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अंडरग्राउंड केबल के लिए राजी हो रेलवे तो चले मेमो
गोंडा/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 20 Nov 2015 12:08 AM IST
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बाराबंकी में रामसनेहीघाट से बुढ़वल के बीच बिजली के टावर गाड़ने में आ रही दिक्कत का समाधान खोजते हुए पावर कॉर्पोरेशन ने अब इसकी गेंद रेलवे के पाले में फेंक दी है। कॉर्पोरेशन के अधिकारियों का कहना है कि अगर रेलवे जमीन के भीतर 132 केवी की 3 किलोमीटर लाइन को बुढ़वल तक ले जाने के लिए राजी हो जाता है तो वह उसे बिजली का कनेक्शन वहां मुहैया करा सकते हैं। हालांकि यह काम भी नाकों चने चबाने से कम नहीं है। लेकिन अगर सब-कुछ ठीक रहा तो दो से तीन महीने के भीतर इस समस्या का समाधान खोज लिया जाएगा।
गोंडा से बाराबंकी के बीच रेल इलेक्ट्रीफिकेशन का काम तीन वर्षों से पूरा है, लेकिन रेलवे को बुढ़वल में बिजली का दूसरा अल्टरनेट कनेक्शन न मिल पाने के कारण इस रूट पर सवारी गाड़ी का संचालन नहीं हो पा रहा।
लखनऊ-दिल्ली की तर्ज पर गोंडा से बाराबंकी के बीच मेमो ट्रेन चलानेे के लिए पांच साल पहले रेलवे के इलेक्ट्रीफिकेशन विभाग ने करोड़ों रुपये खर्च कर बाराबंकी से गोंडा के बीच रेल ट्रैक का इलेक्ट्रीफिकेशन कराया था, जिसके पूरा होने के बाद सीआरएस का दौरा हुआ।
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इसमें रेल ट्रैक और इलेक्ट्रीफिकेशन दोनों ही फिट पाए गए। इसके बावजूद मेमो ट्रेन का संचालन बिजली की अनुपलब्धता के चलते नहीं हो पा रहा।
इसके पीछे रामसनेही घाट के कुछ इलाकों में बुढ़वल तक बिजली के सात टावर गाड़ने का विवाद अभी तक मुख्य माना जा रहा था। इसे लेकर कई बार बाराबंकी जिला प्रशासन के लोगों की काश्तकारों से बात भी हुई, लेकिन विवाद का कोई हल नहीं निकला।
बीते दिनों मुख्य सचिव आलोक रंजन की बैठक में इस मुद्दे पर रेलवे अधिकारियों के साथ हुई बातचीत के बाद पावर कॉर्पोरेशन ने अब इस प्रकरण की गेंद रेलवे के पाले में फेंक दी है।
जिसमें बजाए ओवरहेड (जमीन के ऊपर) 132 केवी लाइन खींचने की पूरी लाइन जमीन के भीतर से बुढ़वल तक ले जाने की रणनीति तय की गई है।
इसका प्रस्ताव कॉर्पोरेशन की ओर से मय इस्टीमेट के रेलवे को भेजा गया है। इसमें अंडरग्राउंड केबल खींचने की कुल लागत 11 करोड़ रुपये है।
हालांकि अभी कॉर्पोरेशन से भेजे गए इस प्रस्ताव पर रेलवे की ओर से कोई संतोषजनक फैसला नहीं लिया जा सका है।
वहीं, कॉर्पोरेशन के अधिकारियों का कहना है कि अगर रेलवे उनके इस प्रस्ताव पर राजी हो जाता है और सब कुछ ठीक रहता है तो अगले दो से तीन महीने के भीतर वह उसे 132 केवी लाइन का कनेक्शन बुढ़वल स्टेशन पर मुहैया करा देंगे।
पावर कॉर्पोरेशन के ट्रांसमिशन डिवीजन से उनके पास इस तरह का एक प्रपोजल अंडरग्राउंड केबल डलवाने के लिए आया है। हालांकि यह काम भी उतना आसान नहीं है।
फिलहाल जो प्रपोजल कॉर्पोरेशन ने उन्हें भेजा था, उसे रेलवे बोर्ड को भेज दिया गया है। अगर वहां से इसे मंजूरी मिल जाती है तो इसे लेकर भी प्रयास किया जाएगा।
लेकिन दिक्कत है कि पूरी लाइन को वह अंडरग्राउंड स्टेशन तक नहीं ले जा सकते। 7 में से 2 से 3 टावर तो उन्हें ओवरहेड गाड़ने ही पड़ेंगे।
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गोंडा से बाराबंकी के बीच रेल इलेक्ट्रीफिकेशन का काम तीन वर्षों से पूरा है, लेकिन रेलवे को बुढ़वल में बिजली का दूसरा अल्टरनेट कनेक्शन न मिल पाने के कारण इस रूट पर सवारी गाड़ी का संचालन नहीं हो पा रहा।
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लखनऊ-दिल्ली की तर्ज पर गोंडा से बाराबंकी के बीच मेमो ट्रेन चलानेे के लिए पांच साल पहले रेलवे के इलेक्ट्रीफिकेशन विभाग ने करोड़ों रुपये खर्च कर बाराबंकी से गोंडा के बीच रेल ट्रैक का इलेक्ट्रीफिकेशन कराया था, जिसके पूरा होने के बाद सीआरएस का दौरा हुआ।
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इसमें रेल ट्रैक और इलेक्ट्रीफिकेशन दोनों ही फिट पाए गए। इसके बावजूद मेमो ट्रेन का संचालन बिजली की अनुपलब्धता के चलते नहीं हो पा रहा।
इसके पीछे रामसनेही घाट के कुछ इलाकों में बुढ़वल तक बिजली के सात टावर गाड़ने का विवाद अभी तक मुख्य माना जा रहा था। इसे लेकर कई बार बाराबंकी जिला प्रशासन के लोगों की काश्तकारों से बात भी हुई, लेकिन विवाद का कोई हल नहीं निकला।
बीते दिनों मुख्य सचिव आलोक रंजन की बैठक में इस मुद्दे पर रेलवे अधिकारियों के साथ हुई बातचीत के बाद पावर कॉर्पोरेशन ने अब इस प्रकरण की गेंद रेलवे के पाले में फेंक दी है।
जिसमें बजाए ओवरहेड (जमीन के ऊपर) 132 केवी लाइन खींचने की पूरी लाइन जमीन के भीतर से बुढ़वल तक ले जाने की रणनीति तय की गई है।
इसका प्रस्ताव कॉर्पोरेशन की ओर से मय इस्टीमेट के रेलवे को भेजा गया है। इसमें अंडरग्राउंड केबल खींचने की कुल लागत 11 करोड़ रुपये है।
हालांकि अभी कॉर्पोरेशन से भेजे गए इस प्रस्ताव पर रेलवे की ओर से कोई संतोषजनक फैसला नहीं लिया जा सका है।
वहीं, कॉर्पोरेशन के अधिकारियों का कहना है कि अगर रेलवे उनके इस प्रस्ताव पर राजी हो जाता है और सब कुछ ठीक रहता है तो अगले दो से तीन महीने के भीतर वह उसे 132 केवी लाइन का कनेक्शन बुढ़वल स्टेशन पर मुहैया करा देंगे।
पावर कॉर्पोरेशन के ट्रांसमिशन डिवीजन से उनके पास इस तरह का एक प्रपोजल अंडरग्राउंड केबल डलवाने के लिए आया है। हालांकि यह काम भी उतना आसान नहीं है।
फिलहाल जो प्रपोजल कॉर्पोरेशन ने उन्हें भेजा था, उसे रेलवे बोर्ड को भेज दिया गया है। अगर वहां से इसे मंजूरी मिल जाती है तो इसे लेकर भी प्रयास किया जाएगा।
लेकिन दिक्कत है कि पूरी लाइन को वह अंडरग्राउंड स्टेशन तक नहीं ले जा सकते। 7 में से 2 से 3 टावर तो उन्हें ओवरहेड गाड़ने ही पड़ेंगे।