा कि भगवान ने हमेशा धर्म की स्थापना और भक्तों के कल्याण के लिए धरती पर अवतरण लिया। मनुष्य के भीतर की आसुरी शक्तियों का भी नाश कर परम सुख और आनंद का बोध कराते हैं। साध्वी ने कहा कि जब संशय ग्रस्त अक्रूर जी श्रीकृष्ण और बलराम को रथ पर बैठाकर मथुरा की ओर बढ़ रहे थे, तब मार्ग में वे नदी में स्नान करने के लिए रुके। उन्होंने नदी में स्नान करते हुए प्रभु की दिव्यता का दर्शन किया और मन के सभी संशयों से मुक्ति को प्राप्त किया।
सुप्रसिद्ध कथा वाचिका आस्था भारती से कथा सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु
- फोटो : अमर उजाला
साध्वी ने समझाया कि लोग कहते हैं, उन्हें नदी में ही श्रीकृष्ण और बलराम का दर्शन हो गया, परंतु ऐसा नहीं है। भागवत महापुराण समाधि की उत्कृष्टतम अवस्था में लिखा गया ग्रंथ है। फिर एक साधारण मानव इनमें छिपे गूढ़ अर्थ को अपनी साधारण सी बुद्धि से कैसे समझ सकता है। वास्तविकता में अक्रूर ने ध्यान की नदी में उतरकर प्रभु का दर्शन किया था। आधुनिक समाज में भी ध्यान करना प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया है। कोई बल्ब पर दृष्टि एकाग्र करने को ध्यान कहता है तो कोई मोमबत्ती पर। कोई मन को कल्पना के द्वारा किसी सुंदर स्थान पर ले जाने को ध्यान की प्रक्रिया समझ रहा है तो कोई बाहरी नेत्रों को मूंद कर बैठ जाने को ध्यान कहता है।
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सुप्रसिद्ध कथा वाचिका आस्था भारती से कथा सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु
- फोटो : अमर उजाला
आशुतोष महाराज कहते हैं कि उपास्य के बिना उपासना कैसी। साध्य के बिना साधना कैसी। ध्यान दो शब्दों का जोड़ है ध्येय-ध्याता। ध्याता हम हैं जो ध्यान करना चाहते हैं लेकिन हमारे पास ध्येय नहीं है जो स्वयं ईश्वर है। इसलिए सबसे पहले ध्येय की प्राप्ति करनी होगी। उस ईश्वर ध्येय को प्राप्त करने का केवल एक ही माध्यम है, जिसके बारे में यक्ष ने भी युधिष्ठिर से प्रश्न किया।
युधिष्ठिर ने कहा कि महापुरुषों के द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना होगा। यानी उस ध्येय की प्राप्ति के लिए हमें भी किसी ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरण में जाना होगा। इस अवसर मुख्य यजमान व्यापारी कल्याण बोर्ड के प्रदेश उपाध्यक्ष पुष्पदंत जैन, तुलस्यान फार्मा के निदेशक राजेश कुमार तुलस्यान, राम नक्षत्र सिंह ट्रेडर्स के महेंद्र सिंह, विजय अग्रवाल, अरुण कुमार मिश्रा, स्वामी नरेंद्रानंद, स्वामी सुमेधानंद, स्वामी अर्जुनानंद, अशोक अग्रवाल, नंदू मिश्रा, विकास जालान, जगरनाथ बैठा, मिथलेश शर्मा, दिनेश चौरसिया, अच्छेलाल गुप्ता, मुन्ना यादव, प्रभा पांडेय आदि मौजूद रहे।
युधिष्ठिर ने कहा कि महापुरुषों के द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना होगा। यानी उस ध्येय की प्राप्ति के लिए हमें भी किसी ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरण में जाना होगा। इस अवसर मुख्य यजमान व्यापारी कल्याण बोर्ड के प्रदेश उपाध्यक्ष पुष्पदंत जैन, तुलस्यान फार्मा के निदेशक राजेश कुमार तुलस्यान, राम नक्षत्र सिंह ट्रेडर्स के महेंद्र सिंह, विजय अग्रवाल, अरुण कुमार मिश्रा, स्वामी नरेंद्रानंद, स्वामी सुमेधानंद, स्वामी अर्जुनानंद, अशोक अग्रवाल, नंदू मिश्रा, विकास जालान, जगरनाथ बैठा, मिथलेश शर्मा, दिनेश चौरसिया, अच्छेलाल गुप्ता, मुन्ना यादव, प्रभा पांडेय आदि मौजूद रहे।
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सुप्रसिद्ध कथा वाचिका आस्था भारती से कथा सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु
- फोटो : अमर उजाला
अंधकार को क्यों धिक्कारें, अच्छा हो एक दीप जलाएं
कथाव्यास ने कहा अंधकार को क्यों धिक्कारें, अच्छा हो एक दीप जलाएं। अंधकार कितना ही घना क्यों न हो लेकिन एक छोटा सा दीपक जलाते ही वह क्षण भर में खत्म हो जाता है। इसी प्रकार कोई कितना भी पापी क्यों न हो। ज्ञान का दीपक जलते ही जन्म-जन्म के कष्ट मिट जाते हैं। अंगुलिमाल डाकू, गणिका वेश्या, सज्जन ठग सदृश अनेकों उदाहरण इतिहास हमारे समक्ष रखता है। परिवर्तन की इसी कहानी को आशुतोष महाराज ने वर्तमान में भी जीवंत कर दिखाया है।
कथाव्यास ने कहा अंधकार को क्यों धिक्कारें, अच्छा हो एक दीप जलाएं। अंधकार कितना ही घना क्यों न हो लेकिन एक छोटा सा दीपक जलाते ही वह क्षण भर में खत्म हो जाता है। इसी प्रकार कोई कितना भी पापी क्यों न हो। ज्ञान का दीपक जलते ही जन्म-जन्म के कष्ट मिट जाते हैं। अंगुलिमाल डाकू, गणिका वेश्या, सज्जन ठग सदृश अनेकों उदाहरण इतिहास हमारे समक्ष रखता है। परिवर्तन की इसी कहानी को आशुतोष महाराज ने वर्तमान में भी जीवंत कर दिखाया है।