{"_id":"6224f4586f3f79599e774f8c","slug":"student-ukrain-gonda-news-lko6206612140","type":"story","status":"publish","title_hn":"बम गिरने पर दहल उठता था दिल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बम गिरने पर दहल उठता था दिल
विज्ञापन
फोटो-10 लखनऊ एयरपोर्ट पर यूक्रेन से लौटे बच्चों प्रशांत सोनी व शालू सोनी के साथ सेल्फी लेते पिता वि
- फोटो : GONDA
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गोंडा। यूक्रेन में रूस की बमबारी के बीच मुसीबतों को पार कर सगे भाई-बहन समेत तीन छात्र अपने घरों को सही सलामत रविवार को लौट आए हैं। तीनों के गोंडा पहुंचने पर प्रशासनिक अधिकारियों समेत परिवार व संबंधियों ने उनका कुशलक्षेम पूछते हुए स्वागत किया।
खरगूपुर के रहने वाले विनोद सोनी का बेटा प्रशांत सोनी और बेटी शालू सोनी यूक्रेन के खारकीव की मेडिकल यूनिवर्सिटी में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे। यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध के हालात पैदा होने पर सभी की नजर थी। वहां पढ़ रहे भारतीय बच्चों के माता-पिता अपने लाल को बुलाने के लिए प्रयास कर रहे थे। इसी बीच रूस ने वहां बम के धमाके शुरू कर दिए। काफी संख्या में छात्र फंस गए थे। खरगूपुर के रहने वाले मेडिकल छात्र प्रशांत और उसकी बहन शालू ने रविवार को अमर उजाला से खारकीव के हालात साझा किए। प्रशांत ने बताया कि वह खारकीव में एक फ्लैट लेकर रहता था। जबकि, उसकी बहन शालू यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहती थी। प्रशांत के मुताबिक, खारकीव में रूसी हमलों में जब कई मंजिला इमारतें कुछ ही पल में कांच की तरह मलबे में तब्दील हो रही थीं। बम के धमाकों की आवाज जब आती थी तो दिल दहल जाता था। मन में सिर्फ एक बात गूंजती थी कि किसी तरह से जल्द से जल्द यहां से भारत पहुंचना है। प्रशांत ने बताया कि 30 छात्रों का एक ग्रुप एक मार्च को ट्रेन से खारकीव से 1600 किलोमीटर की यात्रा करके लवलीव पहुंचा। जिसमें उसके साथ ही बहन शालू भी थी। चार किलोमीटर पैदल चलने के बाद पोलैंड बॉर्डर पहुंचे। जहां इंडियन एंबेसी में 10 घंटे के इंतजार के बाद एंट्री हो सकी। दो दिन पोलैंड में ठहरना पड़ा। उसके बाद वतन वापसी हुई।
करनैलगंज के व्यापारी रमेश कुमार गुप्ता का बेटा सुयश गुप्ता शनिवार की देररात यूक्रेन से घर पहुंच गया। सुयश ने बताया कि वह यूक्रेन के कीव मेडिकल यूनिवर्सिटी में छात्र था। बताया कि कीव के सिटी सेंटर को रूसी हमले में उड़ा दिया गया। बमबारी में हालात ऐसे थे कि बम कब और कहां गिरेगा, इसको लेकर भारतीय सहित कीव के लोग दहशत में थे।
विज्ञापन
सुयश बताते हैं कि मगर वह जहां रहता था वह सेफ जोन था। वहां रूसी हमला नहीं हुआ। वतन वापसी को लेकर चिंता बनी रहती थी। 28 फरवरी की शाम बस से रोमानिया बॉर्डर पहुंचा। वहां दो दिन ठहरने के बाद फ्लाइट से दिल्ली पहुंचा और दिल्ली से लखनऊ पहुंचने के बाद कार से अपने घर पहुंच गया।
विज्ञापन
खरगूपुर के रहने वाले विनोद सोनी का बेटा प्रशांत सोनी और बेटी शालू सोनी यूक्रेन के खारकीव की मेडिकल यूनिवर्सिटी में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे। यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध के हालात पैदा होने पर सभी की नजर थी। वहां पढ़ रहे भारतीय बच्चों के माता-पिता अपने लाल को बुलाने के लिए प्रयास कर रहे थे। इसी बीच रूस ने वहां बम के धमाके शुरू कर दिए। काफी संख्या में छात्र फंस गए थे। खरगूपुर के रहने वाले मेडिकल छात्र प्रशांत और उसकी बहन शालू ने रविवार को अमर उजाला से खारकीव के हालात साझा किए। प्रशांत ने बताया कि वह खारकीव में एक फ्लैट लेकर रहता था। जबकि, उसकी बहन शालू यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहती थी। प्रशांत के मुताबिक, खारकीव में रूसी हमलों में जब कई मंजिला इमारतें कुछ ही पल में कांच की तरह मलबे में तब्दील हो रही थीं। बम के धमाकों की आवाज जब आती थी तो दिल दहल जाता था। मन में सिर्फ एक बात गूंजती थी कि किसी तरह से जल्द से जल्द यहां से भारत पहुंचना है। प्रशांत ने बताया कि 30 छात्रों का एक ग्रुप एक मार्च को ट्रेन से खारकीव से 1600 किलोमीटर की यात्रा करके लवलीव पहुंचा। जिसमें उसके साथ ही बहन शालू भी थी। चार किलोमीटर पैदल चलने के बाद पोलैंड बॉर्डर पहुंचे। जहां इंडियन एंबेसी में 10 घंटे के इंतजार के बाद एंट्री हो सकी। दो दिन पोलैंड में ठहरना पड़ा। उसके बाद वतन वापसी हुई।
विज्ञापन
करनैलगंज के व्यापारी रमेश कुमार गुप्ता का बेटा सुयश गुप्ता शनिवार की देररात यूक्रेन से घर पहुंच गया। सुयश ने बताया कि वह यूक्रेन के कीव मेडिकल यूनिवर्सिटी में छात्र था। बताया कि कीव के सिटी सेंटर को रूसी हमले में उड़ा दिया गया। बमबारी में हालात ऐसे थे कि बम कब और कहां गिरेगा, इसको लेकर भारतीय सहित कीव के लोग दहशत में थे।
विज्ञापन
सुयश बताते हैं कि मगर वह जहां रहता था वह सेफ जोन था। वहां रूसी हमला नहीं हुआ। वतन वापसी को लेकर चिंता बनी रहती थी। 28 फरवरी की शाम बस से रोमानिया बॉर्डर पहुंचा। वहां दो दिन ठहरने के बाद फ्लाइट से दिल्ली पहुंचा और दिल्ली से लखनऊ पहुंचने के बाद कार से अपने घर पहुंच गया।