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खरना आज, डाला छठ की तैयारी शुरू
Gorakhpur
Updated Tue, 28 Oct 2014 05:30 AM IST
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गोरखपुर। चार दिन तक मनाया जाने वाला छठ पर्व सोमवार को नहाय-खाय से शुरू हुआ। दूसरी ओर डाला छठ की तैयारियों में भी श्रद्घालु पूरे दिन व्यस्त रहे। छठ पूजा सामग्रियों के लिए लगी दुकानों पर देर शाम तक भीड़ रही। पूजन सामग्री और प्रसाद के इंतजाम में लोग व्यस्त रहे।
सोमवार को कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से छठ पर्व मनाने वाले परिवारों में पूजा का क्रम शुरू हो गया। सुबह व्रती महिलाओं ने स्नान आदि से निवृत्त होकर कद्दू भात बनाया। चतुर्थी तिथि को नहाय-खाय नाम से जाना जाता है। इस दिन पवित्र मन से इस तरह के भोजन का विधान है। इसके साथ ही घरों में डाला छठ की तैयारियां भी चलती रहीं। प्रसाद के लिए गेहूं धुलने, सुखाने और आटा तैयार करवाने का काम घरों में चलता रहा। वहीं बाजार में पूजन सामग्री की खरीदारी के लिए पूरे दिन भीड़ दिखी। छठ पूजा सामग्रियों के लिए बाजार में विशेष दुकानें लगाई गई हैं। शहर में कुछ छठ पूजा समितियों की ओर से लाउडस्पीकर पर व्रत की तिथियों और मुहूर्त का प्रचार कराया गया। मंगलवार को खरना मनाया जाएगा। इस दिन उपवास के बाद व्रती महिलाओं के किसी तालाब या नदी में स्नान करके सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है। इस दिन पूजन के बाद व्रती महिलाएं नमक रहित भोजन करती हैं। बुधवार को डाला छठ के मद्देनजर सोमवार पूरे दिन घाटों पर सफाई का काम चलता रहा।
चमत्कारों की देवी हैं षष्ठी माता
बच्चों के जन्म के बाद छठवां दिन हो या प्रत्येक चंद्रमास की षष्ठी तिथि पर षष्ठी देवी की उपासना करने का विधान है। ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ में षष्ठी देवी का महात्म्य, पूजन विधि एवं पृथ्वी पर इनकी पूजा का प्रसार आदि का सम्यक वर्णन है। मैथिल ग्रंथ ‘वर्ष कृत्य विधि’ में ‘प्रतिहार षष्ठी’ या ‘सूर्य षष्ठी’ की चर्चा की गई है। प्रतिहार का अर्थ है जादू या चमत्कार। अर्थात चमत्कारिक रूप से अभीष्ट फल देने वाली देवी। षष्ठी तिथि के स्वामी स्कंद हैं। यह तिथि स्कंद परिवार से जुड़ी है। षष्ठी देवी का नाम स्कंदमाता, देवसेना या कात्यायनी भी है। सप्तमी के स्वामी सूर्य देव हैं। सूर्य को पूर्ण ब्रह्म की सत्ता प्राप्त है। इसलिए इस व्रत में प्रकृति और परमपुरुष दोनों की पूजा होती है। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार षष्ठी देवी भगवान सूर्य नारायण की बहन हैं। मूल प्रकृति के छठवें अंश से इस देवी का प्रादुर्भाव हुआ है। इसलिए इन्हें षष्ठी देवी कहा गया है। षष्ठी देवी का संकथन है ‘मैं बारह आदित्यों में विचरण करती हूं’। इसलिए सूर्य उपासना में स्वयं षष्ठी देवी की पूजा संपन्न हो जाती है।
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-पंडित शरद चंद्र मिश्र, ज्योतिषाचार्य
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सोमवार को कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से छठ पर्व मनाने वाले परिवारों में पूजा का क्रम शुरू हो गया। सुबह व्रती महिलाओं ने स्नान आदि से निवृत्त होकर कद्दू भात बनाया। चतुर्थी तिथि को नहाय-खाय नाम से जाना जाता है। इस दिन पवित्र मन से इस तरह के भोजन का विधान है। इसके साथ ही घरों में डाला छठ की तैयारियां भी चलती रहीं। प्रसाद के लिए गेहूं धुलने, सुखाने और आटा तैयार करवाने का काम घरों में चलता रहा। वहीं बाजार में पूजन सामग्री की खरीदारी के लिए पूरे दिन भीड़ दिखी। छठ पूजा सामग्रियों के लिए बाजार में विशेष दुकानें लगाई गई हैं। शहर में कुछ छठ पूजा समितियों की ओर से लाउडस्पीकर पर व्रत की तिथियों और मुहूर्त का प्रचार कराया गया। मंगलवार को खरना मनाया जाएगा। इस दिन उपवास के बाद व्रती महिलाओं के किसी तालाब या नदी में स्नान करके सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है। इस दिन पूजन के बाद व्रती महिलाएं नमक रहित भोजन करती हैं। बुधवार को डाला छठ के मद्देनजर सोमवार पूरे दिन घाटों पर सफाई का काम चलता रहा।
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चमत्कारों की देवी हैं षष्ठी माता
बच्चों के जन्म के बाद छठवां दिन हो या प्रत्येक चंद्रमास की षष्ठी तिथि पर षष्ठी देवी की उपासना करने का विधान है। ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ में षष्ठी देवी का महात्म्य, पूजन विधि एवं पृथ्वी पर इनकी पूजा का प्रसार आदि का सम्यक वर्णन है। मैथिल ग्रंथ ‘वर्ष कृत्य विधि’ में ‘प्रतिहार षष्ठी’ या ‘सूर्य षष्ठी’ की चर्चा की गई है। प्रतिहार का अर्थ है जादू या चमत्कार। अर्थात चमत्कारिक रूप से अभीष्ट फल देने वाली देवी। षष्ठी तिथि के स्वामी स्कंद हैं। यह तिथि स्कंद परिवार से जुड़ी है। षष्ठी देवी का नाम स्कंदमाता, देवसेना या कात्यायनी भी है। सप्तमी के स्वामी सूर्य देव हैं। सूर्य को पूर्ण ब्रह्म की सत्ता प्राप्त है। इसलिए इस व्रत में प्रकृति और परमपुरुष दोनों की पूजा होती है। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार षष्ठी देवी भगवान सूर्य नारायण की बहन हैं। मूल प्रकृति के छठवें अंश से इस देवी का प्रादुर्भाव हुआ है। इसलिए इन्हें षष्ठी देवी कहा गया है। षष्ठी देवी का संकथन है ‘मैं बारह आदित्यों में विचरण करती हूं’। इसलिए सूर्य उपासना में स्वयं षष्ठी देवी की पूजा संपन्न हो जाती है।
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-पंडित शरद चंद्र मिश्र, ज्योतिषाचार्य