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भक्तों ने की स्कंदमाता की पूजा
बलरामपुर/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 18 Oct 2015 11:06 PM IST
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या देवी सर्वभूतेषु मातृ रुपेण संस्थिता... की वंदना के साथ नवरात्र की पंचमी तिथि को देवी मंदिरों में स्कंदमाता की पूजा अर्चना पूरे विधि-विधान के साथ की गई। सूर्य मंडल की अधिष्ठात्री स्कंदमाता की आराधना के लिए रविवार को देवी मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ जुटी। शक्तिपीठ देवीपाटन एवं सिद्घपीठ बिजलेश्वरी देवी मंदिर में पूरे दिन श्रद्घालुओं का तांता लगा रहा। देवी की आराधना के साथ-साथ शक्तिपीठ देवीपाटन में मुंडन एवं कर्ण छेदन जैसे संस्कार भी संपन्न हुए।
नवरात्र की पंचमी तिथि को देवी भगवती के पांचवें स्वरुप स्कंदमाता की पूजा का विधान है। धर्म ग्रंथों के अनुसार तारकासुर नामक राक्षस को वरदान था कि वह भगवान शंकर एवं माता पार्वती के पुत्र द्वारा ही मारा जाएगा।
तारकासुर का वध करने के लिए ही देवी पार्वती का भगवान शंकर से विवाह हुआ। भगवान शंकर व माता पार्वती से पैदा हुए स्कंद कुुमार-कार्तिकेय द्वारा ही तारकासुर का वध किया गया। शंकर पार्वती के मांगलिक मिलन को ही सनातन धर्म में विवाह परंपरा का प्रारंभ माना जाता है।
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स्कंद कुमार की माता होने के कारण ही देवी को स्कंदमाता कहा गया। ऐसी मान्यता है कि सूर्य मंडल की अधिष्ठात्री एवं मातृ शक्ति से परिपूर्ण स्कंदमाता का ध्यान व पूजन करने से भक्तों में प्रेम, करुणा एवं वात्सल्य का संचार होता है। मां की आराधना से भक्तों केे सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
रविवार को नवरात्र पंचमी के दिन देवी मंदिरों में माता के इसी स्वरुप की पूजा-अर्चना की गई। शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर में भोर पहर से ही श्रद्घालुओं की भीड़ जुट गई।
श्रद्घालुओं ने सूर्य कुंड में स्नान के बाद कतारबद्घ होकर देवी का दर्शन एवं पूजन किया। इसके अतिरिक्त सिद्घपीठ बिजलेश्वरी देवी मंदिर, तुलसीपुर स्थित नई देवी मंदिर, पचपेड़वा स्थित रहिया देवी मंदिर, उतरौला स्थित ज्वाला देवी मंदिर, महुआ स्थित करिया दुर्गा मंदिर, भगवतीगंज स्थित दुर्गा मंदिर तथा नगर स्थित झारखंडी मंदिर, संतोषी माता मंदिर, कालीथान, बड़की बहिनी मंदिर एवं सम्मय माता मंदिर में भी सुबह से लेकर देर रात तक भक्तों का तांता लगा रहा। भक्तों ने विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद मांगा।
नवरात्र पंचमी के दिन से ही शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर में मुंडन एवं कर्णछेदन संस्कार भी शुरु हो जाता है। रविवार को मंदिर में भक्तों ने अपने बच्चों का मुंडन व कर्णछेदन संस्कार कराया। इसके लिए मंदिर में भारी भीड़ रही। मुंडन व कर्णछेदन संस्कार कराने के बाद बच्चों को मां पाटेश्वरी के दर्शन कराए और आशीर्वाद भी दिलाया।
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नवरात्र की पंचमी तिथि को देवी भगवती के पांचवें स्वरुप स्कंदमाता की पूजा का विधान है। धर्म ग्रंथों के अनुसार तारकासुर नामक राक्षस को वरदान था कि वह भगवान शंकर एवं माता पार्वती के पुत्र द्वारा ही मारा जाएगा।
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तारकासुर का वध करने के लिए ही देवी पार्वती का भगवान शंकर से विवाह हुआ। भगवान शंकर व माता पार्वती से पैदा हुए स्कंद कुुमार-कार्तिकेय द्वारा ही तारकासुर का वध किया गया। शंकर पार्वती के मांगलिक मिलन को ही सनातन धर्म में विवाह परंपरा का प्रारंभ माना जाता है।
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स्कंद कुमार की माता होने के कारण ही देवी को स्कंदमाता कहा गया। ऐसी मान्यता है कि सूर्य मंडल की अधिष्ठात्री एवं मातृ शक्ति से परिपूर्ण स्कंदमाता का ध्यान व पूजन करने से भक्तों में प्रेम, करुणा एवं वात्सल्य का संचार होता है। मां की आराधना से भक्तों केे सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
रविवार को नवरात्र पंचमी के दिन देवी मंदिरों में माता के इसी स्वरुप की पूजा-अर्चना की गई। शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर में भोर पहर से ही श्रद्घालुओं की भीड़ जुट गई।
श्रद्घालुओं ने सूर्य कुंड में स्नान के बाद कतारबद्घ होकर देवी का दर्शन एवं पूजन किया। इसके अतिरिक्त सिद्घपीठ बिजलेश्वरी देवी मंदिर, तुलसीपुर स्थित नई देवी मंदिर, पचपेड़वा स्थित रहिया देवी मंदिर, उतरौला स्थित ज्वाला देवी मंदिर, महुआ स्थित करिया दुर्गा मंदिर, भगवतीगंज स्थित दुर्गा मंदिर तथा नगर स्थित झारखंडी मंदिर, संतोषी माता मंदिर, कालीथान, बड़की बहिनी मंदिर एवं सम्मय माता मंदिर में भी सुबह से लेकर देर रात तक भक्तों का तांता लगा रहा। भक्तों ने विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद मांगा।
नवरात्र पंचमी के दिन से ही शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर में मुंडन एवं कर्णछेदन संस्कार भी शुरु हो जाता है। रविवार को मंदिर में भक्तों ने अपने बच्चों का मुंडन व कर्णछेदन संस्कार कराया। इसके लिए मंदिर में भारी भीड़ रही। मुंडन व कर्णछेदन संस्कार कराने के बाद बच्चों को मां पाटेश्वरी के दर्शन कराए और आशीर्वाद भी दिलाया।