{"_id":"67-53098","slug":"Gorakhpur-53098-67","type":"story","status":"publish","title_hn":"यूनिवर्सिटी में शिक्षकों का टोटा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यूनिवर्सिटी में शिक्षकों का टोटा
Gorakhpur
Updated Sat, 17 Nov 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गोरखपुर। स्टेट यूनिवर्सिटी में शिक्षकों का टोटा हो गया है। इसके चलते पठन-पाठन प्रभावित हो रहा है। ऐसा राज्य सरकार द्वारा 2003 में जारी रोस्टर प्रणाली के चलते है जिसके तहत नियुक्ति के लिए यूनिवर्सिटी को यूनिट बनाया गया है। इसका विरोध करते हुए शिक्षक हाईकोर्ट भी गए और वहां से उनके पक्ष में फैसला भी हुआ। इसके बावजूद शासन अपने आदेश में संशोधन करने की बजाय सर्वोच्च न्यायालय चली गया। इस पर गोरखपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति ने पहल की तो पिछले महीने सर्वोच्च न्यायालय से यूनिवर्सिटी के पक्ष में फैसला हो गया। लेकिन शासन स्तर से अभी तक कोई नया आदेश जारी नहीं हो सका है।
राज्य सरकार ने 2003 में प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर, रीडर और लेक्चर की नियुक्ति के बाबत रोस्टर प्रणाली संबंधी आदेश जारी किया था। जारी शासनादेश के तहत प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए विभाग तथा रीडर और लेक्चर की नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालय को यूनिट बनाया गया था। इस शासनादेश के आधार पर विश्वविद्यालयों की ओर से 2006 में विज्ञापन जारी किया गया। विज्ञापन जारी होने के बाद शिक्षकों के स्तर से उच्च न्यायालय में तीन रिट याचिका दायर की गई। उच्च न्यायालय की इलाहाबाद बेंच ने 24 जुलाई 2008 को याचिका पर फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार द्वारा जारी शासनादेश को निरस्त कर दिया था।
हाईकोर्ट से प्रदेश शासन का आदेश निरस्त किए जाने के बाद राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी दाखिल किया। इस तरह 2003 से अधिकांश स्टेट यूनिवर्सिटी में शिक्षकों की नियुक्तियां नहीं हो पा रही हैं। उत्तर प्रदेश आवासीय विश्वविद्यालय शिक्षक महासंघ के अध्यक्ष प्रो. चितरंजन मिश्र बताते हैं कि शासन के इस आदेश के चलते गोरखपुर यूनिवर्सिटी में 150 पद रिक्त हैं। यहां 357 स्वीकृत पदों हैं जबकि नियुक्ति केवल 207 शिक्षकों की है।
विज्ञापन
विभाग में 18 पद स्वीकृत हैं जिसके सापेक्ष छह शिक्षक ही कार्यरत हैं। बीएससी और एमएससी को मिला कर पांच सौ सीट हैं। ऐसे में हर टीचर ओवर लोडेड है। नियमानुसार 16 पीरियड होना चाहिए एक शिक्षक का पर हर शिक्षक हफ्ते में 22-23 पीरियड ले रहा है। इसके बाद भी पोस्ट डॉक्टोरल फेलो की भी मदद ली जा रही है। सबसे ज्यादा दिक्कत प्रैक्टिकल में होती है।
- प्रो. विजय बहादुर उपाध्याय, विभागाध्यक्ष जूलॉजी
विभाग में कुल 32 पद स्वीकृत हैं जिसके सापेक्ष 13 शिक्षक काम कर रहे हैं। यहां भी पोस्ट डॉक्टोरल फेलो की मदद ली जा रही है। अन्य सभी शिक्षकों पर दबाव ज्यादा है।
- प्रो. ईश्वर दास, विभागाध्यक्ष रसायन विज्ञान
स्वीकृत पद हैं 24 जिसमें से 10 ही हैं वर्तमान में। विभाग में बीएससी और एमएससी को मिला कर 450 विद्यार्थी हैं। ऐसे में बस सब कुछ जोगाड़ तकनीक से चल रहा है। अगर समय से दाखिला और परीक्षाएं होने लगें तो अध्ययन-अध्यापन बुरी तरह प्रभावित होगा।
- प्रो.डीसी श्रीवास्तव, विभागाध्यक्ष भौतिक विज्ञान
उच्च न्यायालय से शासनादेश निरस्त होने के बाद राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी दाखिल किया। इस पर यूनिवर्सिटी की ओर से भी एसएलपी दायर की गई। अंतरिम रिलीफ के लिए प्रस्तुत आवेदन पर चीफ जस्टिस की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए एसएलपी में पारित होने वाले अंतिम आदेश के अधीन विश्वविद्यालय को रिक्त पदों (प्रोफेसर, रीडर और लेक्चरर) पर नियुक्ति करने क ी अनुमति प्रदान की। आदेश की प्रति राज्य सरकार को मिल गई है। अब उसे ही अंतिम निर्णय करना है। छह दिसंबर को लखनऊ में होने वाले राज्य स्तरीय कुलपति सम्मेलन में इस मुद्दे को उठाएंगे।
- प्रो. पीसी त्रिवेदी, कुलपति गोरखपुर यूनिवर्सिटी
विज्ञापन
राज्य सरकार ने 2003 में प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर, रीडर और लेक्चर की नियुक्ति के बाबत रोस्टर प्रणाली संबंधी आदेश जारी किया था। जारी शासनादेश के तहत प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए विभाग तथा रीडर और लेक्चर की नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालय को यूनिट बनाया गया था। इस शासनादेश के आधार पर विश्वविद्यालयों की ओर से 2006 में विज्ञापन जारी किया गया। विज्ञापन जारी होने के बाद शिक्षकों के स्तर से उच्च न्यायालय में तीन रिट याचिका दायर की गई। उच्च न्यायालय की इलाहाबाद बेंच ने 24 जुलाई 2008 को याचिका पर फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार द्वारा जारी शासनादेश को निरस्त कर दिया था।
विज्ञापन
हाईकोर्ट से प्रदेश शासन का आदेश निरस्त किए जाने के बाद राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी दाखिल किया। इस तरह 2003 से अधिकांश स्टेट यूनिवर्सिटी में शिक्षकों की नियुक्तियां नहीं हो पा रही हैं। उत्तर प्रदेश आवासीय विश्वविद्यालय शिक्षक महासंघ के अध्यक्ष प्रो. चितरंजन मिश्र बताते हैं कि शासन के इस आदेश के चलते गोरखपुर यूनिवर्सिटी में 150 पद रिक्त हैं। यहां 357 स्वीकृत पदों हैं जबकि नियुक्ति केवल 207 शिक्षकों की है।
विज्ञापन
विभाग में 18 पद स्वीकृत हैं जिसके सापेक्ष छह शिक्षक ही कार्यरत हैं। बीएससी और एमएससी को मिला कर पांच सौ सीट हैं। ऐसे में हर टीचर ओवर लोडेड है। नियमानुसार 16 पीरियड होना चाहिए एक शिक्षक का पर हर शिक्षक हफ्ते में 22-23 पीरियड ले रहा है। इसके बाद भी पोस्ट डॉक्टोरल फेलो की भी मदद ली जा रही है। सबसे ज्यादा दिक्कत प्रैक्टिकल में होती है।
- प्रो. विजय बहादुर उपाध्याय, विभागाध्यक्ष जूलॉजी
विभाग में कुल 32 पद स्वीकृत हैं जिसके सापेक्ष 13 शिक्षक काम कर रहे हैं। यहां भी पोस्ट डॉक्टोरल फेलो की मदद ली जा रही है। अन्य सभी शिक्षकों पर दबाव ज्यादा है।
- प्रो. ईश्वर दास, विभागाध्यक्ष रसायन विज्ञान
स्वीकृत पद हैं 24 जिसमें से 10 ही हैं वर्तमान में। विभाग में बीएससी और एमएससी को मिला कर 450 विद्यार्थी हैं। ऐसे में बस सब कुछ जोगाड़ तकनीक से चल रहा है। अगर समय से दाखिला और परीक्षाएं होने लगें तो अध्ययन-अध्यापन बुरी तरह प्रभावित होगा।
- प्रो.डीसी श्रीवास्तव, विभागाध्यक्ष भौतिक विज्ञान
उच्च न्यायालय से शासनादेश निरस्त होने के बाद राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी दाखिल किया। इस पर यूनिवर्सिटी की ओर से भी एसएलपी दायर की गई। अंतरिम रिलीफ के लिए प्रस्तुत आवेदन पर चीफ जस्टिस की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए एसएलपी में पारित होने वाले अंतिम आदेश के अधीन विश्वविद्यालय को रिक्त पदों (प्रोफेसर, रीडर और लेक्चरर) पर नियुक्ति करने क ी अनुमति प्रदान की। आदेश की प्रति राज्य सरकार को मिल गई है। अब उसे ही अंतिम निर्णय करना है। छह दिसंबर को लखनऊ में होने वाले राज्य स्तरीय कुलपति सम्मेलन में इस मुद्दे को उठाएंगे।
- प्रो. पीसी त्रिवेदी, कुलपति गोरखपुर यूनिवर्सिटी